अमेरिका-ईरान वार्ता की सफल मेजबानी के लिए पाकिस्तान पर बढ़ता दबाव
इस वार्ता की सफलता पर काफी कुछ दांव पर लगा है. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह मध्यस्थता के लिए तैयार है. क्षेत्रीय युद्ध की आशंका, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए जोखिम है
इस वार्ता की सफलता पर काफी कुछ दांव पर लगा है. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह मध्यस्थता के लिए तैयार है. क्षेत्रीय युद्ध की आशंका, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए जोखिम है.
पाकिस्तान ने अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में अहम मध्यस्थ बनने के कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं. वह ईरान और अमेरिका, दोनों के साथ अपने अच्छे संबंधों के जरिए बातचीत कराने की कोशिश कर रहा है.
वैसे तो दोनों देशों के बीच युद्ध थमता दिख नहीं रहा, लेकिन फिर भी पाकिस्तान ने 29 मार्च को तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक की. इसका उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की नींव रखना है.
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इस मीटिंग के बाद विदेश मंत्री इसहाक डार ने कहा, "आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच अर्थपूर्ण बातचीत की मेजबानी करने और उसे बेहतर दिशा में आगे बढ़ाने पर" पाकिस्तान को गर्व होगा. उन्होंने आगे कहा, "पाकिस्तान को खुशी है कि ईरान और अमेरिका दोनों ने बातचीत के लिए हमपर अपना भरोसा जताया है." हालांकि, उन्होंने इससे संबंधित कोई अन्य जानकारी साझा नहीं की.
ईरान और अमेरिका के विरोधाभासी बयान
अभी तक यह साफ नहीं है कि बातचीत सीधे तौर पर होगी या किसी अन्य तरीके से. बल्कि, अमेरिका और ईरान ने तो अभी तक मुहर भी नहीं लगाई है कि बातचीत का आगे बढ़ना निश्चित है या नहीं. बातचीत को लेकर दोनों देशों के बयान भी एक दूसरे से अलग हैं और कोई स्पष्टता नहीं देते हैं.
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29 मार्च को ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद कलीबाफ ने पाकिस्तान में प्रस्तावित बातचीत की योजना को "हमले का बहाना" बताया. चूंकि, जिस समय बातचीत का प्रस्ताव रखा जा रहा था, उसी समय करीब 2,500 अमेरिकी मरीन सैनिक मध्य पूर्व पहुंचे. कालिबाफ ने उन्हें "आग में झोंकने" की धमकी दी.
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पहले भी ईरान ने पाकिस्तान के जरिए भेजी गई अमेरिका की 15 बिंदुओं वाली शांति योजना को "अतिशय, अनुचित और अवास्तविक" कहकर खारिज कर दिया था. इस योजना के तहत ईरान से परमाणु कार्यक्रम (न्यूक्लियर एनरिचमेंट) बंद करने, परमाणु ठिकानों को खत्म करने और होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही खोलने की मांग की गई थी.
फिर 31 मार्च को ईरानी विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के उस दावे को भी गलत बताया कि दोनों देशों के बीच युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत चल रही है. मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "अभी तक हमारी कोई सीधी बातचीत नहीं हुई है."
उधर ट्रंप कई बार संकेत दे चुके हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी-न-किसी रूप में बातचीत आगे बढ़ रही है. हालांकि, हाल ही में सोशल मीडिया के जरिए उन्होंने यह धमकी भी दी कि अगर ईरान जल्द "समझौता" नहीं करता है और होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खोलता है, तो वह ईरान की ऊर्जा सुविधाओं को "पूरी तरह नष्ट" कर देंगे.
संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है पाकिस्तान
अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी विश्लेषक रजा रूमी ने डीडब्ल्यू को बताया कि पाकिस्तान तीनों देशों के साथ अपने रिश्तों का फायदा उठाकर मध्यस्थता करना चाहता है, ताकि वह अपनी कूटनीतिक अहमियत को फिर से बढ़ा सके. वह खुद को ऐसे विश्वसनीय देश के रूप में पेश करना चाहता है जो अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों से बात कर सकता है.
रजा रूमी ने कहा, "अमेरिका-ईरान का तनाव सीधे तौर पर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है, क्योंकि पाकिस्तान खाड़ी देशों से मिलने वाली ऊर्जा (तेल-गैस) और वहां काम करने वाले लोगों के जरिए आने वाले पैसे पर काफी हद तक निर्भर है."
पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता और ईरान के साथ सांस्कृतिक संबंध व 900 किलोमीटर लंबी सीमा के कारण पाकिस्तान को बहुत संभलकर अपने कूटनीतिक फैसले लेने की आवश्यकता है. रजा रूमी के अनुसार, "मध्यस्थता करने से पाकिस्तान खुद को शांति बनाए रखने वाले देश की तरह पेश कर सकता है और बड़े युद्ध के बुरे असर से भी खुद को सुरक्षित रख सकता है."
डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर हुए हैं. ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर से दो बार मुलाकात की और उन्हें "मेरा पसंदीदा फील्ड मार्शल" कहकर भी बुलाया.
पूर्व में मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट और अटलांटिक काउंसिल के लिए काम कर चुकीं ईरान-पाकिस्तान मामलों की विशेषज्ञ फातिमा अमन ने डीडब्ल्यू को बताया कि पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में है, जो अमेरिका और ईरान दोनों से ही बात कर सकता है और दोनों ही देश उसकी बात को खारिज नहीं करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान इस संघर्ष को संभालना चाहता है क्योंकि यह जल्दी ही देश के अंदर भी समस्या पैदा कर सकता है.
पाकिस्तान को क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की चिंता
पाकिस्तान पहले ही अपने पड़ोसी देश अफगानिस्तान में तालिबान के साथ तनाव में है. इसके अलावा, ईरान सीमा से लगने वाले बलूचिस्तान प्रांत में भी अलगाववादी समूहों से उसे खतरा बना हुआ है. अमन के अनुसार, "स्थिति काफी गंभीर है. ईरान में अस्थिरता का सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा, बलूचिस्तान की सुरक्षा से लेकर तेल-गैस की उपलब्धता और देश की अंदरूनी स्थिरता तक."
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत नाकाम हो जाती है और लंबा युद्ध शुरू होता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति प्रभावित होगी. इससे पाकिस्तान की पहले से कमजोर पड़ी अर्थव्यवस्था और भी ज्यादा बिगड़ सकती है.
विश्लेषक रूमी के अनुसार, "अगर यह कोशिश नाकाम होती है, तो पाकिस्तान को तुरंत आर्थिक और सुरक्षा झटके लग सकते हैं. ऊर्जा आपूर्ति, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली सप्लाई रुकती है, तो महंगाई बढ़ेगी और सरकार पर आर्थिक दबाव और बढ़ जाएगा. साथ ही, ईरान से लगने वाली पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर भी खतरा बढ़ सकता है, जैसे शरणार्थियों का आना और विद्रोही गतिविधियों में बढ़ोतरी."
ईरान युद्ध के चलते खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर संकट
साथ ही, लंबे समय तक युद्ध चलने की स्थिति में ईरान से लगी पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा स्थिति को खतरा हो सकता है. अमन ने कहा कि इसका मतलब होगा कि व्यापार के रास्तों पर भरोसा कम हो जाएगा और पूरे क्षेत्र में सुचारू संचालन मुश्किल हो जाएगा.
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उन्होंने कहा, "युद्ध के लंबा चलने की स्थिति में ईरान-पाकिस्तान सीमा पर दबाव बढ़ेगा. इससे उग्रवादी समूहों को सक्रिय होने का मौका मिलेगा और देश के अंदर अस्थिरता का जोखिम बढ़ जाएगा. यहां समस्या यह नहीं है कि पाकिस्तान कूटनीतिक तौर पर सफल होगा या नहीं. असल समस्या है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो पाकिस्तान को इसके बुरे असर झेलने ही पड़ेंगे. चाहे वह चाहे या नहीं."
पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की भूमिका
पिछले एक दशक से पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक मजबूत साझेदारी बनाई हुई है. दोनों देशों के बीच एक रक्षा समझौता भी है, जिसमें यह वादा किया गया है कि अगर एक देश पर हमला होता है तो उसे दोनों पर हमला माना जाएगा. हालांकि, पाकिस्तान के ईरान के साथ भी गहरे संबंध हैं.
अगर खाड़ी देश इस संघर्ष में शामिल होते हैं और युद्ध बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाए रखना काफी मुश्किल हो सकता है. जैसा कि रजा रूमी कहते हैं, "अगर सऊदी अरब युद्ध में शामिल होता है, तो पाकिस्तान पर कम-से-कम "प्रतीकात्मक समर्थन" देने का दबाव तो होगा ही. हालांकि, सीधे सैन्य रूप से शामिल होना पाकिस्तान के लिए अस्थिर और गलत फैसला हो सकता है."
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उन्होंने आगे कहा, "पाकिस्तान शायद सिर्फ रक्षा से जुड़ी मदद तक ही सीमित रहेगा. जब तक पाकिस्तान सीधे युद्ध में शामिल नहीं होता, तब तक ईरान उसे मुख्य दुश्मन नहीं मानेगा. लेकिन, अगर पाकिस्तान सऊदी अरब का थोड़ा भी साथ देता है, तो सीमा पर तनाव बढ़ सकता है, परोक्ष हमले हो सकते हैं और आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है." पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह ईरान को दुश्मन की तरह नहीं देख सकता, भले ही सऊदी अरब उससे सैन्य मदद भी मांगे.
अमन के अनुसार, "अगर सऊदी अरब सीधे युद्ध में शामिल होता है, तो पाकिस्तान पर दबाव जरूर पड़ेगा. लेकिन, दबाव का मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान भी युद्ध में कूदेगा. पाकिस्तान पहले भी मध्य पूर्व के युद्धों से दूर ही रहा है, क्योंकि उसमें शामिल होने के बड़े नुकसान हो सकते हैं. जैसे देश के अंदर सांप्रदायिक तनाव बढ़ना, सीमा पर अस्थिरता और आर्थिक दबाव."
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उन्होंने आगे यह भी कहा कि ईरान द्वारा सीधे तौर पर पाकिस्तान के हितों पर हमला करने की संभावना कम ही है. लेकिन, अगर माना जाता है कि वह ईरान पर हो रही सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रहा है, तो खतरा बढ़ सकता है. ऐसी स्थिति में ईरान सीधे तौर पर आमना-सामना करने के बजाय सीमा पर तनाव बढ़ाकर या अपने सहयोगी समूहों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान पर दबाव बना सकता है.
सांप्रदायिक हिंसा का खतरा
पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास, ईरान युद्ध के और बढ़ने की स्थिति में आंतरिक अस्थिरता के खतरे को और बढ़ा देता है. ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम बहुल देश है और पाकिस्तान में रहने वाले शिया मुसलमानों का उससे गहरा सांस्कृतिक संबंध है.
युद्ध के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई के मारे जाने के बाद गिलगित बल्तिस्तान में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. हालात बिगड़ने पर वहां सेना तैनात करनी पड़ी थी. साथ ही, तीन दिन का कर्फ्यू भी लगाना पड़ा था.
इन प्रदर्शनों में कम-से-कम 23 लोगों की मौत हुई. विरोध प्रदर्शनों में ज्यादातर हिस्सेदारी पाकिस्तान के शिया समुदाय की थी. पाकिस्तान की करीब 25 करोड़ आबादी में लगभग 15 से 20 फीसदी शिया मुसलमान हैं. वे ऐतिहासिक रूप से ईरान से जुड़ी घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया देते रहे हैं.
रूमी के अनुसार, "पाकिस्तान में सांप्रदायिक तनाव का इतिहास रहा है, लेकिन देश ने बड़े स्तर की हिंसा को रोकने के तरीके विकसित कर लिए हैं. ऐसे में अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध होता है, तो तुरंत हिंसा नहीं होगी लेकिन बाहर से आने वाले विचारों और उग्र समूहों की वजह से धीरे-धीरे समाज में बंटवारा बढ़ सकता है." उन्होंने आगे कहा, "इसमें सबसे निर्णायक यह होगा कि सरकार लोगों तक पहुंच रहे संदेश, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संकेत को कैसे संभालती है."
दूसरी तरफ, अमन ने कहा कि ईरान से जुड़ी घटनाओं का असर "अक्सर पाकिस्तान के अंदर महसूस होता है," लेकिन इस बार मामला सिर्फ सांप्रदायिकता तक ही सीमित नहीं है. उन्होंने कहा, "पाकिस्तान पर कई तरह के दबाव हैं जैसे सुरक्षा, आर्थिक दिक्कतें और क्षेत्रीय अनिश्चितता. इसमें सबसे बड़ा खतरा यह है कि बाहरी संघर्ष देश के अंदर मौजूद कई समस्याओं को एक साथ बढ़ा सकता है, जिसे पाकिस्तान रोकने की कोशिश कर रहा है."