2027 में अफ्रीका में पहला डिपोर्टेशन सेंटर बनाने की तैयारी में ईयू के देश

ईयू से बाहर के उन लोगों के लिए अफ्रीका में डिपोर्टेशन सेंटर बनाने की योजना बनी है जिनकी शरण की अर्जी खारिज हो चुकी है.;

Update: 2026-10-03 06:32 GMT

ग्रीस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड्स, ईयू से बाहर के उन लोगों के लिए डिपोर्टेशन सेंटर बनाने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं जिनकी शरण की अर्जी खारिज कर दी गई है.

डिपोर्टेशन सेंटर यानी निर्वासन केंद्र कानूनी तौर पर विवादित और महंगे होते हैं. इन्हें लेकर राजनीतिक विवाद भी होता रहता है. वर्षों से ब्रसेल्स, ईयू से बाहर के उन लोगों के लिए ऐसे केंद्र बनाने के मुद्दे से जूझ रहा है जिनकी शरण की अर्जी नामंजूर हो गई है. कानूनी आपत्तियों के कारण पहले की कोशिशें नाकाम रही हैं, लेकिन अब ग्रीस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड्स का ‘पांच देशों का समूह' मानता है कि उसने इन बाधाओं को पार कर लिया है.

ग्रीक टीवी चैनल ‘एएनटी1' को दिए एक इंटरव्यू में, ग्रीस के प्रवासन मामलों के मंत्री थानोस प्लेवरिस ने कहा कि इन तथाकथित ‘रिटर्न हब' में से पहला हब 2027 की दूसरी छमाही में चालू हो जाएगा. यह ठीक वही समय है जब ग्रीस ईयू काउंसिल की अध्यक्षता संभालेगा.

प्लेवरिस ने कहा कि ग्रीस ने एक अफ्रीकी देश चुना है, लेकिन अभी उसका नाम नहीं बता सकते. ईयू के कूटनीतिक गलियारों और मीडिया की खबरों में रवांडा या युगांडा का नाम बार-बार सामने आता रहा है, लेकिन अभी तक इनमें से किसी भी देश के बारे में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

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बंद 'डिटेंशन सेंटर' नहीं, खुले केंद्र बनाने की योजना

प्लेवरिस ने कहा, "हम ऐसे केंद्रों की बात नहीं कर रहे हैं जहां शरण की अर्जी खारिज होने पर किसी व्यक्ति को किसी तीसरे देश में जेल जैसी बंद जगह में भेज दिया जाए.” उन्होंने आगे बताया कि असल योजना तो ‘ओपन फैसिलिटीज' यानी खुले सेंटर बनाने की है, ताकि जब तक उनके असली देश वापस भेजने का इंतजाम हो रहा हो तब तक वे वहां रह सकें.

इन केंद्रों में भेजे गए लोगों की जिम्मेदारी अफ्रीकी साझेदार देश को नहीं सौंपी जाएगी, ताकि मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए कानूनी कार्रवाई से बचा जा सके. यह जिम्मेदारी इसमें शामिल ईयू के पांच सदस्य देशों के पास ही रहेगी. ईयू का यह ‘पांच देशों का समूह' इस प्रोजेक्ट का पूरा खर्च भी खुद ही उठाएगा.

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यूएनएचसीआर या इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से भी इन अभियानों की निगरानी कराने की योजना है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का पालन हो रहा है.

हाल के वर्षों में, शरण से जुड़ी प्रक्रियाओं या लोगों को देश से बाहर भेजने के काम को ईयू से बाहर के देशों को सौंपने की कई कोशिशें की गई हैं. इनमें से कोई भी मॉडल योजना के मुताबिक काम नहीं कर पाया. कानूनी अड़चनों, सरकार बदलने या बहुत ज्यादा खर्च की वजह से ये सभी कोशिशें नाकाम रहीं. यहां कुछ मामलों की जानकारी दी गई है.

ब्रिटिश ‘रवांडा मॉडल' (2022–2024)

ब्रिटेन ने बोरिस जॉनसन की कंजर्वेटिव सरकार और बाद में ऋषि सुनक की सरकार के दौरान, उन प्रवासियों को स्थायी रूप से रवांडा भेजने की कोशिश की गई जो इंग्लिश चैनल के रास्ते गैर-कानूनी तरीके से देश में आए थे, ताकि वे वहां अपनी शरण की प्रक्रिया पूरी कर सकें.

हालांकि, ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को गैर-कानूनी घोषित कर दिया. अदालत ने पाया कि यह मानने के पर्याप्त कारण थे कि रवांडा भेजे गए शरण चाहने वालों को ‘रिफाउलमेंट' का वास्तविक खतरा था, यानी उन्हें वापस उन देशों में भेजे जाने का खतरा था जहां उन्हें उत्पीड़न या अन्य अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ सकता था.

इससे पहले, ब्रिटिश सरकार ने इस रवांडा साझेदारी और इसे लागू करने के चक्कर में करदाताओं का लगभग 715 मिलियन पाउंड (करीब 835 मिलियन यूरो या 966 मिलियन डॉलर) खर्च किया था. और इस भारी-भरकम खर्च के बदले में क्या हुआ? सिर्फ चार लोग ही अपनी मर्जी से रवांडा गए थे.

इटली का अल्बानिया मॉडल (जो 2024 से लागू है)

प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की अगुवाई में इटली ने अल्बानिया के साथ एक समझौता किया. इसके तहत, भूमध्य सागर में पकड़े जाने वाले प्रवासियों को सीधे अल्बानिया में बनाए गए इटली के केंद्रों में भेजा जाएगा, ताकि उनकी शरण की अर्जी पर तेजी से फैसला लिया जा सके.

हालांकि, कैंप खुलने के तुरंत बाद ही इटली की अदालतों ने प्रवासियों को वहां भेजने पर रोक लगा दी. जजों की दलील थी कि अगर बांग्लादेश या मिस्र जैसे देशों में कुछ खास समूहों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो उन देशों को सीधे तौर पर ‘सुरक्षित' नहीं माना जा सकता. नतीजतन, जिन प्रवासियों को सबसे पहले भेजा गया था, उन्हें तुरंत वापस इटली लाना पड़ा.

अब इटली इनमें से एक कैंप का इस्तेमाल सिर्फ उन पुरुषों के लिए ‘निर्वासन केंद्र' के तौर पर कर रहा है जिनकी इटली में शरण की अर्जियां पूरी तरह से नामंजूर हो चुकी हैं. मार्च 2025 में इसे डिपोर्टेशन सेंटर में बदलने के बाद से, वहां सिर्फ 500 लोगों को भेजा गया है. 2028 तक, इस पर कुल अनुमानित खर्च 670 मिलियन यूरो से ज्यादा होगा.

डेनमार्क की अलग-अलग पहल (2021–2023)

डेनमार्क ने 2021 में एक नया कानून पास किया था, ताकि शरण चाहने वाले लोगों को ईयू से बाहर किसी तीसरे देश भेजा जा सके. इसके तहत, कोपेनहेगन (डेनमार्क सरकार) ने रवांडा में एक विशेष रिसेप्शन सेंटर बनाने के लिए काफी बातचीत भी की, लेकिन यूरोपीय आयोग और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की जमकर आलोचना की.

आखिर 2023 की शुरुआत में डेनमार्क की सरकार ने रवांडा के साथ अपनी बातचीत रोक दी. इससे यह साफ हो गया कि डेनमार्क की इस योजना को कानूनी और लॉजिस्टिकल तौर पर जमीन पर उतारना नामुमकिन जैसा है. इसके बाद, डेनमार्क ने दूसरे यूरोपीय देशों के साथ मिलकर तीसरे देशों में डिपोर्टेशन और रिटर्न अरेंजमेंट्स (वापसी की व्यवस्था) बनाने पर ध्यान देना शुरू कर दिया.

कानूनी ढांचे में बदलाव

ईयू के पुराने कानून के तहत, तीसरे देशों में लोगों को वापस भेजने (डिपोर्टेशन) की कोशिशें अक्सर नाकाम हो जाती थीं, क्योंकि अदालतें यह शर्त रखती थीं कि प्रवासी का उस तीसरे देश से कोई निजी संबंध हो. मसलन, भाषा की जानकारी, वहां कोई रिश्तेदार रहता हो या वहां पहले रहने का अनुभव हो.

हालांकि, यूरोप के बदले हुए शरण कानून के तहत, अब कुछ खास हालात में उन लोगों को किसी सुरक्षित तीसरे देश भेजा जा सकता है जिनका उस देश से कोई पहले का निजी संबंध नहीं है, बशर्ते उस तीसरे देश के साथ कोई संबंधित समझौता या व्यवस्था हो.

पिछड़े देशों में पलायन से अमीर देशों को हुआ खूब फायदा

इस नई संयुक्त कोशिश का एक और आधार ‘ईयू रिटर्न रेगुलेशन' है, जिस पर 17 जून, 2026 को काउंसिल और यूरोपीय संसद के बीच राजनीतिक सहमति बनी थी. हालांकि, काउंसिल ने अभी तक औपचारिक रूप से इस नियम को नहीं अपनाया है. पहले के मुकाबले, नया कानून एक ‘ईयू रेगुलेशन' है, न कि सिर्फ एक ‘डायरेक्टिव' (निर्देश). नतीजतन, जब यह लागू होगा, तो यह सीधे ईयू के उन सदस्य देशों पर लागू होगा जो इससे जुड़े हैं. इस तरह, यह नियम ऐसे ‘रिटर्न सेंटरों' के लिए एक साझा ईयू ढांचा तैयार करता है.

इसके अलावा, नई योजनाओं के अनुसार, शरण देने की पूरी प्रक्रिया अब गैर-ईयू देशों को नहीं सौंपी जाएगी. ब्रिटेन और इटली ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. इसके बजाय, ये ‘रिटर्न हब' सिर्फ उन लोगों के लिए ट्रांजिट सेंटर की तरह काम करेंगे जिनकी शरण की अर्जियां कानूनी तौर पर पहले ही खारिज हो चुकी हैं. इसके अलावा, इन केंद्रों का खर्च व निगरानी ईयू सदस्य देश करेंगे.

निगरानी में कमी और ज्यादा खर्च का सवाल

समर्थकों को उम्मीद है कि इन कदमों से स्थायी शरण देने को लेकर मानवाधिकारों से जुड़े मुकदमों की गुंजाइश कम होगी. हालांकि, ‘डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे आलोचकों को अब भी कई बड़े खतरे नजर आते हैं. उन्हें संदेह है कि इन केंद्रों में स्वतंत्र निगरानी, प्रभावी कानूनी मदद और चिकित्सा सुविधाएं पूरी तरह सुनिश्चित की जा सकेंगी. उन्हें यह डर भी है कि तीसरे देश उचित जांच के बिना लोगों को उनके असुरक्षित मूल देशों में वापस भेज सकते हैं.

इसके अलावा, अब तक के अनुभव से पता चलता है कि ऐसे केंद्रों के निर्माण और सुरक्षा के साथ-साथ वहां भेजे जाने वाले लोगों के परिवहन पर अक्सर करोड़ों यूरो खर्च होते हैं. इसके बावजूद, वास्तव में वापस भेजे जाने वाले लोगों की संख्या काफी कम होती है.

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