चीन कैसे बदल रहा है दुनिया भर में गेमिंग का कारोबार?

चीन में 70 करोड़ से ज्यादा लोग वीडियो गेम खेलते हैं. इस लिहाज से यह दुनिया का सबसे बड़ा गेमिंग बाजार है,;

Update: 2026-10-17 05:16 GMT

चीन दुनिया का सबसे बड़ा गेमिंग बाजार है, लेकिन यहां गेमिंग को लेकर बहुत सख्त नियम लागू हैं. इन नियमों का असर सिर्फ चीन में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में गेम खेलने वालों पर भी पड़ता है.

जमीन के नीचे एक अंधेरी जगह पर तेल के कुछ दीये जल रहे हैं. उनकी हल्की रोशनी में एक साथी राइफल के साथ कुछ कर रहा है. पत्थर की खुरदरी दीवार पर एक लाल झंडा लगा है. उस पर सफेद तारे के अंदर हथौड़ा और हंसिया बने हैं. यह चीनी मजदूरों और किसानों की ‘रेड आर्मी' का निशान है. जमीन पर हथियार बिखरे पड़े हैं. उनमें से एक उठाया जाता है और अगला दृश्य बर्फ से ढके जंगल का है, जहां पेड़ों के बीच गोलीबारी शुरू हो जाती है.

ऐसा दृश्य मशहूर वीडियो गेम ‘कॉल ऑफ ड्यूटी' के किसी नए वर्जन में फिट हो सकता है. यह एक बहुत लोकप्रिय ‘फर्स्ट-पर्सन शूटर' गेम है, जो खिलाड़ियों को अतीत, वर्तमान और भविष्य के युद्ध के मैदानों में ले जाता है. लेकिन यह दृश्य वास्तव में ‘द डिफाएंट' गेम का है. डिफाएंट का मतलब होता है निडर विद्रोही. इस गेम को चीन के हांगजोउ शहर में ‘हूथेन्स टेक्नोलॉजी' नाम का स्टूडियो बना रहा है. यह 1930 और 1940 के दशक की कहानी है, जिसमें चीनी सेना जापानी सेना का मुकाबला करती है.

इस गेम को बनाने वाले कॉनर शू ने डीडब्ल्यू को बताया कि इस गेम में दिखाए गए हथियार बिल्कुल अनोखे हैं. उनका इस्तेमाल सिर्फ एशिया में हुआ था, इसलिए पश्चिमी देशों के ज्यादातर खिलाड़ी इनके बारे में नहीं जानते. यही बात इसकी कहानी पर भी लागू होती है. कॉनर शू के मुताबिक, ऐसी कहानी पहले कभी किसी वीडियो गेम में नहीं दिखाई गई है.

‘द डिफाएंट' का मकसद दुनिया भर के गेमर्स को आकर्षित करना भी है. सख्त नियमों, सेंसरशिप और वीडियो गेम कंसोल पर पहले लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद चीन ने कुछ ही वर्षों में वैश्विक गेमिंग उद्योग में अपनी मजबूत जगह बना ली है.

रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है वीडियो गेम

चीन में 70 करोड़ से ज्यादा लोग नियमित रूप से वीडियो गेम खेलते हैं. मार्केट रिसर्च कंपनी ‘न्यूजू' के मुताबिक, ज्यादातर लोग गेमिंग को अपने जीवन का एक अहम हिस्सा मानते हैं. कई लोग दोस्तों के संपर्क में रहने के लिए गेम खेलते हैं.

गेम डेवलपर शू कहते हैं, "गेम जिंदगी को ज्यादा रोमांचक बनाते हैं. इनके जरिए मैं अलग-अलग भूमिकाएं निभा सकता हूं, अलग-अलग कहानियों का अनुभव कर सकता हूं और नए किरदारों को जी सकता हूं. हमारी जिंदगी तो एक ही होती है, लेकिन गेम के जरिए हम किसी दूसरी कहानी का हिस्सा बन सकते हैं. मुझे लगता है कि चीनी यूजर्स को यह बात काफी आकर्षित करती है.”

चीन में लोग ज्यादातर कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर गेम खेलते हैं. वहां गेमिंग कंसोल उतने आम नहीं हैं. इसकी एक पुरानी वजह है. 2000 के दशक की शुरुआत में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि प्लेस्टेशन बेहतर है या एक्सबॉक्स. लेकिन चीन में 2000 से 2014 तक इन डिवाइसों को आधिकारिक तौर पर बेचा नहीं जाता था. चीनी अधिकारियों का कहना था कि ये पाबंदियां इसलिए लगाई गई थीं, ताकि बच्चों और किशोरों को गेमिंग की लत से बचाया जा सके.

गेम खेलने से जुड़ी सीमाएं और कड़े नियंत्रण

चीन में नाबालिगों को फिलहाल हफ्ते में तीन घंटे से ज्यादा ऑनलाइन गेम खेलने की अनुमति नहीं है. वयस्कों के लिए ऐसी कोई समय-सीमा तो नहीं है, लेकिन गेमिंग पर कड़े नियंत्रण लागू हैं. जो कोई भी गेम खेलना चाहता है, उसे अपने असली नाम और एक पर्सनल आइडेंटिफिकेशन नंबर (पहचान संख्या) का इस्तेमाल करके रजिस्टर करना पड़ता है. इससे सरकार को यह ट्रैक करने में मदद मिलती है कि कौन, क्या, कब और किसके साथ खेल या बातचीत कर रहा है.

यहां एक ऐसा ‘ग्रे एरिया' (अस्पष्ट स्थिति) भी है, जिसे चीनी सरकार नजरअंदाज कर देती है. कुछ खिलाड़ी वीपीएन का इस्तेमाल करके लॉग-इन करते हैं, जिससे उन्हें उन गेम का ऐक्सेस मिल जाता है जो आधिकारिक तौर पर चीन में उपलब्ध नहीं हैं. कुछ युवा खिलाड़ी गेमिंग के समय की पाबंदियों से बचने के लिए अपने माता-पिता के अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं.

चीन में कम उम्र के बच्चों और किशोरों के गेम खेलने पर सख्त नियम हैं. इसके बावजूद, वहां वीडियो गेम की लोकप्रियता और स्वीकार्यता बढ़ती गई है. चीन को समझ आ गया है कि गेमिंग उद्योग से बहुत पैसा कमाया जा सकता है. शुरुआत में चीन के खिलाड़ियों के लिए रिलीज किए जाने वाले गेम अक्सर पश्चिमी देशों के गेम जैसे ही होते थे. इसी समय टेनसेंट और नेटईज जैसी चीनी टेक कंपनियों ने पश्चिमी देशों की कई गेमिंग कंपनियों में निवेश किया.

लाइसेंस नहीं? तो चीन में बिक्री भी नहीं

चीन के गेमिंग बाजार की एक खास बात यहां का लाइसेंसिंग सिस्टम है. पत्रकार जॉर्ज ई. ऑसबर्न ने डीडब्ल्यू से कहा, "दुनिया के अन्य बड़े वीडियो गेम बाजारों के विपरीत, चीन में वीडियो गेम का एक ऐसा बाजार है जो कड़े नियमों और लाइसेंसिंग के दायरे में आता है.”

ऑसबर्न वीडियो गेम के मुद्दों पर गैर-सरकारी संगठनों और सरकारों को सलाह देते हैं. उन्होंने ‘गेम्सकॉम' कांग्रेस में भी बात रखी थी. अपनी किताब ‘पावर प्ले' में उन्होंने बताया है कि किस तरह सत्तावादी देश अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए वीडियो गेम का इस्तेमाल करते हैं.

चीन में गेम बेचने के लिए लाइसेंस जरूरी है. लाइसेंस नहीं, तो बिक्री नहीं. ऑसबर्न कहते हैं, "चीन में गेम रिलीज करने के लिए डेवलपर को प्रचार मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय से कई स्तरों पर अनुमति लेनी पड़ती है.”

वीडियो गेम के लिए कड़े नियम

अन्य प्रतिबंधों के अलावा, गेम में ऐसी कोई भी सामग्री नहीं हो सकती जो चीन की एकता, संप्रभुता या क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा पैदा करे. अश्लील सामग्री और जुए पर भी रोक है. गेम में ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाले अपराधों को बढ़ावा दे या ऐसी जानकारी फैलाए जिससे अधिकारियों के अनुसार सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ सकती है.

ऑसबर्न कहते हैं, "इन नियमों को जानबूझकर इस तरह बनाया गया है कि उनका मतलब साफ न हो.” इसलिए किसी गेम में नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह तय करना उनकी व्याख्या पर निर्भर करता है. कभी-कभी गेम रिलीज होने के बाद भी उसमें बदलाव किए जाते हैं. उदाहरण के लिए, 2025 में रिलीज हुए गेम ‘वुचांग: फॉलन फीदर्स' में मिंग राजवंश की मशहूर चीनी हस्तियों पर आधारित दुश्मनों को अचानक मारा नहीं जा सकता था. इसके बजाय, वे बस थकान के कारण गिर जाते थे.

चीनी संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिट कराने में मददगार गेम

चीन में बना एक्शन रोल-प्लेइंग गेम ‘ब्लैक मिथ: वुकॉन्ग' 2024 में दुनिया भर में अचानक बहुत लोकप्रिय हो गया. इससे पता चला कि चीनी गेम डेवलपर सिर्फ अपने देश के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के गेमर्स के लिए भी रोचक गेम बना सकते हैं. यह गेम 16वीं सदी में लिखी गई चीन की मशहूर किताब ‘जर्नी टू द वेस्ट' से प्रेरित है.

ऑसबर्न को लगता है कि दुनिया भर के लोगों को चीनी संस्कृति से परिचित कराने में कुछ गलत नहीं है. उनका कहना है कि असली सवाल यह है कि खुद इन गेम में सरकार का कितना दखल होता है. वह कहते हैं, "गेम खेलने वाले लोग आम तौर पर ऐसी चीजों पर आसानी से भरोसा नहीं करते हैं. वे समझ जाते हैं कि कोई उन्हें कुछ बेचने की कोशिश कर रहा है या किसी खास विचार का प्रचार कर रहा है. इसलिए, अगर यह बात बहुत साफ दिखाई देगी, तो उसका असर नहीं होगा.”

सेल्फ-सेंसरशिप की समस्या

लाइसेंसिंग सिस्टम की वजह से, अगर पश्चिमी डेवलपर चीन में अपने गेम बेचना चाहते हैं, तो उन्हें वहां की सरकारी शर्तों को मानना पड़ता है. ऑसबर्न कहते हैं कि कंपनियां चीन में अपने गेम बेचना चाहती हैं, क्योंकि वहां का बाजार बहुत बड़ा है और उसे छोड़ना आसान नहीं है. वह कहते हैं, "लेकिन इससे दुनिया भर में गेम बनाने की आजादी और रचनात्मकता पर क्या असर पड़ेगा, यह भी सोचना जरूरी है. डेवलपर को खुद से पूछना चाहिए कि वे किन बातों पर समझौता कर सकते हैं और किन पर नहीं.”

उन्हें डर है कि असली खतरा सेल्फ-सेंसरशिप से है. डेवलपर खुद ही अपने गेम में कुछ चीजें दिखाना बंद कर देंगे. उदाहरण के लिए, वे क्वीर यानी एलजीबीटीक्यू+ किरदारों को गेम से हटा सकते हैं. उनके मुताबिक, यह एक बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि गेम कई लोगों को अपनी पहचान समझने और जानने में मदद करते हैं.

चीन ही नहीं, दूसरे देशों में भी वहां के नियमों के हिसाब से गेम में बदलाव किए जाते हैं. जर्मनी में स्वास्तिक जैसे कुछ प्रतीक गेम में नहीं दिखाए जा सकते, क्योंकि वे देश के संविधान के खिलाफ हैं. लेकिन अगर किसी गेम का मकसद इतिहास की घटनाओं को याद रखना और उनसे सीखना है, तो उसे इसकी अनुमति मिल सकती है. जर्मनी में गेम के स्थानीय संस्करणों से बहुत ज्यादा हिंसा वाले दृश्य भी हटाने पड़ते हैं.

चीन में भी हिंसा को बढ़ावा देना मना है. फिर भी शू की टीम को युद्ध वाला गेम बनाने की इजाजत मिली है. ऐसा कैसे? शू कहते हैं, "मेरे हिसाब से इस गेम में हिंसा सबसे जरूरी चीज नहीं है. सबसे महत्वपूर्ण है इतिहास को सामने लाना.” शू का कहना है कि उनकी टीम एक ऐसा गेम बनाना चाहती है जो ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक हो. वे इसमें कितने सफल होते हैं, यह तय करना इतिहासकारों का काम होगा.

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