बांग्लादेश में कपड़ा मजदूरों के प्रदर्शन से ठप हुआ कामकाज
बांग्लादेश में कपड़ा उद्योग के मजदूरों के हिंसक आंदोलन के बाद न्यूनतम मजदूरी में संशोधन के लिए वेज बोर्ड का गठन होगा.;
बांग्लादेश में कपड़ा उद्योग के मजदूरों के हिंसक आंदोलन के बाद न्यूनतम मजदूरी में संशोधन के लिए सरकार ने एक छह-सदस्यीय वेज बोर्ड के गठन का एलान कर दिया है. लेकिन मजदूरों की नाराजगी और असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा है.
कपड़ा मजदूरों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर असंतोष की आहट तो लंबे समय से मिल रही थी लेकिन शनिवार को अचानक हजारों मजदूर न्यूनतम मजदूरी मौजूदा साढ़े बारह हजार टका से तीस हजार टका प्रति माह करने की मांग में सड़कों पर उतर आए और हिंसक प्रदर्शन और आगजनी शुरू कर दी. राजधानी ढाका और आसपास के इलाकों में हालात इतने बिगड़ गए कि इस पर काबू पाने के लिए सरकार को अर्धसैनिक बल के जवानों को मैदान में उतारना पड़ा.
सोमवार को प्रदर्शन के तीसरे दिन हालांकि कुछ फैक्ट्रियों में मजदूर काम पर वापस लौट आए हैं. लेकिन जगह-जगह विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी है. सत्ता संभालने के बाद से ही तमाम समस्याओं से जूझ रही तारिक रहमान सरकार के लिए यह आंदोलन एक नया सिरदर्द बन गया है.
देश की अर्थव्यवस्था के लिए कपड़ा उद्योग बहुत अधिक अहमियत रखता है. बांग्लादेश के करीब चार हजार पंजीकृत कारखानों में 40 लाख से भी ज्यादा कारीगर काम करते हैं. वैश्विक पोशाक निर्यात में चीन के बाद बांग्लादेश दूसरे स्थान पर है यहां से दुनिया के करीब डेढ़ सौ देशों में रेडीमेड कपड़ों का निर्यात किया जाता है. दुनिया के कई मशहूर ब्रांडेड कपड़े भी यहीं सिले जाते हैं. वर्ष 2025-26 के दौरान कपड़ा निर्यात से देश को 3,870 करोड़ अमेरिकी डॉलर का मुनाफा हुआ था.
निर्यात से देश को होने वाली कुल आय में कपड़ा उद्योग का हिस्सा 80 फीसदी से भी ज्यादा है. इसका सालाना टर्नओवर करीब 38 अरब डॉलर है. इस उद्योग में काम करने वालों में आधे से ज्यादा महिलाएं हैं.
क्या है कपड़ा मजदूरों की मांग?
देश के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को हर महीने न्यूनतम साढ़े बारह हजार टका (101 अमेरिकी डॉलर) की मजदूरी मिलती है. यह वेतन वर्ष 2023 में शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान तय किया गया था. लेकिन अब मजदूर इसे बढ़ा कर कम से कम तीस हजार टका (242 अमेरिकी डॉलर) करने की मांग कर रहे हैं. उनकी दलील है कि लगातार बढ़ती महंगाई, परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाओं पर बढ़े खर्च के कारण उनका जीवन दूभर हो गया है.
रविवार के राजधानी समेत देश के विभिन्न इलाकों में बड़े पैमाने पर हिंसा, आगजनी और विरोध प्रदर्शन के बाद रविवार शाम को प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने एक आपात बैठक में परिस्थिति का जायजा लिया. उसी बैठक में न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए छह-सदस्यीय वेज बोर्ड के गठन का फैसला किया गया.
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बैठक के बाद श्रम और रोजगार मंत्री एम. सखावत हुसैन ने पत्रकारों से कहा, "वेज बोर्ड का गठन कर दिया गया है. अब कोई समस्या नहीं होगी." लेकिन सरकार के फैसले और भरोसे के बावजूद सोमवार को सैकड़ों मजदूर काम पर नहीं लौटे. सोमवार को भी राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शन जारी रहा. इस दौरान कई जगह सुरक्षा बलों के साथ भी उनकी भिड़ंत हुई. कुछ जगह हाईवे पर ट्रैफिक भी रोका गया. मजदूरों के प्रदर्शन के कारण पांच सौ से ज्यादा फैक्ट्रियों में काम लगभग ठप है.
कपड़ा उद्योग के सामने हैं कई चुनौतियां
कपड़ा फैक्ट्री के मालिकों की दलील है कि यह उद्योग कड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है. लागत लगातार बढ़ रही है और उसके साथ ही बिजली और गैस की किल्लत ने समस्या को जटिल बना दिया है. बांग्लादेश टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन (बीटीएमए) के एक प्रवक्ता डीडब्ल्यू से कहते हैं, "मध्य-पूर्व के हालात के कारण ऊर्जा क्षेत्र अनिश्चितता का शिकार है. इस वजह से उत्पादन में गिरावट आई है. ऐसी परिस्थिति में न्यूनतम मजदूरी में करीब ढाई गुनी वृद्धि संभव नहीं है. ऐसा होने की स्थिति उद्योग की कमर टूट जाएगी."
बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता महमूद हसन खान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "रेडीमेड कपड़ों के निर्यात से भारी तादाद में विदेशी मुद्रा की आय होती है और यह देश की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है. मौजूदा हालात में ऐसे आंदोलन और न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का फैसला इसकी जड़ों को और कमजोर कर देंगे."
मजदूरों के एक संगठन एकता गारमेंट्स श्रमिक फेडरेशन के महासचिव कमरुल हसन डीडब्ल्यू से कहते हैं, "कई मजदूर भूमिगत हो गए हैं. ज्यादातर मजदूरों में न्यूनतम मजदूरी और दूसरी समस्याओं के कारण भारी नाराजगी है. यही वजह है कि वेज बोर्ड के गठन के फैसले के बावजूद वो काम पर नहीं लौटे हैं."
ढाका के पास मीरपुर स्थित एक कपड़ा फैक्टरी में काम करने वाले मोहम्मद इलियास (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमें जितनी मजदूरी मिलती है वह पंद्रह दिनों के लिए भी पर्याप्त नहीं है. बीते तीन-चार साल में हर चीज की कीमत दोगुनी से ज्यादा बढ़ गई है. मिल मालिकों और सरकार को इस उद्योग से भारी मुनाफा होता है. लेकिन वो मजदूरों पर खर्च नहीं करना चाहते."