करीब दो दशक बाद कोलकाता लौटेंगी तसलीमा नसरीन, बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल

यह कार्यक्रम 'सेक्युलर मिशन' और 'ह्यूमन राइट्स एंड बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन' द्वारा आयोजित किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और सामाजिक मुद्दों पर संवाद को बढ़ावा देना है।;

Update: 2026-07-15 04:16 GMT

कोलकाता: बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन करीब 20 वर्ष बाद पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का दौरा करने जा रही हैं। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार वह 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित एक सांस्कृतिक और विचार-विमर्श कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। उनकी इस वापसी को साहित्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बंगाल की राजनीति तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कार्यक्रम की घोषणा के बाद राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं और विभिन्न दल इसे अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं।

सांस्कृतिक कार्यक्रम में होंगी शामिल

यह कार्यक्रम 'सेक्युलर मिशन' और 'ह्यूमन राइट्स एंड बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन' द्वारा आयोजित किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और सामाजिक मुद्दों पर संवाद को बढ़ावा देना है। आयोजकों का दावा है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में ऐसा कार्यक्रम आयोजित करना संभव हो पाया है और वे इसे एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखते हैं। कार्यक्रम में राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक नेता शुभेंदु अधिकारी के भी शामिल होने की जानकारी दी गई है।

आयोजकों का दावा, बदला है माहौल

कार्यक्रम से जुड़े लोगों का कहना है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसा वातावरण बना है, जिसमें विभिन्न विचारों और मतों को खुलकर अभिव्यक्त किया जा सकता है। उनका आरोप है कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान कट्टरपंथी विरोध के कारण तसलीमा नसरीन जैसे लेखकों के कार्यक्रम आयोजित करना मुश्किल था।हालांकि, इन दावों पर राजनीतिक दलों की राय अलग-अलग है और यही कारण है कि तसलीमा की प्रस्तावित यात्रा राजनीतिक बहस का विषय बन गई है।

विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना

तसलीमा नसरीन के दौरे को लेकर विपक्षी दलों ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि सरकार जनता से जुड़े मूलभूत मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि बिजली, राशन और अन्य जनकल्याणकारी वादों को पूरा करने के बजाय सरकार इस तरह के मुद्दों को राजनीतिक रूप से उभार रही है। सिद्दीकी ने यह भी आरोप लगाया कि इस कार्यक्रम का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों से जुड़े राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।

2007 के विवाद से जुड़ा है इतिहास

तसलीमा नसरीन का कोलकाता से संबंध लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। वर्ष 2007 में उनकी पुस्तक 'द्विखंडित' को लेकर पश्चिम बंगाल में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय कोलकाता में हिंसक घटनाएं भी हुई थीं, जिसके बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उनके राज्य में रहने पर रोक लगा दी थी। बाद के वर्षों में भी वे पश्चिम बंगाल में स्थायी रूप से वापस नहीं आ सकीं। उनके समर्थकों का दावा है कि बाद की सरकारों के दौरान भी उनकी वापसी को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हुई।

रेजिडेंस परमिट के बाद बनी वापसी की राह

हाल के वर्षों में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा उनके रेजिडेंस परमिट के नवीनीकरण के बाद भारत में उनके प्रवास को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई। इसके बाद अब कोलकाता में उनके सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने की घोषणा ने एक बार फिर साहित्यिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू कर दी है। तसलीमा नसरीन लंबे समय से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिला अधिकारों और सामाजिक सुधार जैसे विषयों पर अपने विचारों के कारण चर्चा में रही हैं। उनकी कई रचनाएं विभिन्न देशों में विवाद का विषय भी बनी हैं।

साहित्य और राजनीति के केंद्र में रहेगा दौरा

विशेषज्ञों का मानना है कि तसलीमा नसरीन का यह दौरा केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और पश्चिम बंगाल की समकालीन राजनीति पर भी व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। एक ओर उनके समर्थक इसे विचारों की आजादी का प्रतीक बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विरोधी दल इसे राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में 1 अगस्त को होने वाला यह कार्यक्रम साहित्य, संस्कृति और राजनीति तीनों क्षेत्रों में विशेष महत्व रखेगा।

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