यूएनजीए : जयशंकर ने आतंकवाद के खिलाफ आत्मरक्षा के अधिकार पर द‍िया जोर

संयुक्त राष्ट्र, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान बड़े स्तर पर शांति की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने स्‍पष्‍ट क‍िया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के अधिकार का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने कहा कि गरीब और विकासशील देशों को उन युद्धों और फैसलों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए, जिनमें उनकी आवाज या भूमिका बहुत कम होती है।;

By :  IANS
Update: 2026-09-27 06:10 GMT

संयुक्त राष्ट्र, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान बड़े स्तर पर शांति की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने स्‍पष्‍ट क‍िया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के अधिकार का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने कहा कि गरीब और विकासशील देशों को उन युद्धों और फैसलों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए, जिनमें उनकी आवाज या भूमिका बहुत कम होती है।

जयशंकर के भाषण में खाड़ी क्षेत्र और यूक्रेन में चल रहे संघर्षों से लेकर खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे कई मुद्दे शामिल थे।

इन सभी मुद्दों के बीच उनका मुख्य संदेश यह था कि शांति सिर्फ युद्ध खत्म करने से नहीं आती। इसके लिए स्थिरता और जरूरी संसाधनों तक सभी की बराबर और सही पहुंच भी जरूरी है।

जयशंकर के सबसे कड़े शब्द उस देश के लिए थे, जिसका उन्होंने नाम नहीं लिया, लेकिन उसे 'बार-बार आतंकवाद का इस्तेमाल करने वाला देश' बताया।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस देश ने एक दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया था। जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद को सामान्य बताने और उसके नतीजों से बचने के लिए भी तर्क दिए गए।

उन्होंने कहा क‍ि आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के हमारे अधिकार का इस्तेमाल किया जाएगा।

जयशंकर ने उस देश का नाम नहीं लिया और न ही यह बताया कि भारत इस दिशा में किस तरह की कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, उनके बयान से यह साफ था कि वह सीमा पार आतंकवाद को सामान्य संबंधों के साथ चलने वाली चीज नहीं मानते।

जयशंकर ने कहा कि दुनिया में चल रहे संघर्ष विकास की रफ्तार धीमी कर रहे हैं। इतना ही नहीं, लड़ाई से बहुत दूर मौजूद देश भी बिना अपनी किसी गलती के इसका असर झेल रहे हैं।

उन्होंने महासभा से कहा कि जो देश इन संकटों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, अक्सर फैसले लेने में उनकी आवाज ही सबसे कम सुनी जाती है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव को लेकर जयशंकर ने संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील की।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों में जहाजों और नाविकों को निशाना बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत चाहता है कि आम नागरिकों की सुरक्षा हो और ऊर्जा तथा व्यापार की आवाजाही बिना रुकावट जारी रहे।

जयशंकर ने यूक्रेन में चल रही शांति की कोशिशों का समर्थन किया और खाद्य तथा ऊर्जा से जुड़े दबाव को कम करने में भारत की मदद की पेशकश की।

मध्य पूर्व के मुद्दे पर उन्होंने टू-स्टेट सॉल्यूशन, यानी इजरायल और फिलिस्तीन के लिए दो अलग देशों के समाधान को लेकर भारत का समर्थन दोहराया। भारत फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता भी दे रहा है।

इन मुद्दों से भारत की अपनी चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं, क्योंकि जहाजों की आवाजाही, अनाज और ऊर्जा की सप्लाई में रुकावट का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है।

जयशंकर ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर से लेकर काला सागर तक हुए हमलों में भारतीय नाविक भी मारे गए हैं। जयशंकर ने विकासशील देशों के लिए, उन्होंने भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त से जुड़े '4एफ संकट' का ज‍िक्र किया। जलवायु की स्थिति, उर्वरक की कमी और अनाज की आवाजाही में रुकावटों ने इस दबाव को और बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु से जुड़ी समस्याएं, खाद की कमी और अनाज की आवाजाही में रुकावट इस संकट को और गंभीर बना रही हैं।

जयशंकर ने कहा कि बाजारों तक सीमित पहुंच और सामान्य बाजार के नियमों से अलग तरीके अपनाए जाने की वजह से ग्लोबल साउथ के देशों के लिए अपने उद्योगों को विकसित करना और मुश्किल हो रहा है।

जयशंकर ने उस स्थिति की भी आलोचना की, जिसे उन्होंने 'हर चीज को हथियार की तरह इस्तेमाल' करना बताया।

उन्होंने कहा कि फाइनेंस, सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी, संसाधन और कनेक्टिविटी जैसी चीजों का इस्तेमाल भी अब दूसरे देशों पर दबाव डालने के लिए किया जा रहा है।

उनके मुताबिक, देश इन जोखिमों को कम करने के लिए अपने संबंधों और सप्लाई के स्रोतों में बदलाव कर रहे हैं और अलग-अलग विकल्प तलाश रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही दुनिया में आपसी भरोसा भी कम हो रहा है।

जयशंकर ने भारत को एक उदाहरण और साझेदार, दोनों के तौर पर पेश किया। उन्होंने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और देश के अंदर लोगों तक बुनियादी सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने 78 देशों में 600 बड़े विकास प्रोजेक्ट किए हैं। इनमें बुनियादी ढांचा, कृषि, सूचना तकनीक और ट्रेनिंग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

जयशंकर ने जलवायु से जुड़ी पहलों, आपात स्थिति में मेडिकल सहायता पहुंचाने और प्राकृतिक आपदाओं के बाद दूसरे देशों को दी गई मदद का भी जिक्र किया। उन्होंने खास तौर पर अफ्रीकी देशों और छोटे विकासशील द्वीपीय देशों के साथ भारत की साझेदारी पर जोर दिया।

यह बात ग्लोबल साउथ के लिए ज्यादा आवाज और भागीदारी की भारत की मांग से भी जुड़ी थी। भारत का कहना है कि वह दूसरे विकासशील देशों के साथ पहले से ही मिलकर काम कर रहा है।

अपने संबोधन के आखिर में जयशंकर ने इन सभी मुद्दों को इस बड़े सवाल से जोड़ा कि बदलती दुनिया के नियम आखिर कौन तय करेगा।

उन्होंने कहा, "1945 के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था अब नई वास्तविकताओं को जगह दे रही है।" उन्होंने वैश्विक फैसले लेते समय ज्यादा देशों से सलाह-मशविरा करने और फैसलों को ज्यादा पारदर्शी बनाने की मांग की। जयशंकर ने कहा कि दुनिया की आबादी के एक बड़े हिस्से को अब वैश्विक फैसले लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।

जयशंकर ने अपने संबोधन में भारत की सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़ी चिंताओं को इस बड़े तर्क के साथ जोड़ा कि दुनिया में शांति और विकास के लिए एक ज्यादा समावेशी और बराबरी वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत है।

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