रावण दहन के बाद लकड़ियां ले जाना टोना-टोटका, घर में कलह और रोग लाता है : महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव

महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव ने दशहरे पर रावण दहन से जुड़ी मान्यताओं को लेकर लोगों को आगाह किया है। उन्होंने कहा कि रावण दहन के बाद पुतले की लकड़ियां घर ले जाना टोना-टोटका है, इससे घर में शांति नहीं बल्कि कलह, रोग और नकारात्मकता आती है। रावण दहन का उद्देश्य हमारे अंदर की विकृतियों को नष्ट करने का संकल्प लेना है।;

Update: 2026-10-18 21:22 GMT

हरिद्वार। महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव ने दशहरे पर रावण दहन से जुड़ी मान्यताओं को लेकर लोगों को आगाह किया है। उन्होंने कहा कि रावण दहन के बाद पुतले की लकड़ियां घर ले जाना टोना-टोटका है, इससे घर में शांति नहीं बल्कि कलह, रोग और नकारात्मकता आती है। रावण दहन का उद्देश्य हमारे अंदर की विकृतियों को नष्ट करने का संकल्प लेना है।

महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव ने कहा, "इस प्रकार के त्योहारों में कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो लोकोक्तियां हैं, उनके आधार पर जोड़कर देखते हैं, रावण दहन के बाद लोग लकड़ियां उठाकर लेकर जाते हैं। ये टोना-टोटका है। इससे घर में शांति नहीं, कलह का वातावरण, रोग, कष्ट और नकारात्मक माहौल बनता है। इससे बचना है। पुतला दहन का एकमात्र उद्देश्य यह है कि हमारे अंदर की जो विकृति है, सांकेतिक दृष्टि से उसे नष्ट करने का संकल्प लेकर हम ये करते हैं।"

उन्होंने कहा कि वास्तविक में ये रावण का पुतला नहीं है, ये हमारे अंदर कोई विकृति न आ पाए, स्वच्छता बनी रहे उसके लिए है। अग्नि से ज्यादा स्वच्छ करने वाली कोई चीज नहीं है। हम प्रतीकात्मक रूप से रावण के पुतले को दहन करते हैं। इससे हम समाज को ये संदेश देते हैं कि कोई कितना भी बलवान, शक्तिशाली, धनी, राजा ही क्यों न हो, सभी देवी-देवताओं पर भारी क्यों न हो, लेकिन अगर एक गलती करता है, तो समाज उसे कठोर सजा देता है।

महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव ने कहा कि रावण के जीवनकाल में ये एकमात्र ऐसी घटना है, जिसने उसे खलनायक बना दिया। मां सीता के हरण ने उसे खलनायक बना दिया। हमारे महापुरुषों ने उसे माफ नहीं किया और आज तक उसके उस अवगुण का हर साल पुतला बनाकर दहन करते हैं। हमारे महापुरुषों ने ये संदेश दिया है कि जो भी अच्छा काम करेगा, उसका हमेशा स्वागत किया जाएगा और पूजा जाएगा, और जो भी समाज को खंडित करने का काम करेगा, गलत परंपरा स्थापित करेगा, उसे समाज में कोई स्थान नहीं मिलेगा।

उन्होंने आगे कहा कि त्रेता युग के बारे में जितना भी पढ़ते हैं, उसके पीछे का सत्य यही समझ में आता है कि रावण तो ब्रह्म ज्ञानी था। जैसे राम 12 और कृष्ण 16 कलाओं के अवतार थे, वैसे ही वो 10 कलाओं का अवतार था। वो मामूली व्यक्ति नहीं था। इसलिए ही महापुरुषों ने उसे माफ नहीं किया कि इतना ज्ञानी होने के बाद भी, उसने माता सीता का हरण किया।

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