बांग्लादेश की नई सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़
बांग्लादेश में करीब 19 महीने के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के गठबंधन वाली सरकार ने शपथ तो ले ली है. लेकिन उसके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है.
बांग्लादेश में करीब 19 महीने के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के गठबंधन वाली सरकार ने शपथ तो ले ली है. लेकिन उसके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है.
शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की गैर-मौजूदगी में हुए देश के 13वें संसदीय चुनाव में बीएनपी को दो-तिहाई ज्यादा बहुमत मिला है. खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान करीब 17 साल तक लंदन में निर्वासन में रहने के बाद बीते 25 दिसंबर को ढाका लौटे थे. उन्होंने जिया के निधन के बाद अपनी पार्टी को संगठित कर बहुत कम समय मनें उसे चुनावी कामयाबी तो दिला दी है. लेकिन उनकी असली परीक्षा अब शुरू होगी. स्थानीय अखबारों में छपी खबरों में बताया गया है कि नई सरकार पर 23 लाख करोड़ टका से भी ज्यादा कर्ज का बोझ है.
बांग्लादेश फिलहाल कानून-व्यवस्था के साथ ही पड़ोसी देशों से संबंधों के अलावा आर्थिक मोर्चे पर भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में इन तमाम मोर्चों पर चुनौतियों से निपटने के साथ ही तारिक रहमान के सामने राजनीतिक संतुलन साधने की भी जिम्मेदारी है. कभी उनकी सहयोगी रही जमात-ए-इस्लामी के मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरना सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है. राजनीतिक और सामाजिक हलकों में जमात अपने कट्टरपंथी रवैये के लिए बदनाम रही है.
क्या हैं सरकार की चुनौतियां?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वैसे तो सरकार के सामने चुनौतियों की सूची काफी लंबी है. लेकिन उसकी सबसे बड़ी और तात्कालिक चुनौती कानून व्यवस्था की स्थिति सुधारना और आर्थिक संकट पर काबू पाना है. उनका कहना है कि सरकार के सामने देश के लोगों के बीएनपी पर जताए गए भरोसे पर खरा उतरने के साथ ही उनकी उम्मीदों और अपनी उपलब्धियों के बीच एक बेहतर संतुलन बनाने की चुनौती है.
विश्लेषकों के मुताबिक, खासकर बीते करीब डेढ़ साल में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहद निचले स्तर तक पहुंच गई है. देश में मुद्रास्फीति आसमान छू रही है और अर्थव्यवस्था पर संकट गहरा रहा है. सरकार के सामने देश में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के साथ ही युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरने, बढ़ती बेरोजगारी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के साथ ही प्रशासनिक सुधारों को लागू करने और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में संतुलन की चुनौती है.
देश में बेरोजगारी की दर 13.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है. करीब चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं. बीएनपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में महिलाओं को भत्ता और गरीब परिवारों को फैमिली कार्ड देने जैसे कई लोकप्रिय वादे किए थे. सरकार के सामने इन योजनाओं के लिए धन जुटाने की भी चुनौती है.
बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमीगर ने पत्रकारों से बातचतचीत में कहा है कि सरकार तमाम चुनौतियों का राजनीतिक और आर्थिक नजरिए से मुकाबला करेगी. उनकी उम्मीद है कि अपने अतीत के अनुभव से पार्टी इन चुनौतियों से निपटने में कामयाब रहेगी.
बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान ने भी चुनावी नतीजों के बाद ढाका में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में माना था कि सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने, आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और सुशासन बहाल करने की गंभीर चुनौती है.
शेख हसीना के प्रत्यर्पण का क्या?
इसके अलावा अवामी लीग के प्रति सरकार के रवैये पर भी विश्लेषकों की निगाहें हैं. हालांकि तारिक रहमान कह चुके हैं कि शेख हसीना की संतान को भी स्वदेश लौट कर राजनीति में शामिल होने का अधिकार है. इससे अवामी लीग की उम्मीद बढ़ी है और विभिन्न शहरों में उसके दफ्तर खुलने लगे हैं.
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग पर लगी पाबंदी हटाने और शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर बीएनपी को चौतरफा दबावों का सामना करना पड़ सकता है.
ब्रसेल्स स्थित संगठन इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि नई सरकार के सामने बाकी तमाम चुनौतियों के अलावा अवामी लीग के मुद्दे पर राजनीतिक समझौते जैसी जटिल चुनौती भी होगी. पार्टी के राजनीतिक इतिहास और मजबूत जनाधार की वजह से अवामी लीग को हमेशा के लिए राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर रखना संभव नहीं है.
आईसीजी ने सरकार के सामने मौजूद पांच प्रमुख चुनौतियों का जिक्र किया है. उसका कहना है कि सरकार को अवामी लीग पर पाबंदी हटाने के जटिल मुद्दे पर भी फैसला करना होगा. लेकिन इस मामले में उसे जमात-ए-इस्लामी के कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है. चुनावी नतीजों के बाद से ही जमात बीएनपी का नाम लिए बिना कहती रही है कि देश की एक राजनीतिक पार्टी एक फासीवादी पार्टी (अवामी लीग) के पुनर्वास का प्रयास कर रही है.
पाकिस्तान, चीन और भारत के साथ संबंधों में संतुलन
संगठन का कहना है कि बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार को रोहिंग्या मुद्दे सहित जटिल विदेश नीति के विभिन्न पहलुओं को साधने के साथ ही अमेरिका और चीन के बीच टकराव के प्रभाव से खुद को मुक्त करना होगा. उसके सामने भारत, चीन और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में संतुलन कायम रखने की भी कड़ी चुनौती है.
उसने कहा है कि बीते करीब डेढ़ साल के दौरान भीड़ की ओर से लगातार तेज होने वाली हिंसा पर अंकुश लगाना होगा. लेकिन आंदोलन के दौरान पुलिस की भूमिका के कारण अब तक उस पर लोगों का भरोसा बहाल नहीं हो सका है. पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों का पुनर्गठन भी एक चुनौती है.
पर्यावरणविदों का कहना है कि सरकार के सामने जलवायु परिवर्तन के कारण देश में लगातार बढ़ रही प्राकृतिक विपदाओं से मुकाबले के लिए भी एक दीर्घकालिक योजना बनाने की चुनौती है.
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बांग्लादेश के नागरिक संगठन 'सिटीजन फॉर गुड गवर्नेंस' के सचिव प्रोफेसर बदियुल आलम मजूमदार ने ढाका से छपने वाले अखबार 'दैनिक कालबेला' से बातचीत में कहा है, "बीएनपी को करीब 20 साल पहले देश चलाने का अनुभव है. लेकिन अब बदली हुई परिस्थितियों में उसे कई गंभीर चुनौतियों से जूझना पड़ेगा. कानून व्यवस्था में सुधार उसके लिए पहली बड़ी चुनौती होगी. इसके बिना निवेश हासिल करना और विकास योजनाओं को आगे बढ़ाना संभव नहीं होगा."
ढाका यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर एंड रिसर्च के प्रोफेसर डॉ. तौहीदुल हक ने 'दैनिक कालबेला' से कहा है, "जुलाई, 2024 में बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन के बाद बिगड़ी कानून-व्यवस्था की स्थिति को शीघ्र बेहतर बनाना होगा. इसके लिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों को पेशेवर बनाने के साथ ही उनको राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना होगा. साथ ही सरकार को पुलिस का मनोबल बढ़ाने की दिशा में भी काम करना होगा."
'जुलाई सनद' की प्रासंगिकता बनी रहेगी
राजनीतिक विश्लेषकों की राय में सुधारों की प्रक्रिया शुरू करना भी सरकार के लिए कठिन चुनौती होगी. मतदान के दिन ही इन सुधारों के पक्ष में भी लोगों ने वोट डाले हैं. हालांकि बीएनपी ने जुलाई सनद के नाम से मशहूर इन सुधारों के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति भी जताई है. लेकिन वो इनकी पूरी तरह अनदेखी करने की स्थिति में नहीं होगी.
जुलाई सनद के मुताबिक तमाम सुधारों को लागू करने के लिए वर्ष 1972 में बने देश के पहले संविधान में बड़े पैमाने पर संशोधन करना होगा. इससे पहले बीएनपी के संस्थापक अध्यक्ष जियाउर रहमान ने संविधान में बड़े पैमाने पर संशोधन किए थे. लेकिन बाद में अदालत ने उनमें से कई संशोधनों को खारिज कर दिया था. ऐसे में अब नए नेतृत्व को इन बदलावों की दिशा में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना होगा.
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विश्लेषकों का कहना है कि देश का बैंकिंग सेक्टर शेख हसीना के कार्यकाल से ही भारी वित्तीय दिक्कतों से जूझ रहा है. इस समस्या से निपटने के लिए सरकार के बैंकिंग कानून में संशोधन के साथ ही उनको कामकाज में स्वायत्तता देने की पहल करनी होगी. बैंक से भारी-भरकम कर्ज लेकर उसे नहीं लौटाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए आर्थिक अदालतों यानी न्यायपालिका को ज्यादा अधिकार देना जरूरी है.
पश्चिम बंगाल के एक कालेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे डा. अमानुर रहमान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार को राजनीतिक के साथ ही आर्थिक और प्रशासनिक मोर्चों पर भी जूझना होगा. यह ठीक है कि कुछ चीजें रातोंरात नहीं बदल सकती. लेकिन सरकार को कुछ मामलों में त्वरित और ठोस पहल कर अपनी इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा."
रहमान कहते हैं, "क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति दोनों में संतुलन बनाए रखना बीएनपी सरकार के लिए गंभीर चुनौती है. अब यह तो कुछ दिनों बाद ही पता चलेगा कि सरकार इन चुनौतियों से निपटने की दिशा में कैसी पहल करती है."