भूखे श्रमिकों को मिल रहा अधपका भोजन
रायपुर ! शहर के गांधी चौक स्थित बंदोबस्त कार्यालय का दरवाजा खुला नहीं था। एक-एक कर श्रमिक जुटने लगे। सिर पर पगड़ी पहने हाथों में टिफिन लिये श्रमिकों की आंखों में एक उम्मीद दिखी।;
रायपुर ! शहर के गांधी चौक स्थित बंदोबस्त कार्यालय का दरवाजा खुला नहीं था। एक-एक कर श्रमिक जुटने लगे। सिर पर पगड़ी पहने हाथों में टिफिन लिये श्रमिकों की आंखों में एक उम्मीद दिखी। वे सुबह मिलने वाले भोजन की प्रतीक्षा में थे। चंद लमहों के बाद दरवाजा खुला टेबल में श्रम विभाग की परची लिये बाबू ने कहा लाइन लग जाओ एक-एक कर आते जाओ सभी को भोजन मिलेगा। भोजन मिला। लेकिन अधपका था। कुछ ने खाया कुछ ने सडक़ किनारे फेंक दिया। शायद अनाज की यह दुर्दशा कम देखने को मिलती है। पर यहां तो गरीबों को मिलने वाला भोजन ही रास नहीं आ रहा था। तभी धीरे से एक मजदूर ने कहा कच्चा हे ढंग से पके नइ ऐ। तभी दूसरे ने कहा ले लेथन भूखे रहिबो ओकर ले तो अच्छा है कुछ पेट में चले जाहि। यह सिलसिला 10 बजे तक चलते रहा और फिर काउंटर बंद हो गया। यह किसी घटना का विवरण नहीं है। बल्कि राज्य शासन द्वारा पिछले दिनों शुरू किये मुख्यमंत्री श्रमिक अन्न सहायता योजना का एक दृश्य है जो प्रतिदिन नगर के अलग-अलग स्थानों में देखने को मिल रहा है। हमारे प्रतिनिधि ने उक्त योजना के एक केंद्र का दौरा किया जहां यह पाया कि श्रमिकों को भोजन में पुलाव और सूजी का हलवा मिला था। हलवा में शक्कर कम सूजी और पानी अधिक था। फिर भी हजम कर लिया। पुलाव ऐसा कि खिचड़ी लग रहा था। श्रमिक एक-एक कर भोजन को लेत रहे। तो किसी दुकान के किनारे या चबूुतरे पर बैठकर खाना शुरू कर दिया। इन श्रमिकों को भोजन की लालसा और भूख में यह तक पता नहीं लगा कि जिस स्थान पर भोजन खाने के लिये बैठे है वह साफ था या नहीं। खाने के बाद पत्तल को फेंक दिया। जिसमें मवेशी और आवारा कुत्तों की भीड़ टूट पड़े। सवाल यह नहीं है कि गरीबों की भूख मिटनी चाहिए। सवाल यह है कि अनाज का प्रबंधन और योजना का प्रबंधन में लापरवाही बरती जा रही है। राज्य सरकार के श्रम विभाग को इस दिशा में चिंतन करने की आवश्यकता होगी। अन्यथा योजना में गरीबों की उंगलियां भोजन से न जल जाए।
भोजन प्राप्त करने वाले श्रमिक मंगतू से बात की। उसने बताया कि 4-5 दिन पहले भोजन मिलना शुरू हुआ है। दोस्तों से पता लगा तब आज लेने आया हूं। सुना है टिफिन बांटा गया है। दो दिन हो गया भोजन ले रहा हूं। दोनों दिन पुलाव और हलवा मिला है। साथ में नींबू का आचार भी देते हैं। अब कल से दो रोटी लेकर कम आऊंगा। क्योंकि सुबह का भोजन मिल जायेगा। जबकि नजदीक ही खड़े श्रमिक दुखीराम ने कहा कि कच्चा रहता है। बने पका के दिहि तब मजा आहि। अब पता नहीं कब तक खिलाहि। मोला तो लगथे 2018 चुनाव के तैयारी हे। महिला श्रमिक सुशीला ने कहा जब तक मिलेगा भर पेट भोजन खा लेंगे। फिर सोचेंगे कि क्या होगा। एक अन्य महिला राधा बाई ने कहा कल से नोनी बाबू ला भी साथ लाबो। ओमन ला भी भोजन मिल जाहि। यह अभिलाषा लगभग हर एक श्रमिक की आवाज में निकल रही थी कि जो कोतवाली स्थित चावड़ी में मजदूरी में रोजगार प्रहुाप्त करने के लिये रोजाना पहुंचते हैं।
अभनपुर, सेजबहार, लालपुर, सिवनी, काठाडीह, दतरेंगा, माना, गुमा, नया रायपुर सहित अन्य क्षेत्रों से आने वाले श्रमिकों में अब मुख्यमंत्री श्रमिक अन्न सहायता योजना चर्चा के साथ पेट की आवाज बन रही है।
सीमित साधनों में हुई है शुरूआत
उक्त विषय में छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल के एक पदाधिकारी का कहना है कि यह योजना सीमित साधनों में प्रारंभ की गई है। शासन से बिना सहायता प्राप्त कर काम की शुरूआत हुई है। इसलिये थोड़ी बहुत कमी हो सकती है। फिर भी प्रयास होगा कि गरीबों को मिलने वाले भोजन की निगरानी की जाए। जिन लोगों की सहायता से योजना को चलाया जा रहा है उन्हें यह निर्देश देंगे कि गरीबों को स्वस्थ और अच्छा भोजन उपलब्ध कराए। इस दिशा में अक्षय पात्र के माध्यम से योजना के काम को आगे बढ़ाने का प्रयास होगा।
सुभाष तिवारी
उपाध्यक्ष
छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य
सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल