आरक्षण पर मोहन भागवत के बयान से गरमाई सियासत, मायावती बोलीं- जातिगत भेदभाव खत्म होने तक जारी रहे व्यवस्था

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में आरक्षण को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसका राजनीतिकरण किए जाने से समाज में कड़वाहट पैदा हुई है। उन्होंने आरक्षण का लाभ उठाने वाले लोगों से स्वेच्छा से इसका लाभ छोड़ने की अपील की थी।;

Update: 2026-08-09 07:40 GMT

लखनऊ: आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भागवत के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि जब तक समाज में जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। मायावती ने सोशल मीडिया पर पोस्ट के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरक्षण को बहुजन समाज, विशेषकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति और आत्मसम्मान से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बताया।

भागवत ने क्या कहा था?

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में आरक्षण को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसका राजनीतिकरण किए जाने से समाज में कड़वाहट पैदा हुई है। उन्होंने आरक्षण का लाभ उठाने वाले लोगों से स्वेच्छा से इसका लाभ छोड़ने की अपील की थी। भागवत की इस टिप्पणी के बाद आरक्षण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस शुरू हो गई। मायावती ने भी इसी मुद्दे को लेकर अपनी प्रतिक्रिया सामने रखी और आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए इसका बचाव किया।

मायावती ने बताया सामाजिक न्याय का माध्यम

मायावती ने कहा कि भारत में जाति के आधार पर सदियों से छुआछूत, शोषण, भेदभाव और अन्याय का सामना करने वाले समुदायों के लिए आरक्षण बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, आरक्षण केवल नौकरी या शिक्षा में अवसर देने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सामाजिक बराबरी और सम्मान हासिल करने का संवैधानिक माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि जब तक जातिवादी सोच और सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हो जाते, तब तक आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी। मायावती ने आरक्षण को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर देखने की सोच पर भी सवाल उठाया।

क्रीमी लेयर पर भी जताई आपत्ति

बसपा प्रमुख ने आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में अनुचित बताया और कहा कि यह संविधान के सामाजिक न्याय से जुड़े उद्देश्यों के अनुरूप नहीं है। मायावती ने कहा कि जातिगत भेदभाव केवल आर्थिक स्थिति से जुड़ा विषय नहीं है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बावजूद उसे सामाजिक स्तर पर जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए आरक्षण को सिर्फ आर्थिक उन्नति के पैमाने से नहीं देखा जाना चाहिए।

केंद्र सरकार से कोर्ट में मजबूत पैरवी की मांग

मायावती ने केंद्र सरकार से भी आरक्षण से जुड़े मामलों में प्रभावी कानूनी पैरवी करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि सरकार के पास अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को क्रीमी लेयर के दायरे से बाहर रखने के लिए मजबूत संवैधानिक और कानूनी आधार हैं तो उसे अदालत के समक्ष मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कई मौकों पर सरकारों की कमजोर कानूनी पैरवी के कारण सामाजिक न्याय से जुड़े मामलों में अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो पाते।

RSS से राजनीति से दूर रहने की अपील

मायावती ने आरएसएस से भी आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति नहीं करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संगठन को डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान के उद्देश्यों और समानता के सिद्धांत का सम्मान करना चाहिए। बसपा प्रमुख ने कहा कि देश में ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है, जिसमें जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त हो और सभी वर्गों को समान सम्मान और अवसर मिले। उन्होंने आरएसएस से संवैधानिक मूल्यों और समतामूलक समाज की स्थापना के प्रयासों में सहयोग करने की अपील की।

आरक्षण पर आगे भी जारी रह सकती है बहस

मोहन भागवत की टिप्पणी और मायावती की प्रतिक्रिया के बाद आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। एक तरफ आरक्षण के लाभ और उसके राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक असमानता के आधार पर इसकी जरूरत को लेकर तर्क दिए जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस में और जोर पकड़ सकता है।

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