सेवाग्राम में साझे भविष्य की तलाश
हाल के दिनों में आई स्वास्थ्य जागरूकता के कारण जैविक उत्पादों की मांग बढ़ गई है, पर पूर्ति कम है
- बाबा मायाराम
हाल के दिनों में आई स्वास्थ्य जागरूकता के कारण जैविक उत्पादों की मांग बढ़ गई है, पर पूर्ति कम है। क्योंकि जैविक खेती कम होती है और जो जैविक किसान करते भी हैं तो उनके उत्पाद बेचने में कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ता है। कुछ जगहों पर यह देखने में आया है कि जैविक किसानों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है।
हाल ही में गांधीजी की कर्मस्थली सेवाग्राम में अनूठे बीजोत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें देश के कई कोनों से जैविक व प्राकृतिक खेती करने वाले कई किसान शामिल हुए। इस तीन दिनी कार्यक्रम में देशी बीजों की खेती, जलवायु बदलाव, बीजों के कानून और नई खेती पद्धतियों पर विचार-विमर्श हुआ। यह कार्यक्रम 29 से 31 मार्च तक आयोजित था। सेवाग्राम यानी सेवा का गांव। यह महाराष्ट्र के वर्धा शहर से 8 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी ने जीवन के उत्तरार्ध का एक दशक से ज्यादा समय बिताया था। गांधीजी के साथ यहां उनके कुछ सहयोगी भी रहे। यहां जो छोटे घर बनाए गए, उन्हें कुटी के नाम से जाना जाता है। जिनमें बापू कुटी व बा ( कस्तूरबा गांधी) कुटी शामिल हैं। उस जमाने की ये कुटियां गांधीजी की सादगी व सरलता की बानगी
देती हैं।
यहां मिट्टी के घर,लकड़ी और छतों पर खपरैल से बने हैं। प्राकृतिक खेती, नई तालीम का स्कूल, खादी व चरखा और सादा रसोईघर है। हरे-भरे पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे फूल व लताओं से सजा परिसर है। सादगी व सुघड़ता यहां की पहचान है। यहां प्रकृति की अपनी संस्कृति है, लय है। गांधी इसी लय को समाज में उचित स्थान दिलाना चाहते थे।
बीजोत्सव भी गांधी की प्रेरणा की एक मिसाल है। यह खेती के गहरे संकट से जुड़ा है। इसकी शुरूआत करीब एक दशक पहले कपास के किसानों की खुदकुशी से चिंतित होकर की गई थी। उस समय अधिकांश किसान बैंक से कर्ज लेकर खेती करते हैं और कर्ज के बोझ तले दबकर ही जान दे रहे थे।
गांधीवादी सोच के कुछ लोगों व संस्थाओं ने मिलकर इसकी शुरूआत की थी, जिससे किसानों की मदद की जा सके। मैं इसमें दूसरी बार शामिल हुआ। बीजोत्सव में सुरक्षित व पौष्टिक खान-पान पर ज़ोर दिया जाता है। देशी बीजों की गोबर खाद व हल-बैल वाली प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाता है। इसमें खेती को पशुपालन से जोड़ने की सोच है, जिससे मिट्टी को गोबर व केंचुआ खाद से उर्वर बनाया जाए और दूध-घी से भोजन में पौष्टिकता भी बढ़े। यह खेती रासायनिक खाद से मुक्त होती है।
कोविड-19 के बाद से लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए जैविक और प्राकृतिक तरीके से उत्पादित अनाज और सब्जियां जरूरी हैं। सभी जानते हैं कि रासायनिक खेती में उत्पादन के साथ बीमारियां भी बढ़ी हैं। इसका एक उदाहरण जबलपुर से अमरावती एक्सप्रेस ट्रेन है। इसमें अधिकांश सवारियां मरीज होती हैं, जो नागपुर इलाज कराने जाती हैं। इस कारण इस ट्रेन को ही लोग एम्बुलेंस कहने लगे हैं। इसी ट्रेन से मैं 30 मार्च को इटारसी से वर्धा पहुंचा था।
सतपुड़ा अंचल वही इलाका है जहां 70-80 के दशक में आधुनिक रासायनिक खेती शुरूआत हुई थी। सोयाबीन, गेहूं और धान की रासायनिक खेती का प्रचलन बढ़ा। यह पूरी खेती ट्रेक्टरों व हारवेस्टरों से होती है और रासायनिक खाद, कीटनाशक, नींदानाशक दवाईयों का भरपूर उपयोग होता है। लेकिन अब सोयाबीन की खेती इस इलाके में लगभग खत्म हो गई है पर गेहूं और धान की फसलें रासायनिक खेती से ही की जा रही है। इससे बीमारियां भी काफी बढ़ी हैं।
हाल के दिनों में आई स्वास्थ्य जागरूकता के कारण जैविक उत्पादों की मांग बढ़ गई है, पर पूर्ति कम है। क्योंकि जैविक खेती कम होती है और जो जैविक किसान करते भी हैं तो उनके उत्पाद बेचने में कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ता है। कुछ जगहों पर यह देखने में आया है कि जैविक किसानों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है।
कई बार किसानों के पास सही जानकारियों का अभाव रहता है और कई बार उन्हें समय पर अच्छे बीज नहीं मिल पाते। बीजोत्सव का आयोजन इन्हीं उद्देश्यों को लेकर किया जाता है, जिससे किसानों को उचित जानकारी, एक दूसरे से सीखना, नई तकनीक, वैज्ञानिक जानकारी और परंपरागत बीजों का आदान-प्रदान किया जा सके।
इसके अलावा, खेती में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। लेकिन ग्रामीण इलाकों की महिलाएं कई कारणों से ऐसे कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पातीं। इसलिए उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिले, इसका प्रयास किया जाता है।
इस कार्यक्रम में आसपास के गांवों की बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं। महिलाओं ने उनके जैविक उत्पादों के स्टॉल भी लगाए थे। मैंने उनकी आंखों में जैविक उत्पाद बेचते हुए आत्मविश्वास की चमक देखी, यह आत्मनिर्भरता का भी अच्छा उदाहरण है।
इस कार्यक्रम में मिट्टी की उर्वरता बचाने पर ज़ोर दिया गया। फसलों के ठंडल व अवशेष न जलाएं जाएं बल्कि उनसे जैव खाद बनाई जाए। खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाएं जाएं, जिससे खेतों में नमी बने रहे, उनकी पत्तियों से जैव खाद भी बने। जलवायु बदलाव के दौर में पेड़ लगाना और भी जरूरी हो गया है।
यह एक ऐसा मौका होता है जब किसान और उपभोक्ताओं का आपस में जुड़ते हैं। जिससे किसानों को उनके उत्पाद का उचित दाम मिले और उपभोक्ताओं को भी वाजिब दाम में पौष्टिक अनाज मिल सके। यहां वे साझा भविष्य तलाशते हैं। जलवायु बदलाव बहुत ही गंभीर मुद्दा है। धरती की सभी प्रजातियां खतरे में हैं। इसलिए पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली बहुत जरूरी है। इसके लिए मिल-जुलकर काम करना जरूरी है। खेती का संकट जलवायु बदलाव से भी जुड़ा हुआ है। पर्यावरण के संकट से जुड़ा है। कुछ समय पहले तक देशी बीजों की खेती ऋ तु के अनुसार होती थी। अब मौसम बदलाव में बारिश अनिश्चित हो गई है। कभी ज्यादा तो कभी कम, कभी सूखा तो कभी अकाल, बारिश का कोई ठिकाना नहीं है। इसका सीधा असर परंपरागत खेती करने वाले और भूमिहीन किसानों पर पड़ता है।
मौसम बदलाव का यह संकट आधुनिक रासायनिक खेती का भी संकट है। भूजल नीचे चला जा रहा है, रासायनिक व कीटनाशक खेती के कारण मिट्टी की उर्वर शक्ति कम हो रही है। मिट्टी-पानी जहरीला हो रहा है। बिजली का संकट है। भारी पूंजी से होने वाली मशीनीकृत खेती से लागत बढ़ रही है। किसानों पर कर्ज बढ़ रहा है। मशीनों से काम से बेरोजगारी बढ़ रही है। पलायन हो रहा है। बाजार में फसलों के उचित दाम जैसी कई समस्याएं हैं। विशेषज्ञों द्वारा पर्यावरण की समस्या से निपटने के लिए दो समाधान बताए जा रहे हैं। एक है कि कार्बन उत्सर्जन कम किया जाए और दूसरा नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक अपनाने पर जोर दिया जाए। यह बहुत अच्छा है लेकिन तकनीकी उपायों से ही पर्यावरण का संकट हल नहीं होगा।
इसके लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। हमें यह तय करना होगा कि क्या हमें तामझाम व विलासिता वाली जीवनशैली चाहिए, जो ज्यादा ऊर्जा गटकती है या फिर समता व सादगी के सिद्धांत अपनाना चाहिए, जो गांधी की सोच का मूल है।
गांधी जी ने आजादी के संघर्ष के साथ रचनात्मक कार्यक्रम भी चलाए। जैसे शराबबंदी, चरखा और साफ-सफाई, लघु कुटीर उद्योग, छुआछूत मिटाना, प्राकृतिक चिकित्सा और शिक्षा को उत्पादक काम से जोड़ने वाली नई तालीम। आज भी इनमें से कुछ कार्यक्रम आश्रम में जारी हैं। जैसे नई तालीम का स्कूल, एक अच्छा उदाहरण है, जिसमें बच्चे जीवनशिक्षा सीखते हैं। यानी हाथ से उत्पादक काम करके शिक्षा हासिल करते हैं।
गांधी जी ने स्वावलंबी और आत्मनिर्भर गांवों का सपना देखा था। आज भी ऐसे कामों की बहुत जरूरत है जिससे गांव स्वावलंबी बने। उनका प्रसिद्ध कथन था कि- 'पृथ्वी हर व्यक्ति की जरूरत पूरा करने का सामर्थ्य रखती है, पर उसके लालच का नहीं।' गांधी जी यह कथन आधुनिक विकास की सीमा बताता है। प्रकृति से सामंजस्य बनाकर चलने की सीख देता है।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि बीजोत्सव जैसे कार्यक्रम हमें नई जैविक, प्राकृतिक खेती का मार्ग तो दिखाते ही हैं, जिस पर चलकर मिट्टी-पानी का संरक्षण किया जा सके, जैव विविधता व पर्यावरण रक्षा की जा सके। नई तकनीकों की जानकारी भी देते हैं। किसान- उपभोक्ताओं में आपस में मेल-मिलाप कराते हैं, जिससे किसानों को फसलों को उचित दाम मिले और उपभोक्ताओं को भी वाजिब दाम में अच्छा अनाज मिल सके।
इसके साथ ही खेती को स्वावलंबी, कुदरती, विविधतापूर्ण, रसायनमुक्त, कम ऊर्जा वाली, कम पूंजी वाली, एक कम जोखिम वाली बनाया जाए। जैविक व प्राकृतिक खेती को लोकप्रिय बनाया जाए। साथ ही फिजूलखर्जी, शान-शौकत, तामझाम को बढ़ावा देने वाली भोगवादी संस्कृति पर भी लगाम लगाई जाए, तभी हम खेती, पर्यावरण के संरक्षण के साथ बेहतर जीवन भी जी पाएंगे। जलवायु बदलाव का भी मुकाबला कर पाएंगे।