आईजीआरएस पर सीएमओ कार्यालय के स्टेनो की भ्रामक एंट्री

उत्तर प्रदेश की इंटीग्रेटेड ग्रिवेंस रिड्रेसल सिस्टम (आईजीआरएस) आम नागरिकों की शिकायतों के निष्पक्ष और समयबद्ध निस्तारण के लिए बनाई गई व्यवस्था है;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-08-08 19:29 GMT

पीड़िता से लेकर डीएम तक को गुमराह करने का आरोप

  • एप्लीकेशन के फीडबैक सेक्शन से खुली पोल

मेरठ। उत्तर प्रदेश की इंटीग्रेटेड ग्रिवेंस रिड्रेसल सिस्टम (आईजीआरएस) आम नागरिकों की शिकायतों के निष्पक्ष और समयबद्ध निस्तारण के लिए बनाई गई व्यवस्था है। लेकिन मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) कार्यालय, मेरठ के स्टेनो रामसेवक पर गंभीर आरोप हैं कि उन्होंने इसे भ्रष्टाचार का माध्यम बना लिया है। आरोप है कि वे जानबूझकर भ्रामक एंट्री करके न सिर्फ पीड़िता को, बल्कि जिलाधिकारी डॉ. वी.के. सिंह को भी गुमराह कर रहे हैं।

बता दें कि 17 अप्रैल 2025 को पीड़िता ने जिलाधिकारी को शिकायती पत्र सौंपा था। इसमें निष्पक्ष जांच हेतु सी.टी. स्कैन व एमआरआई कराने की मांग की गई थी। जिलाधिकारी ने इस मामले में सीएमओ को जांच के आदेश दिए थे। लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी जांच आख्या न तो पीड़िता तक पहुँची और न ही जिलाधिकारी कार्यालय को वास्तव में डिस्पैच की गई। उक्त मामले की पोल तब खुली जब पीड़िता की नजर अचानक आईजीआरएस ऐप के फीडबैक सेक्शन पर गई। वहाँ पता चला कि स्टेनो ने निस्तारण संबंधी पत्र आईजीआरएस पर तो अपलोड कर रखा है, लेकिन डाक के माध्यम से इसकी प्रतिलिपि जिलाधिकारी से लेकर पीड़िता तक किसी को नहीं भेजी गई। इतना ही नहीं, स्टेनो ने आईजीआरएस पर जानबूझकर पीड़िता का पुराना पता अंकित कर दिया। डिस्पैच रजिस्टर की जांच में यह भी सामने आया कि डाक पुराने पते पर भी नहीं भेजी गई। इन तथ्यों से आरोप लग रहे हैं कि स्टेनो की आरोपियों के साथ सांठ-गांठ है और वे मामले को दबाने के लिए पत्राचार में जानबूझकर गड़बड़ी कर रहे हैं।

पत्रांक संख्या में उलझाने का प्रयास

जब सीएमओ राम प्रसाद ने स्टेनो रामसेवक से पूछताछ की, तो उन्होंने पुरानी डाक पत्रांक संख्या का हवाला देते हुए सीएमओ को भी गुमराह करने की कोशिश की। स्टेनो का दावा था कि 21 अप्रैल 2025 को पत्रांक संख्या-607 की प्रतिलिपि डाक द्वारा पीड़िता को भेज दी गई थी। जबकि असल में यह मामला पत्रांक संख्या-607 का नहीं, बल्कि पत्रांक संख्या-1308 का है, जिसे 7 मई 2025 को जिलाधिकारी, पीड़िता और अपर निदेशक (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) को भेजा जाना था। लेकिन यह डिस्पैच ही नहीं किया गया। इस मामले में पीड़िता ने 5 अगस्त 2026 को जिलाधिकारी से सम्पूर्ण जांच आख्या की कॉपी देने की मांग की है। यह मांग पत्र जिलाधिकारी कार्यालय के पत्रांक संख्या-7071 पर दर्ज होकर सीएमओ कार्यालय भेज दिया गया है।

ये है फर्जी एमएलसी का पूरा मामला

उक्त प्रकरण किठौर के 50 बैडेड शैय्यायुक्त अस्पताल की एक फर्जी एमएलसी 51/2024 से जुड़ा है, जिसे डॉ. वीरेन्द्र कुमार ने आरोपियों से सांठ-गांठ कर पीड़िता को फंसाने के लिए बनाया था। इस फर्जी एमएलसी में दर्जनों खामियां हैं। यदि ठीक से जांच हो जाए तो इस फर्जीवाड़े का खुलासा हो सकता है। एमएलसी में एक महिला के सिर में चोट दर्शाई गई, जबकि किसी पुरुष का एक्स-रे लगाकर फ्रैक्चर के रूप में पुलिस को सौंपा गया। चैंकाने वाली बात यह है कि घटना के दो दिन बाद एक्स-रे हुआ और सिर में फ्रैक्चर दर्शाया गया। मामला तब और संदिग्ध हो गया जब सिर की हड्डी टूटी हुई दिखाई गई, उसके बावजूद किसी भी न्यूरोलॉजिस्ट को रेफर नहीं किया। यानी मुकदमे में धारा बढ़ाने की पर्याप्त सामग्री मिलने के बाद फर्जी एमएलसी बनवाने वाली महिला को चलता कर दिया। वहीं आईजी नचिकेता झा द्वारा गठित जांच समिति में पाया गया कि जिन आरोपियों पर चोट मारने का आरोप था, वे घटनास्थल पर थे ही नहीं और पुलिस ने चार्जशीट में उनके नाम भी निकाल दिए गए। अब इस फर्जीवाड़े में एमएलसी बनाने वाले डॉक्टर की गर्दन फंस रही है। हो सकता है स्टेनो रामसेवक उसी डॉक्टर को बचाने के जतन में लिप्त हो।

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