पंजाब में भ्रष्टाचार के आरोपों पर CBI जांच का आदेश, सुप्रीम कोर्ट जाएगी भगवंत मान सरकार

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए CBI को आरोपों की जांच शुरू करने और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने कहा कि आरोपों की प्रकृति को देखते हुए मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है।;

Update: 2026-10-06 04:53 GMT

चंडीगढ़। पंजाब सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है, जिसमें राज्य में तबादलों, नीतिगत फैसलों, टेंडर, नियुक्तियों और सरकारी कामकाज में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का निर्देश दिया गया है। राज्य के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने सरकार के इस फैसले की जानकारी दी। सरकार का कहना है कि वह हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख करेगी। चीमा ने इसके पीछे नवंबर 2020 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा पंजाब में CBI को दी गई सामान्य सहमति वापस लेने के फैसले का हवाला दिया। उनका कहना है कि सामान्य सहमति वापस लिए जाने के बाद राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।

CBI को तुरंत FIR दर्ज करने का दिया निर्देश

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए CBI को आरोपों की जांच शुरू करने और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने कहा कि आरोपों की प्रकृति को देखते हुए मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है। अदालत ने CBI को जांच पूरी कर दो महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई सात दिसंबर को निर्धारित की गई है।

CM ऑफिस और निजी लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप

यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से पंजाब के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजे गए पत्रों के बाद सामने आया। ED ने पंजाब DGP को तीन पत्र भेजकर कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इनमें पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय और कुछ निजी व्यक्तियों से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों का उल्लेख किया गया था। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ED की ओर से उपलब्ध कराई गई सामग्री का भी संज्ञान लिया। अदालत के मुताबिक, सामग्री में कई वाट्सएप संदेश और अन्य दस्तावेज शामिल हैं, जो प्रथम दृष्टया उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों से जुड़े संज्ञेय अपराध की ओर संकेत करते हैं।

ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर टेंडर तक गंभीर आरोप

मामले में अधिवक्ता निखिल साराफ ने जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि पंजाब में कुछ वरिष्ठ अधिकारी और अन्य सरकारी सेवक कथित तौर पर भ्रष्टाचार की गतिविधियों में शामिल हैं। याचिका में एक कथित रिश्वतखोरी नेटवर्क का आरोप लगाया गया है, जिसके जरिए IAS और पुलिस अधिकारियों के तबादलों एवं पोस्टिंग को प्रभावित करने की बात कही गई। इसके अलावा विभिन्न सरकारी विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों में भी कथित तौर पर अनुचित प्रभाव का आरोप लगाया गया है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि कुछ बिल्डरों, भूमि विकासकर्ताओं और अन्य कारोबारियों को कथित अवैध लाभ के बदले टेंडर, लाइसेंस और जरूरी अनुमतियां उपलब्ध कराई जा रही थीं। इसके साथ ही एक कथित 'संस्थागत जबरन वसूली रैकेट' का आरोप भी लगाया गया, जिसमें लोगों को झूठे मामलों में फंसाने की बात कही गई है।

करीब दो महीने तक FIR दर्ज नहीं होने पर सवाल

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि ED की ओर से 30 जुलाई को DGP को पत्र भेजे जाने के बावजूद करीब दो महीने तक FIR दर्ज नहीं की गई। अदालत ने इसी आधार पर राज्य पुलिस से निष्पक्ष जांच की संभावना पर चिंता जताई। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ED की ओर से लगाए गए आरोपों को अभी साबित हुआ नहीं माना जा सकता। आरोपों की वास्तविकता और जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण CBI की जांच तथा आगे होने वाली न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही होगा। अब पंजाब सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले से यह मामला और महत्वपूर्ण हो गया है। शीर्ष अदालत में होने वाली सुनवाई से यह तय होगा कि हाई कोर्ट के CBI जांच के निर्देश पर आगे क्या कार्रवाई होती है।

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