वोटर सूची से नाम हटाने पर ममता बनर्जी का हमला, कहा- लोकतंत्र से किया जा रहा खिलवाड़, केंद्र और चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप

ममता बनर्जी ने कहा कि एसआईआर की आड़ में अल्पसंख्यक, आदिवासी, मतुआ और राजवंशी समुदायों के मतदाताओं को वोटर सूची से बाहर करने की कोशिश की जा रही है।

Update: 2026-01-17 06:21 GMT
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोलते हुए राज्य की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाया। उत्तर बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर रवाना होने से पहले कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री ने दावा किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर राज्य के चुनिंदा समुदायों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने इसे “लोकतंत्र को कमजोर करने की साजिश” करार दिया।

अल्पसंख्यकों और हाशिये के समुदायों पर निशाना लगाने का आरोप

ममता बनर्जी ने कहा कि एसआईआर की आड़ में अल्पसंख्यक, आदिवासी, मतुआ और राजवंशी समुदायों के मतदाताओं को वोटर सूची से बाहर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने विशेष रूप से मालदा जिले का जिक्र करते हुए दावा किया कि वहां लगभग 90 हजार अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाने की तैयारी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कोई प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि “सोची-समझी राजनीतिक साजिश” है, जिसका उद्देश्य चुनावी समीकरणों को प्रभावित करना है।

नामचीन हस्तियां भी चपेट में आने का दावा

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया केवल आम नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें देश की प्रतिष्ठित हस्तियों के नाम भी शामिल किए जा रहे हैं। ममता बनर्जी ने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और प्रसिद्ध कवि जय गोस्वामी का उदाहरण देते हुए कहा कि लोकतंत्र में योगदान देने वाले लोगों के नाम तक हटाने की तैयारी की जा रही है। उनके मुताबिक, इससे साफ है कि यह महज वोटर सूची का तकनीकी पुनरीक्षण नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर मताधिकार को सीमित करने का प्रयास है।

चुनाव आयोग का पक्ष
हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों ने मुख्यमंत्री के आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि किसी भी मतदाता का नाम बिना उचित सत्यापन और पूर्व नोटिस के नहीं हटाया जा रहा है। मालदा में 90 हजार नाम हटाए जाने की चर्चा पर आयोग ने स्पष्ट किया कि यह संख्या केवल संभावित डाटा विसंगतियों की हो सकती है, जिनकी जांच अभी चल रही है। आयोग के अनुसार, इसे नाम हटाने का अंतिम फैसला मानना गलत होगा। चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि एसआईआर एक नियमित और पारदर्शी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है। इसमें दोहराव, मृत मतदाताओं या स्थानांतरण के मामलों की पहचान की जाती है, ताकि चुनाव निष्पक्ष और भरोसेमंद बने रहें।

ईडी छापेमारी और सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ
ममता बनर्जी ने इसी दौरान आई-पैक (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) के कार्यालय में हुई प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी और उससे जुड़े कानूनी विवाद पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बंगाल पुलिस की एफआईआर पर रोक लगाने और मुख्यमंत्री सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें लगातार जेल भेजने की धमकियां दी जा रही हैं। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “मुझे डराने-धमकाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन मैं केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में झुकने वाली नहीं हूं।”

‘जनता के अधिकारों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार’
ममता बनर्जी ने अपने तेवर और सख्त करते हुए कहा कि वह जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह इसके लिए अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटेंगी। मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में डर और धमकी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल में हिंसा फैलाने या सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की हर कोशिश को सख्ती से नाकाम किया जाएगा। ममता ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि राज्य के लोगों के अधिकारों से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।

सियासी मायने और आगे की राह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर उठे इस विवाद के गहरे सियासी मायने हैं। एक ओर जहां तृणमूल कांग्रेस इसे अल्पसंख्यकों और हाशिये के समुदायों के खिलाफ साजिश बता रही है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग इसे एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहा है। आने वाले चुनावों से पहले यह मुद्दा राज्य की राजनीति में और गरमा सकता है। ममता बनर्जी के तीखे बयानों ने केंद्र–राज्य टकराव को और तेज कर दिया है। यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग इस विवाद पर आगे क्या कदम उठाता है और क्या राज्य सरकार और केंद्र के बीच किसी तरह का संवाद संभव हो पाता है, या यह टकराव आने वाले दिनों में और गहराता है।

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