सूखे से परेशान जर्मनी, क्या अब महंगा होगा खाना?
जर्मनी के मुख्य किसान संघ ने चेतावनी दी है कि सूखे और भीषण गर्मी से फसलों को पहुंचे नुकसान के कारण इस बार पैदावार औसत से कम रहेगी. क्या कम पैदावार का महंगाई भड़काएगी;
जर्मनी के मुख्य किसान संघ ने चेतावनी दी है कि सूखे और भीषण गर्मी से फसलों को पहुंचे नुकसान के कारण इस बार पैदावार औसत से कम रहेगी. क्या कम पैदावार का महंगाई भड़काएगी.
जर्मनी के मुख्य किसान संघ ने चेतावनी के बाद डीडब्ल्यू यह समझने की कोशिश कर रहा है कि कम पैदावार से खाने-पीने की चीजों की कीमतों और राशन के बिल पर क्या असर पड़ सकता है. जानिए जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्यान्न संकट के अलग अलग आयाम.
1. जर्मनी में 2026 में फसल की पैदावार पर कितना असर होगा?
जर्मन किसान संघ (डीबीवी) ने मध्य अगस्त में चेतावनी दी कि लगातार सूखे के कारण फसल की पैदावार ‘औसत से कम' होगी, क्योंकि खेतों का बहुत बड़ा हिस्सा बुरी तरह से सूख चुका है और जमीन प्यासी पड़ी है.
एक बयान में, डीबीवी के अध्यक्ष योआखिम रुकवीड ने चेतावनी दी कि देश में अनाज की पैदावार पिछले साल की तुलना में 7 फीसदी कम रहेगी. उन्होंने इसका कारण "बहुत ज्यादा सूखी बसंत ऋतु और जून के दूसरे भाग में पड़ी भीषण गर्मी” को बताया, जिसने "कई फसलों को काफी नुकसान पहुंचाया.”
डीबीवी ने कहा कि इस साल अनाज का कुल उत्पादन 41.9 मिलियन टन होने का अनुमान है, जो 2025 की तुलना में लगभग 3.3 मिलियन टन कम है.
रेपसीड (सरसों जैसी एक फसल का तिलहन) की पैदावार में सबसे बड़ी गिरावट आई. इसकी 3.3 मिलियन टन फसल हुई, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 17 फीसदी कम है. वहीं, कम पैदावार के बावजूद जौ का उत्पादन पिछले साल के स्तर पर ही रहा, क्योंकि इसे उगाने के लिए ज्यादा जमीन का इस्तेमाल किया गया था.
डीबीवी ने कहा कि आलू की फसल भी औसत से कम रहने की उम्मीद है और कुछ इलाकों में चुकंदर की फसल "काफी खराब” हो सकती है. रुकवीड का कहना है कि इस बार खेती में यह बात बहुत मायने रख रही है कि खेत किस इलाके में है. उन्होंने बताया कि खासकर दक्षिण और पश्चिम जर्मनी में फसलें बहुत कम हुई हैं और कई जगहों पर तो पूरी की पूरी फसल ही बर्बाद हो गई है.
इसके अलावा, जर्मनी के फेडरल स्टैटिस्टिकल ऑफिस ने चेतावनी दी है कि पिछले साल की तुलना में देश में सेब की फसल में 18 फीसदी की कमी आने का अनुमान है.
जर्मन मौसम विभाग के अनुसार, जर्मनी इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी वाले मौसम के बीच भीषण सूखे का सामना कर रहा है. मार्च से ही बारिश बहुत कम हो रही थी और अब इस भीषण गर्मी ने हालात को और भी बिगाड़ दिया है.
2. सूखे का असर खाने-पीने की चीजों की कीमतों और उनकी उपलब्धता पर कैसे पड़ेगा?
कृषि मंत्री आलोइस रेनर ने मंगलवार को सरकारी ब्रॉडकास्टर ‘जेडडीएफ' को बताया कि मंत्रियों को "तुरंत दाम बढ़ने की उम्मीद नहीं है.” हालांकि, उन्होंने इस बात की गुंजाइश छोड़ दी कि ग्राहकों को किराना सामान के लिए ज्यादा पैसे देने में कुछ वक्त लग सकता है, यानी आगे चलकर दुकानों पर राशन थोड़ा महंगा हो सकता है.
हालांकि, 1,600 कृषि सहकारी समितियों का प्रतिनिधित्व करने वाले जर्मन राइफआइजन एसोसिएशन (डीआरवी) के प्रबंध निदेशक फिलिप श्पिने ने डीडब्ल्यू को बताया कि उनके सदस्यों को खेतों में ही 60 करोड़ यूरो का ‘सीधा नुकसान' हो चुका है.
श्पिने ने चेतावनी दी, "फिलहाल, खेती और सप्लाई चेन से जुड़े कई क्षेत्रों में लागत नहीं निकल पा रही है.” उन्होंने बताया कि खाद, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत किस तरह किसानों पर दबाव बढ़ा रही हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जर्मनी के पास पिछले साल की फसल का 20 लाख टन अनाज का सरप्लस यानी अतिरिक्त भंडार है, जिससे ब्रेड की कीमतों को बढ़ने से रोका जा सकता है. फिर भी, रेपसीड और चुकंदर के उत्पादन में आई भारी गिरावट से घरेलू खाद्य तेल और चीनी की आपूर्ति पर दबाव पड़ सकता है. इस कमी को पूरा करने के लिए आयात की जरूरत पड़ेगी.
स्थानीय मीडिया ने पिछले हफ्ते खबर दी कि सूखे के कारण कई राज्यों में पशु चारे के स्टॉक में भारी गिरावट आई है, खासकर दक्षिणी जर्मनी में. जर्मन किसान संघ ने पहले भी चेतावनी दी थी कि अगर अनाज कम पैदा होगा और मवेशियों के चरने के लिए घास कम उगेगी, तो जाहिर है कि चिकन-मीट, दूध और अंडों के दाम भी ऊपर भागेंगे.
देश के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में, आपूर्ति कम होने से आलू और दूसरी सब्जियों के दाम बढ़ सकते हैं. हालांकि, ज्यादातर खरीदारों को सामान की किल्लत तो शायद ही झेलनी पड़े, लेकिन हां, धीरे-धीरे चीजों के दाम बढ़ने से जेब पर बोझ जरूर बढ़ेगा.
3. यह सूखा खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को कैसे बढ़ाता है?
कोरोना महामारी के बाद से जर्मनीा और दुनिया भर में खेती पर बार-बार दबाव पड़ा है. पिछले महीने जारी हुए सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2020 से अब तक जर्मनी में खाने-पीने की चीजों के दाम 36 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ चुके हैं. सरकार के हिसाब से, पोल्ट्री मीट, दूध से बने कई उत्पादों, अंडे, खाने वाले तेल, बटर और चीनी की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
साल 2022 में रूस-यूक्रेन जंग की वजह से ब्लैक सी से होने वाली यूक्रेनी अनाज की सप्लाई ठप पड़ गई थी और ईंधन महंगा हो गया था. इसका सीधा असर खाद, ट्रांसपोर्ट और फूड प्रोसेसिंग से जुड़े खर्चों पर पड़ा.
इसके बाद, ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया. इससे खाड़ी के देशों से निकलने वाले तेल, गैस और खाद सप्लाई के रास्ते सुन्न पड़ गए. इस लड़ाई ने डीजल, उर्वरक और कीटनाशकों को इतना महंगा कर दिया है कि कई किसानों ने तो खेतों में खाद, पोषण डालना ही कम कर दिया है.
उद्योग जगत ने चेतावनी दी है कि पिछले छह सालों से एक के बाद एक आए संकटों ने जर्मन कृषि क्षेत्र के एक बड़े हिस्से की आर्थिक हालत बिगाड़ दी है. कई किसानों का कहना है कि वे बहुत ज्यादा बढ़ती लागतों और बढ़ते कर्ज का सामना कर रहे हैं. अब उनके पास आगे होने वाले नुकसान को झेलने की बहुत कम गुंजाइश बची है.
4. जर्मन किसान किस तरह की मदद चाहते हैं?
जर्मन किसान संघ ने कहा कि कुछ किसानों को अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए अंतरिम वित्तपोषण (तुरंत आर्थिक मदद) की जरूरत हो सकती है. रुकवीड ने बर्लिन (जर्मन सरकार) से कृषि क्षेत्र की मदद के लिए एक ‘तत्काल पैकेज' शुरू करने की मांग की है. उनकी सिफारिशों में यूरोपीय संघ के उर्वरक सहायता पैकेज को 6 करोड़ यूरो से बढ़ाकर 18 करोड़ यूरो करना शामिल है, जिसका भुगतान तेजी से और बिना किसी कागजी अड़चन के किया जाए.
डीबीवी ने मंत्रियों से मांग की है कि कम से कम नवंबर के आखिर तक खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल पर टैक्स कम किया जाए. साल 2023 के अंत से कई महीनों तक, जर्मन किसानों ने खेती के लिए मिलने वाली ईंधन सब्सिडी खत्म करने की योजनाओं के विरोध में ट्रैक्टरों से राजमार्ग जाम कर दिए थे. बाद में, इस फैसले को आंशिक रूप से वापस ले लिया गया था.
कृषि मंत्री राइनर ने किसानों को खास मदद देने का वादा किया है, लेकिन यह मदद तभी मिलेगी जब अगस्त के आखिर में भरोसेमंद सरकारी आंकड़े मिल जाएंगे.