संकट में बहुपक्षवाद: क्या बिखर रही है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था?

अब जब सभी देश दुनिया के नए समीकरणों को समझने और तलाशने में जुटे हैं, तो ऐसे में कुछ देशों की ताकत और दबदबा बढ़ सकता है, जबकि कई देशों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है;

Update: 2026-09-07 12:51 GMT

अब जब सभी देश दुनिया के नए समीकरणों को समझने और तलाशने में जुटे हैं, तो ऐसे में कुछ देशों की ताकत और दबदबा बढ़ सकता है, जबकि कई देशों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

दुनिया की राजनीति का ताना-बाना बदल रहा है और इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के फैसले हैं.

सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र संघ के न्यूयॉर्क मुख्यालय में डॉनल्ड ट्रंप का कदम रखना महज एक दौरा नहीं था, बल्कि गहरा कूटनीतिक संदेश और प्रतीकात्मकता से भरा क्षण था. जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति अपने भाषण से पहले लॉबी में एस्केलेटर पर चढ़े, वह बंद हो गया. फिर, उनके भाषण के दौरान टेलीप्रॉम्पटर भी काम नहीं कर रहा था. इस पर पूर्व टीवी स्टार रह चुके राष्ट्रपति ट्रंप ने वहां मौजूद राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों से हल्के मजाकिया अंदाज में कहा, "संयुक्त राष्ट्र से मुझे यही दो चीजें मिलीं: एक खराब एस्केलेटर और एक खराब टेलीप्रॉम्प्टर.”

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी दुनिया की सबसे मुख्य संस्था है. इसे काफी हद तक अमेरिका ने गढ़ा था और यह सभी देशों के आपसी तालमेल (बहुपक्षवाद) और हितों के संतुलन पर आधारित है. जब 1945 में यूएन की स्थापना हुई थी, तब इसका मकसद युद्धों को रोकना था. बाद में इसका दायरा बढ़ा. इसमें वैश्विक स्वास्थ्य, विकास और जलवायु संरक्षण जैसे अनगिनत क्षेत्र शामिल हो गए.

आज, 80 से भी अधिक सालों के बाद, संयुक्त राष्ट्र के संस्थानों, खासकर सुरक्षा परिषद में बड़े बदलाव और सुधार की सख्त जरूरत मानी जा रही है, ठीक वैसे ही जैसे खुद यूएन मुख्यालय की इमारत को मरम्मत की जरूरत है.

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि खराब एस्केलेटर की घटना गलती से ट्रंप के अपने कैमरा ऑपरेटर की वजह से हुई थी. यूएन ने इस घटना की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया है. खैर, इस एक वाकये से अलग हटकर देखें, तो लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग मानते हैं कि ट्रंप और उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट' वाली नीति की वजह से बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो रही है, तो कुछ का मानना है कि वे खुद इस व्यवस्था को तोड़ने वाली एक विनाशकारी ताकत हैं.

एस्केलेटर और टेलीप्रॉम्प्टर से इतर, दुनिया भर के नेता और विश्लेषक इस सवाल पर बहस कर रहे हैं कि क्या बहुपक्षवाद खत्म हो रहा है और अगर ऐसा है, तो इसके बाद क्या होगा?

क्या अगले पांच सालों में दुनिया में एक नई व्यवस्था बनेगी?

फिनलैंड के राष्ट्रपति आलेक्जांडर स्टब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में डॉक्टरेट की डिग्री रखने वाले गिने-चुने राष्ट्राध्यक्षों में से एक हैं. उनका तर्क है कि दुनिया इस समय सत्ता के खालीपन के दौर से गुजर रही है, जिससे अगले पांच वर्षों में एक नई वैश्विक व्यवस्था के उभरने की पूरी संभावना है.

अन्य विशेषज्ञों को उम्मीद है कि बदलाव का यह दौर थोड़ा लंबा चलेगा. ‘यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' थिंक टैंक के निदेशक मार्क लियोनार्ड ने हाल ही में ‘फॉरेन अफेयर्स' पत्रिका में छपे एक लेख में लिखा, "अब यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि पुरानी वैश्विक व्यवस्था सचमुच खत्म हो चुकी है और भू-राजनीति के लिए एक नया दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है. मौजूदा दौर अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था से चीन के नेतृत्व वाली व्यवस्था में बदलाव का महज एक छोटा अंतराल नहीं है.”

उन्होंने आगे लिखा, "कुछ समय के लिए दुनिया बिना किसी व्यवस्था या संतुलन के रहेगी. यह बिखराव, संकटों के फैलने, और दूसरों को दबाने के दौर से गुजरेगी, जहां देश भौगोलिक, आर्थिक और तकनीकी कमजोरियों को एक-दूसरे के खिलाफ हथियार बनाने की कोशिश करेंगे.”

सुधार में रुकावट का दौर

लिस्बन की लुसोफोना यूनिवर्सिटी में अफ्रीका मामलों की विशेषज्ञ और ग्लोबलाइजेशन एक्सपर्ट टेरेसा नोगुएरा पिंटो ने कहा, "बहुपक्षवाद का वह ढांचा, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद की दुनिया और संयुक्त राष्ट्र के सुनहरे दौर से जुड़ा था, मुझे लगता है कि अब वह सब पूरी तरह से खत्म हो चुका है.”

उन्होंने आगे बताया, "यह काम नहीं कर रहा है. हम देख सकते हैं कि शांति बनाए रखने और शांति स्थापित करने वाले ज्यादातर मिशन नाकाम रहे हैं. इससे पता चलता है कि संयुक्त राष्ट्र को सुधार की सख्त जरूरत है.”

डॉयचे वेले से बातचीत में पिंटो ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का उदाहरण दिया और इस बात पर जोर दिया कि यह 2026 की दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं करती है. उन्होंने कहा, "लेकिन इसमें कौन शामिल होगा? भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, इथियोपिया, मेरा मतलब है कि इसमें किसी सुधार की कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है.”

ट्रंप को बड़ा झटका, 75 देशों पर वीजा प्रतिबंध के फैसले पर रोक

बर्लिन स्थित ‘जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स' (एसडब्ल्यूपी) में ‘अमेरिका रिसर्च ग्रुप' के प्रमुख योहानेस थिम का नजरिया थोड़ा अलग है. उन्होंने कहा, "मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि यह दौर पूरी तरह खत्म हो चुका है. अंतरराष्ट्रीय कानून बहुत बड़ा और व्यापक है. इसमें कई ऐसी चीजें शामिल हैं जिन पर देशों के बीच रोजमर्रा के संबंधों, राजनयिक नियमों, संधियों और अन्य मामलों में हमारा ध्यान भी नहीं जाता. इसमें अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जिस पर असल में ध्यान नहीं जाता, क्योंकि वह कोई बहुत खास या चौंकाने वाली बात नहीं होती है.”

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि हाल के समय में अंतरराष्ट्रीय कानून का लगातार उल्लंघन हुआ है, जैसे कि यूक्रेन और ईरान में आक्रामक युद्धों के दौरान. साथ ही, गाजा जैसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन भी बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए एक चुनौती पेश करता है.

थिम का कहना है कि बहुपक्षवाद का ढांचा हिलने की एक बड़ी वजह अमेरिका का दर्जनों अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संधियों से बाहर निकलना भी है. इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), पेरिस जलवायु समझौता, यूएनएफसीसीसी और यूनेस्को जैसी बड़ी संस्थाएं शामिल हैं. हाल ही में, अमेरिकी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (आईसीसी) पर अपना दबाव और बढ़ा दिया है, जिसकी वह लंबे समय से आलोचना करती आ रही है.

अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ पर ट्रंप बोले, कम्यूनिज्म देश के लिए खतरा

बतौर थिम, "अगर दुनिया का सबसे ताकतवर देश ऐसा व्यवहार करता है, तो इससे पूरी व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होता है. सच कहूं, तो यह उस खतरे से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है जब रूस जैसा कोई देश किसी पर हमला कर देता है.”

पुराने गठबंधन कमजोर हो रहे हैं

ट्रंप अक्सर 1823 के मुनरो सिद्धांत (मोनरो डॉक्ट्रिन) का जिक्र करते हैं, जिसमें पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिका के खास प्रभाव वाले क्षेत्र के तौर पर बताया गया था. अगर इसे आज के दौर में लागू किया जाए, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि बाकी दुनिया पर अब केवल अमेरिका का दबदबा नहीं रहेगा, बल्कि अन्य बड़ी और मध्यम ताकतें राज करेंगी. दूसरे शब्दों में कहें, तो एक प्रमुख महाशक्ति के रूप में अमेरिका के हटने के बाद यह एक ‘बहुध्रुवीय' यानी कई ताकतों वाली विश्व व्यवस्था होगी.

बहुत से देशों के लिए इस उठापटक का मतलब है, अपनी पकड़ खो देना. हालांकि, कुछ देशों के लिए यह एक ऐसा मौका भी हो सकता है जहां वे खुद को नए सिरे से ढालें और एक ऐसी बहुध्रुवीय दुनिया में अपने गुट बनाकर अपनी जगह पक्की करें, जिस पर अब पश्चिम का दबदबा नहीं रहा. उदाहरण के लिए, यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के ‘ब्रिक्स' संगठन का महत्व बढ़ा है और इसमें नए देश शामिल हुए हैं. यह लगातार पश्चिमी देशों के दबदबे वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे के सामने आत्मविश्वास से भरा नया विकल्प बनने की कोशिश कर रहा है.

पिंटो ने कहा, "कई अफ्रीकी देशों को अब समझ आ रहा है कि पुराने मॉडल उनके लिए, खासकर उनकी तरक्की और लगातार होने वाले विकास के लिए इतने फायदेमंद नहीं थे. वे इस मौके का पूरा फायदा उठा रहे हैं. मैं यह भी कहूंगी कि यह भू-राजनीति की वापसी से गहराई से जुड़ा है. एक वक्त हमें लगा था कि भू-राजनीति इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है.”

सुरक्षा नीति के मामले में भी दुनिया खुद को नए सिरे से ढाल रही है. नाटो के भीतर इस बात का डर है कि अमेरिका और पीछे हट सकता है या फिर अंदरूनी सैन्य हमले जैसी नौबत भी आ सकती है, खासकर अगर ट्रंप ग्रीनलैंड पर अपने दावों को आगे बढ़ाते हैं, जिस पर अभी डेनमार्क का नियंत्रण है. वहीं इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और खासतौर पर पश्चिम एशिया में, अमेरिका के सहयोगी देश उसकी सुरक्षा गारंटी पर भरोसा खो रहे हैं और नए सुरक्षा सहयोगियों की तलाश कर रहे हैं.

अगस्त की शुरुआत में, सऊदी अरब, तुर्की और परमाणु संपन्न पाकिस्तान ने ‘मक्का रक्षा समझौते' की शुरुआत की, जिसमें नाटो की तर्ज पर एक-दूसरे की रक्षा करने की गारंटी दी गई है. इस समझौते और यूक्रेन के समर्थन के लिए बने यूरोपीय देशों के गठबंधन को छोटे, लेकिन ज्यादा सक्रिय और तेजी से फैसले लेने वाले समूहों के उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है. ऐसे समूहों को कभी-कभी ‘मिनिलेटरलिज्म' (छोटे बहुपक्षीय समूहों का सहयोग) कहा जाता है.

कई मामलों में सैन्य और कूटनीतिक कोशिशों को एक साथ मिलाकर देखा जा रहा है. एसडब्ल्यूपी के विशेषज्ञ थिम ने कहा, "बिना नियमों वाली दुनिया सिर्फ ताकतवरों की मदद करती है. बाकी सभी, चाहे वे मध्यम ताकत वाले हों या कमजोर, कुचल दिए जाते हैं. इसीलिए यूरोप, जिसे मैं मध्यम रूप से ताकतवर के तौर पर देखता हूं, स्वाभाविक रूप से किसी तरह की व्यवस्था बनाए रखने में गहरी दिलचस्पी रखता है.”

सैन्य पहलुओं के साथ-साथ, कई देश नए और बड़े आर्थिक व राजनीतिक साझेदारों की तलाश भी कर रहे हैं. पिंटो को उम्मीद है कि क्षेत्रीय गठबंधनों का महत्व बढ़ेगा और वे वैश्विक स्तर के तंत्रों की तुलना में बेहतर नतीजे दे सकते हैं. उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए, विश्व व्यापार संगठन ने 20वीं सदी में बहुत कुछ हासिल किया था, लेकिन पिछले कुछ समय से यह सही तरीके से काम नहीं कर पा रहा है. उन्होंने आगे कहा, "अब, ‘अफ्रीकन कॉन्टिनेंटल फ्री ट्रेड एरिया' जैसे क्षेत्रीय तरीकों के बारे में सोचना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.”

अफ्रीकी बाजारों को आपस में जोड़ना कई समस्याओं को हल करने का एक अच्छा तरीका माना जाता है. हालांकि, 2018 से लगभग सभी अफ्रीकी देशों की मंजूरी के बावजूद, इस ‘फ्री ट्रेड एरिया' को लागू करने की रफ्तार काफी धीमी रही है.

भविष्य की वैश्विक व्यवस्था किसके हितों को पूरा करेगी?

पिंटो ने कहा कि तीन चीजें एक बहुध्रुवीय दुनिया में भविष्य के शक्ति संतुलन को तय कर सकती हैं: संप्रभुता, संसाधनों तक पहुंच और सबसे अहम, जनसांख्यिकी (डेमोग्राफिक्स). अफ्रीका और एशिया के युवा और तेजी से बढ़ते समाज खुद को बेहद जरूरी बना सकते हैं. उन्होंने कहा, "इस सदी के अंत तक भारत एक महाशक्ति बन सकता है.”

अमेरिकी प्रभाव में कमी, चीन जैसी अन्य शक्तियों की बढ़ती ताकत और मिनिलैटरलिज्म व क्षेत्रीय गठबंधनों जैसे कारकों के बीच अभी से यह पक्के तौर पर कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा स्थिति से किस तरह की नई वैश्विक व्यवस्था बनकर उभरेगी.

हालांकि, कम से कम थोड़े समय के लिए थिम को डर है कि ‘दुनिया और ज्यादा हिंसक हो जाएगी. ज्यादा युद्ध होंगे. युद्ध और भी क्रूर होते चले जाएंगे. आपसी सहयोग बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा. इसलिए, मुझे नहीं पता कि जब अगली महामारी फैलेगी तब क्या होगा. मुझे नहीं पता कि जब अगला वैश्विक आर्थिक संकट आएगा तब क्या होगा.”

इस पूरे माहौल को देखते हुए, उन्होंने याद दिलाया कि जलवायु परिवर्तन का संकट अभी भी हमारे सामने खड़ा है. यह एक ऐसी चुनौती है जिसका मुकाबला अकेले नहीं, बल्कि सबको साथ मिलकर ही करना होगा.

Tags:    

Similar News