फ्रांस में G7 शिखर सम्मेलन में हो सकती है मोदी-ट्रंप की मुलाकात; क्या है एजेंडा?

15 जून को दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह यानी जी7 नेताओं का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है;

Update: 2026-06-13 05:01 GMT

15 जून को दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह यानी जी7 नेताओं का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है. फ्रेंच राष्ट्रपति माक्रों ने दुनिया भर में जारी वैश्विक आर्थिक असंतुलन को समिट के मुख्य एजेंडे में रखा है.

फ्रांस में एक झील के किनारे बसा एक छोटा सा शहर है, इवियां-ले-बां. दुनिया भर में यह शहर अपने मिनरल वॉटर के लिए जाना जाता है. लेकिन 15 जून, 2026 से यहां जी7 देशों का शिखर सम्मेलन हो रहा है और इसकी अध्यक्षता कर रहे हैं फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों.

कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका - इन सात देशों के नेता तीन दिन तक कई अहम मुद्दों पर बात करेंगे. माक्रों ने इस बार जी7 का दायरा बढ़ाते हुए ब्राजील, मिस्र, भारत, केन्या और दक्षिण कोरिया के नेताओं को इस सम्मेलन में शामिल होने का बुलावा भेजा है.

जी7 यानी 'ग्रुप ऑफ सेवन' दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. 1975 में फ्रांस में ही इसकी शुरुआत हुई थी, तब यह जी6 था. अगले साल कनाडा के शामिल होने से यह जी7 बना. रूस 1998 में जुड़ा, लेकिन 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के बाद उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

व्यापार असंतुलन: दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक उलझन

इस सम्मेलन का सबसे अहम आर्थिक मुद्दा है - वैश्विक व्यापार असंतुलन. माक्रों ने खुद इसे "असहनीय" स्तर तक पहुंचा हुआ बताया है. जी7 के वित्त मंत्री पिछले महीने इस बात पर सहमत हो चुके हैं कि मिलकर कदम उठाना जरूरी है वरना यह एक बड़े वित्तीय संकट की वजह बन सकता है.

चीन का निर्यात आधारित विकास मॉडल अब पूरी दुनिया की आंखों में खटक रहा है. ट्रंप समेत कई देशों का आरोप है कि चीन अपनी मुद्रा को कमजोर रखता है और कंपनियों को भारी सब्सिडी देता है. बीजिंग इन आरोपों को सिरे से खारिज करता है.

दूसरी तरफ अमेरिका लगातार घाटे में चल रहा है. जनता खर्च करती है, बचत कम है और विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियां इस तनाव को और बढ़ा रही हैं.

वहीं, यूरोप की समस्या उत्पादन की नहीं, निवेश की कमी की है. पूर्व ईसीबी प्रमुख मारियो द्राघी ने 2024 में चेताया था कि अगर यूरोप घरेलू बचत को उत्पादक निवेश में नहीं बदला, तो वह अमेरिका और चीन से और पीछे रह जाएगा.

फरवरी के अंत से अमेरिका और इस्राएल ईरान के खिलाफ युद्ध में हैं. इससे पूरा मध्य-पूर्व हिल गया है और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया है, जो दुनिया के तेल व्यापार की जीवन-रेखा है. माक्रों ने क्षेत्रीय सहमति बनाने के लिए मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी, कतर के अमीर तमीम बिन हमद अल-थानी और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद को मंगलवार के एक विशेष सत्र में बुलाया है.

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मोदी-ट्रंप की हो सकती है मुलाकात

जी7 सम्मेलन के इर्द-गिर्द एक और अहम मुलाकात की तैयारी है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच द्विपक्षीय वार्ता. भारत सरकार के एक सूत्र ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि दोनों नेता सम्मेलन के साइडलाइन्स पर मिल सकते हैं. मोदी 13 जून से अपनी पांच दिन की यात्रा शुरू करेंगे, वो पहले जी7 में शामिल होने फ्रांस जाएंगे और फिर स्लोवाकिया.

यह बैठक ऐसे वक्त हो रही है जब भारत-अमेरिका संबंध थोड़े तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं. अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ लगाए हैं. साथ ही ट्रंप बार-बार यह दावा करते रहे हैं, जिसे भारत नकारता है कि उन्होंने पिछले साल भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष को खत्म कराने में दखल दिया.

पिछले महीने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ी है. भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पिछले हफ्ते बताया कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते की पहली किस्त मध्य-जुलाई तक पूरी हो सकती है.

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ट्रंप पहले जन्मदिन मनाएंगे फिर G7 जाएंगे

इस बार जी7 की तारीखें अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की वजह से बदलनी पड़ीं. 14 जून को अपना 80वां जन्मदिन मनाने के बाद डॉनल्ड ट्रंप फ्रांस पहुंचेंगे. ट्रंप ने अपने जन्मदिन पर वाइट हाउस के लॉन में यूएफसी केज फाइट देखने का कार्यक्रम रखा था, जिस वजह से यह बदलाव किया गया.

फ्रांसीसी अधिकारी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कनाडा वाली गलती न दोहराई जाए क्योंकि उस बैठक में ट्रंप बीच में ही उठकर चले गए थे. इस बार उम्मीद है कि पेरिस में माक्रों के साथ अलग द्विपक्षीय बैठक का न्योता देकर ट्रंप को फ्रांस में टिकाया जा पाएगा.

इस सम्मेलन का एक और बड़ा आकर्षण है दुनिया की सबसे बड़ी एआई कंपनियों के मुखिया का एक ही छत के नीचे जमा होना. बुधवार को एक वर्किंग लंच होगा जिसमें वैश्विक नेता इन टेक लीडर्स के साथ एआई रेगुलेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और नेटवर्क जैसे मुद्दों पर बात करेंगे. साथ ही बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर एक अलग घोषणापत्र पर भी सहमति बनाएंगे.

इस कार्यक्रम में ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन, गूगल डीपमाइंड के डेमिस हसाबिस, एंथ्रोपिक के दारियो अमोदेई, भारत के सर्वम एआई के प्रत्युष कुमार समेत कई बड़े नाम यहां मौजूद रहेंगे.

इस बार क्या यू-टर्न लेंगे मार्क कार्नी?

जी7 की इस बैठक में एक और दिलचस्प किरदार है कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी. जनवरी में दावोस में उनका भाषण दुनिया भर में चर्चा का विषय बना था. उन्होंने खुलकर कहा था कि वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था खत्म हो चुकी है और बड़ी ताकतों द्वारा छोटे देशों पर दबाव डालना गलत है.

लेकिन इवियां में कार्नी का रुख शायद उतना मुखर न हो. वजह साफ है, 1 जुलाई को अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा व्यापार समझौते की समीक्षा होनी है. ट्रंप ने इस हफ्ते कहा कि वे इसे नवीनीकृत नहीं कर सकते. कनाडा का 70 फीसदी से ज्यादा निर्यात अमेरिका को जाता है यानी यह समझौता कनाडाई अर्थव्यवस्था की जीवन-रेखा है.

कनाडाई इतिहासकार रॉबर्ट बॉथवेल कहते हैं, "ट्रंप कार्नी के लिए किसी भी और नेता से बड़ी समस्या हैं क्योंकि हम अमेरिका पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं."

ट्रंप ने न सिर्फ कनाडा पर टैरिफ लगाए हैं, बल्कि बार-बार कनाडा को अमेरिका का '51वां राज्य' बनाने की बात भी कही है. मेक्गिल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेनियल बेलां के अनुसार, "कार्नी के दावोस भाषण और अब यूएसएमसीए समीक्षा के बीच एक साफ तनाव दिखता है."

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यूएन ने जारी की चेतावनी

जी7 शुरू होने से पहले ही संयुक्त राष्ट्र ने नेताओं को एक कड़ा संदेश दे दिया. यूएन के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने बुधवार को जिनेवा में कहा कि इस सम्मेलन को दुनिया के सामने खड़ी विशाल चुनौतियों से निपटने का जरिया बनना चाहिए.

यूएन के मानवाधिकार प्रमुख तुर्क ने कहा, "बहुत ज्यादा संघर्ष हो रहे हैं. करीब 63 जंगें चल रही हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे अधिक. असमानताएं आसमान छू रही हैं, जलवायु संकट हर दिन और गहरा होता जा रहा है."

फ्रांस इस साल जी7 की अध्यक्षता कर रहा है. माक्रों के अंतिम राष्ट्रपति कार्यकाल में एक साल से भी कम समय बचा है. वे यूरोपीय संप्रभुता की अपनी सोच को अमली जामा पहनाना चाहते हैं और यह सम्मेलन उनके लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर छाप छोड़ने का शायद आखिरी बड़ा मौका है.

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