नई दिल्ली : मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सोमवार को निर्वाचन आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे पर सवाल उठाते हुए शीर्ष अदालत से संबंधित सभी प्रशासनिक रिकॉर्ड तलब करने की मांग की। उन्होंने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्त किसी फैसले पर सहमत हों, तब भी यदि वह नियमों के खिलाफ है तो उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि एसआईआर से संबंधित सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा निर्णय लेने के आरोप सही नहीं हैं।
इमरान मसूद ने उठाए फार्म-6 के नियमों पर सवाल
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि विपक्ष की आपत्ति किसी व्यक्ति विशेष को लेकर नहीं है, बल्कि मतदाता पंजीकरण से जुड़े नियमों के कथित उल्लंघन और वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की आशंका को लेकर है। उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले से जुड़े सभी प्रशासनिक रिकॉर्ड मंगाकर उनकी जांच करे। मसूद के मुताबिक, विवाद का मूल प्रश्न यह है कि क्या एसआईआर की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी नियमों का पालन किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि तीनों चुनाव आयुक्त किसी फैसले पर सहमत हैं, लेकिन वह फैसला नियमों के अनुरूप नहीं है, तो केवल सर्वसम्मति के आधार पर उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार, असली मुद्दा मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी पात्र नागरिक का नाम मनमाने ढंग से मतदाता सूची से नहीं हटाया जाए।
चुनाव आयोग ने हलफनामे में क्या कहा?
निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में एसआईआर से जुड़े फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है। आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा निर्णय लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया से संबंधित महत्वपूर्ण आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से जारी किए गए थे। उप चुनाव आयुक्त प्रकाश येतुरु की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। आयोग के मुताबिक, अदालत में दाखिल हलफनामे को भी मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने मंजूरी दी है। आयोग का पक्ष है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया संस्थागत और सामूहिक थी। इस तरह उसने उन आरोपों का जवाब देने की कोशिश की है, जिनमें एसआईआर से संबंधित फैसलों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे।
फार्म-6 और घोषणा-पत्र को लेकर विवाद
निर्वाचन आयोग ने हलफनामे में स्पष्ट किया कि मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फार्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, एसआईआर के दौरान लिया जाने वाला घोषणा-पत्र फार्म-6 से अलग दस्तावेज है। यही अंतर इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। विपक्ष की ओर से फार्म-6 से जुड़े नियमों और मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं, आयोग का कहना है कि निर्धारित फार्म में कोई बदलाव नहीं किया गया। इस मामले में अदालत के सामने यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित दस्तावेजों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया और एसआईआर की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप संचालित हुई या नहीं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की ओर से दायर इसी तरह की याचिका भी शीर्ष अदालत में लंबित है। अदालत ने दोनों मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए जोड़ दिया था। अब सुनवाई के दौरान आयोग के जवाब और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर चर्चा होने की संभावना है। हालांकि, हलफनामा दाखिल होने मात्र से विवाद समाप्त हो गया है, ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। मामले में आगे क्या निर्णय होगा, यह सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके आदेश पर निर्भर करेगा।
मतदाता सूची की पारदर्शिता पर टिकी नजरें
एसआईआर को लेकर जारी विवाद में मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों के मताधिकार और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया प्रमुख मुद्दे बन गए हैं। विपक्ष जहां कथित अनियमितताओं की जांच और प्रशासनिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने पर जोर दे रहा है, वहीं आयोग अपने फैसलों को नियमों के अनुरूप और सर्वसम्मति से लिया गया बता रहा है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। इससे यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि विवाद से जुड़े कानूनी सवालों पर आगे किस दिशा में कार्यवाही होगी और मतदाता सूची की प्रक्रिया को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर अदालत क्या रुख अपनाती है।