UP MLC चुनाव में BJP को झटका, वाराणसी-आगरा में सपा का दबदबा; 2027 से पहले बढ़ी चुनौती

विधान परिषद चुनाव भाजपा और सपा दोनों के लिए संगठनात्मक मजबूती परखने का अवसर था। भाजपा ने मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और विधायकों तक को प्रचार में उतारा, जबकि सपा ने कई सीटों पर मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की।;

Update: 2026-10-28 11:02 GMT

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों और रुझानों ने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत को गरमा दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) पांच सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी है, जबकि एक सीट पर आगे चल रही है। वहीं, समाजवादी पार्टी (SP) ने अब तक दो सीटें जीत ली हैं और तीन सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। इन आंकड़ों के आधार पर सपा को पिछले चुनाव के मुकाबले फायदा मिलता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत भाजपा के कई नेताओं ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत लगाई थी, इसके बावजूद कई सीटों पर पार्टी को कड़ी चुनौती मिली है। ऐसे में इन नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के संगठनात्मक प्रभाव और विपक्ष की ताकत के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वाराणसी और आगरा में भाजपा को झटका

विधान परिषद चुनाव में वाराणसी और आगरा की शिक्षक निर्वाचन सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इन दोनों सीटों पर वर्ष 2020 में भी पार्टी को जीत नहीं मिली थी। इस बार भाजपा ने दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करने के लिए व्यापक चुनावी अभियान चलाया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनसभाएं कीं, जबकि पार्टी के मंत्रियों, विधायकों और संगठन के नेताओं को मतदाताओं से संपर्क करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने दोनों सीटों पर जीत दर्ज की। इन नतीजों ने भाजपा की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव स्थानीय मुद्दों और मतदाता समूहों से प्रभावित होते हैं, इसलिए इनके परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव का संकेत मानना उचित नहीं होगा।

लखनऊ और झांसी की स्नातक सीटों पर सपा की बढ़त

लखनऊ और झांसी की स्नातक निर्वाचन सीटों पर भी भाजपा के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। शुरुआती रुझानों में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आगे बताए जा रहे हैं। लखनऊ में भाजपा ने पिछली बार जीत दर्ज की थी, जबकि झांसी की सीट पर 2020 में सपा को सफलता मिली थी। इस बार भाजपा ने दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय किया था। मंत्रियों, विधायकों और सांसदों ने मतदाताओं से संपर्क कर पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश की। इसके बावजूद सपा की बढ़त ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। यदि ये रुझान अंतिम नतीजों में बदलते हैं, तो भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति की समीक्षा करनी पड़ सकती है।

गोरखपुर में कांटे की टक्कर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर की शिक्षक सीट पर मुकाबला सबसे दिलचस्प बना हुआ है। भाजपा ने यहां मौजूदा एमएलसी ध्रुव त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से संजय त्रिपाठी मैदान में हैं। इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव भी मुकाबले को प्रभावित करते दिखाई दे रहे हैं। शुरुआती रुझानों में ध्रुव त्रिपाठी को मामूली बढ़त मिलने की बात सामने आई है। हालांकि, मतों का अंतर कम होने के कारण अंतिम परिणाम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। गोरखपुर में भाजपा को मिल रही कड़ी चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। यहां का परिणाम पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।

2020 के मुकाबले भाजपा और सपा की स्थिति

वर्ष 2020 के विधान परिषद चुनाव में भाजपा ने छह सीटें जीती थीं, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में तीन सीटें आई थीं। दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। इस बार के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा पांच सीटें जीतने के बाद एक अन्य सीट पर आगे है। यदि वह सीट भी भाजपा के खाते में जाती है, तो पार्टी पिछली बार की तरह छह सीटों पर पहुंच सकती है। दूसरी ओर, सपा दो सीटें जीतने के बाद तीन पर आगे है। सभी रुझान परिणामों में बदलने पर उसकी सीटों की संख्या पांच तक पहुंच सकती है। इस लिहाज से भाजपा को सीटों की कुल संख्या में तत्काल नुकसान होता नहीं दिख रहा, लेकिन सपा की संभावित बढ़त विपक्ष के लिए राजनीतिक उपलब्धि होगी।

पूर्वांचल और बुंदेलखंड के नतीजों पर नजर

पूर्वांचल और बुंदेलखंड के निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा को मिल रही चुनौती ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। खासकर गोरखपुर में करीबी मुकाबला पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रुहेलखंड के कुछ क्षेत्रों में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इन परिणामों से यह संकेत मिलता है कि शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच मुकाबला कई क्षेत्रों में कड़ा है। हालांकि, विधान परिषद चुनाव का मतदाता वर्ग विधानसभा चुनाव के मतदाताओं से अलग होता है, इसलिए दोनों के परिणामों की तुलना सावधानी से करनी होगी।

2027 से पहले दलों के लिए क्या हैं संकेत?

विधान परिषद चुनाव भाजपा और सपा दोनों के लिए संगठनात्मक मजबूती परखने का अवसर था। भाजपा ने मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और विधायकों तक को प्रचार में उतारा, जबकि सपा ने कई सीटों पर मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की। अब अंतिम परिणाम तय करेंगे कि दोनों दलों की सीटों की वास्तविक स्थिति क्या रहती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में राजनीतिक मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है। भाजपा के लिए अपने प्रभाव को बनाए रखना चुनौती होगी, जबकि सपा इन नतीजों को विपक्षी एकजुटता और संगठन विस्तार के अवसर के रूप में देख सकती है।

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