नई दिल्ली: कांग्रेस ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली अपनी प्रस्तावित महारैली को सफल बनाने के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी ने इस रैली में 10 लाख लोगों की भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा है। कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और 'वोट चोरी' के मुद्दे पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक अभियान होगा। पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी अपना विरोध तेज करने की तैयारी में है। भाजपा की ओर से रैली को लेकर किए जा रहे राजनीतिक हमलों को कांग्रेस अपनी मुहिम की अहमियत का संकेत मान रही है। रैली की तैयारियों के तहत कांग्रेस ने दिल्ली के आसपास के राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और उत्तराखंड पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता लगातार राज्यों के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। इसके अलावा, महारैली से पहले विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध को धार देने के लिए कई राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना भी बनाई गई है।
30 अक्टूबर को मॉक संसद आयोजित करने की तैयारी
कांग्रेस महारैली से पहले 30 अक्टूबर को दिल्ली के अशोक होटल में मॉक संसद आयोजित करने की योजना बना रही है। इसमें कांग्रेस के अलावा विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए के सांसदों को भी आमंत्रित किए जाने की तैयारी है। इस कार्यक्रम के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सांकेतिक 'महाभियोग प्रस्ताव' पारित कराने की योजना है। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अलग-अलग हैं। ऐसे में प्रस्तावित कार्यक्रम को राजनीतिक विरोध के प्रतीकात्मक प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस का उद्देश्य चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए विपक्ष की आवाज को एकजुट करना है।
विपक्षी एकजुटता दिखाने का मौका
विपक्षी दलों ने सितंबर के आखिर में कथित वोट चोरी के खिलाफ साझा अभियान चलाने का फैसला किया था। रामलीला मैदान की महारैली इसी अभियान का पहला बड़ा पड़ाव मानी जा रही है। इस कार्यक्रम के जरिए कांग्रेस विपक्षी गठबंधन में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका और संगठनात्मक क्षमता प्रदर्शित करना चाहती है। विपक्षी खेमे में तृणमूल कांग्रेस, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के सामने आई राजनीतिक चुनौतियों के बीच कांग्रेस की जिम्मेदारी बढ़ गई है। ऐसे में महारैली में विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस की रणनीति केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। पार्टी बड़े जनसमूह के जरिए चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव बढ़ाना चाहती है और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने का प्रयास कर रही है।
हरियाणा से डेढ़ लाख, यूपी से 50 हजार लोगों का लक्ष्य
कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल रैली की तैयारियों की लगातार समीक्षा कर रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने हरियाणा और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें कीं। उत्तर प्रदेश की बैठक में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद थीं। बैठक में हरियाणा कांग्रेस के नेताओं को एक से डेढ़ लाख लोगों को रैली में लाने का लक्ष्य दिया गया। वहीं, उत्तर प्रदेश से 50 हजार लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भरोसा जताया कि पार्टी इस लक्ष्य को पूरा करेगी। इसके अलावा राजस्थान, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की कांग्रेस इकाइयों को भी भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी दी गई है। बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और दक्षिण तथा पश्चिम भारत के राज्यों में भी संगठन को सक्रिय किया जा रहा है।
युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर
शनिवार को केसी वेणुगोपाल ने कांग्रेस सेवा दल प्रमुख वीबी श्रीनिवास, महिला कांग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा, युवा कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिब और एनएसयूआई प्रमुख विनोद जाखड़ के साथ बैठक की। इसमें युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा हुई। वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस को उम्मीद है कि कम से कम 10 लाख लोग रामलीला मैदान में जुटकर कथित वोट चोरी के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे। उन्होंने इसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण कार्यक्रम बताया और कहा कि इसके जरिए देशभर में संदेश देने की कोशिश की जाएगी।
चुनाव आयोग के मुद्दे पर कांग्रेस की बड़ी परीक्षा
एक नवंबर की महारैली कांग्रेस के लिए राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अवसर है। पार्टी जहां चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा के साथ उसका राजनीतिक टकराव भी तेज होने की संभावना है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि कांग्रेस अपने 10 लाख लोगों के जुटने के लक्ष्य के कितने करीब पहुंचती है और विपक्षी गठबंधन के कितने बड़े नेता रैली में शामिल होते हैं। रैली की सफलता कांग्रेस के संगठनात्मक दावे और विपक्षी एकजुटता, दोनों की परीक्षा मानी जाएगी।