बीजिंग/डैंडोंग: उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन शनिवार को जमीन के रास्ते चीन पहुंचे। इस साल उनकी यह पहली चीन यात्रा है। इस दौरे के लिए किम ने उत्तर कोरिया और चीन को जोड़ने वाले नए न्यू यालू रिवर ब्रिज का इस्तेमाल किया। चीन के डैंडोंग क्षेत्र में प्रवेश करने पर प्रधानमंत्री ली कियांग ने उनका स्वागत किया। किम की इस यात्रा को दोनों पड़ोसी देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने और क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इस दौरे के दौरान चीन की राजधानी बीजिंग में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ किसी उच्चस्तरीय बैठक का कार्यक्रम सामने नहीं आया है। किम जोंग उन की चीन यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब उत्तर कोरिया अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए बाहरी सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, चीन भी उत्तर कोरिया के साथ व्यापारिक संबंधों को पटरी पर लाने में रुचि रखता है। यही वजह है कि इस यात्रा पर दक्षिण कोरियाई मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है।
कोरियाई युद्ध की वर्षगांठ से जुड़ा दौरा
किम जोंग उन की चीन यात्रा का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है। बताया जा रहा है कि वह 1950 से 1953 के बीच चले कोरियाई युद्ध में चीन की भागीदारी की वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रमों के सिलसिले में चीन पहुंचे हैं। उस युद्ध में चीन ने उत्तर कोरिया का समर्थन किया था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक संबंध लगातार महत्वपूर्ण बने रहे हैं। वर्ष 2011 में अपने पिता किम जोंग इल के निधन के बाद सत्ता संभालने वाले किम जोंग उन की यह छठी चीन यात्रा बताई जा रही है। चीन लंबे समय से उत्तर कोरिया का प्रमुख सहयोगी रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में उत्तर कोरिया ने रूस के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत किया है। ऐसे में किम का चीन दौरा यह समझने के लिहाज से अहम है कि प्योंगयांग अपनी विदेश नीति में दोनों देशों के बीच किस तरह संतुलन कायम करना चाहता है।
नए पुल से बढ़ेगा व्यापार, अर्थव्यवस्था को मिलेगी मदद
चीन और उत्तर कोरिया के बीच तीन किलोमीटर लंबा न्यू यालू रिवर ब्रिज व्यापारिक संपर्क बढ़ाने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह पुल दोनों देशों के बीच माल की आवाजाही और परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। लंबे समय से बाधित व्यापारिक गतिविधियों को दोबारा गति देने के लिए भी इसे अहम आधारभूत ढांचा माना जा रहा है। कोरोना महामारी के दौर से ही चीन और उत्तर कोरिया के बीच व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित रही हैं। महामारी के कारण सीमा पार आवाजाही और आपूर्ति व्यवस्था पर असर पड़ा था। इसके बाद दोनों देशों के बीच आर्थिक संपर्क बहाल करने की कोशिशें की गईं, लेकिन व्यापार को पूरी क्षमता से आगे बढ़ाने की चुनौती बनी रही। विशेषज्ञों का मानना है कि किम जोंग उन की इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य चीन के साथ आर्थिक सहयोग को मजबूत करना हो सकता है। उत्तर कोरिया को अपने औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भारी मशीनरी, कच्चे माल और ऊर्जा उत्पादों की जरूरत है। चीन इन आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
चीन के साथ संबंध मजबूत करना क्यों जरूरी?
उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था लंबे समय से कई चुनौतियों का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, सीमित व्यापारिक अवसरों और संसाधनों की कमी ने उसकी आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। ऐसे में चीन के साथ व्यापार बढ़ाना किम सरकार के लिए आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। चीन उत्तर कोरिया का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संपर्क बढ़ने से उत्तर कोरिया को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में मदद मिल सकती है। वहीं, चीन के लिए भी सीमा पार व्यापार को विस्तार देना आर्थिक और क्षेत्रीय हितों के अनुरूप हो सकता है। दोनों देशों के बीच पिछले 13 महीनों में दो शिखर वार्ताएं होने का भी उल्लेख किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की कोशिशें पहले से जारी हैं। हालांकि, मौजूदा यात्रा के दौरान व्यापार से जुड़े किन मुद्दों पर ठोस सहमति बनती है, यह आगे की घटनाओं से स्पष्ट होगा।
रूस के साथ बढ़ती नजदीकी भी अहम
किम जोंग उन की चीन यात्रा को केवल आर्थिक संबंधों के नजरिए से नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे रूस के साथ उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकी भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। यूक्रेन युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया ने रूस का खुलकर समर्थन किया है। विभिन्न रिपोर्टों में उत्तर कोरिया की ओर से रूस को सैनिकों और पारंपरिक हथियारों से जुड़ी सहायता दिए जाने की बात कही गई है। रूस के साथ मजबूत होते संबंधों से उत्तर कोरिया को अपने रणनीतिक विकल्प बढ़ाने का अवसर मिला है। इससे चीन पर उसकी निर्भरता कुछ हद तक कम करने की संभावना भी बनी है। हालांकि, चीन के साथ व्यापारिक और भौगोलिक संबंधों का महत्व अब भी बना हुआ है।