भारत की सरहद पार पहचान बनाता पूर्वोत्तर का सिनेमा

नागालैंड की फिल्म ‘अंघ’ को टोरंटो फिल्मोत्सव में अवार्ड मिला है. भारत की सरहद पार पूर्वोत्तर का सिनेमा पहचान बना रहा है,;

Update: 2026-09-23 08:05 GMT

देश का पूर्वोत्तर इलाका आजादी के बाद से ही हिंसा और उग्रवाद के लिए बदनाम रहा है. लेकिन अब इलाके का सिनेमा सरहद पार कर विदेशों में अपनी नई पहचान बना रहा है.

नागालैंड के युवा निर्देशक थेजा रियो के निर्देशन मे बनी फिल्म ‘अंघ' को टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में मिले अवार्ड से इसके अगले साल आस्कर में जाने का रास्ता खुल गया है. इससे पहले महिला निर्देशक लक्ष्मीप्रिया के निर्देशन में बनी मणिपुरी फिल्म ‘बूंग' ने बाफ्टा अवार्ड जीत कर सुर्खियों में आई थी.

वैसे तो पूर्वोत्तर में फिल्मों के निर्माण का सिलसिला वर्ष 1935 में ही शुरू हुआ था. अस्सी और नब्बे के दशक में भी इलाके की कुछ फिल्मों ने अंतरराष्ट्रीय अवार्ड हासिल किए थे. असमिया फिल्म निर्माता जाह्नू बरुआ की फिल्म ‘हालोधिया चोराई बाओधान खाई' (महाविपत्ति) को वर्ष 1988 में लोकार्नो अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में अवार्ड मिला था. वर्ष 1991 के कान फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित मणिपुरी फिल्म ईशानाऊ (चुना हुआ) उस साल फिल्मोत्सव में प्रदर्शित और सराही गई अकेली भारतीय फिल्म थी.

दुनिया में अपनी जगह बना रहा है पूर्वोत्तर भारत का सिनेमा

हाल के वर्षो में यहां बनने वाली फिल्मों ने वैश्विक मंच पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है. इलाके के कई युवा फिल्म निर्माताओं के काम ने दुनिया भर का ध्यान खींचा है. उनको अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाया गया है.

असमिया फिल्म निर्माता रीमा दास की फिल्म 'विलेज रॉकस्टार्स' (2017) को 90वें एकेडमी अवार्ड्स में ‘विदेशी भाषा की श्रेष्ठ फिल्म' कैटेगरी के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर चुना गया था. वह एक नया रिकार्ड था. इस कामयाबी का सिलसिला जारी रखते हुए रीमा दास की फिल्म ‘नाट ए हीरो' ने इस साल बर्लिनाले में ‘क्रिस्टल बीयर स्पेशल मेंशन' हासिल किया.

दिल्ली में मणिपुरी संगीतकार की हत्या से उठते सवाल

मेघालय के निर्माता प्रदीप कुरबाह की फिल्म ‘लेवदुह (बाजार)' का प्रीमियर वर्ष 2019 में बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में हुआ था. इसके निर्माता कुरबाह किम जिसोक अवार्ड जीतने वाले पहले भारतीय बने. बीते साल बनी उनकी फिल्म द ‘एलीसियन फील्ड' को मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में श्रेष्ठ एशियाई फिल्म के सम्मान से नवाजा गया था.

कुरबाह डीडब्ल्यू से कहते हैं, "भारत में 'पूर्वोत्तर के लेबल' की पहचान अलग है. इलाके का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए बेहद गौरव की बात है. मेरी कोशिश अपनी फिल्मों की कहानियों में ऐसे वैश्विक तत्व शामिल करने की होती है जिनसे दुनिया के हर कोने के लोग जुड़ाव महसूस कर सकें.”

बुसान फिल्म महोत्सव में भी मिल चुकी है पहचान

मशहूर मणिपुरी निर्माता हाओबम पबन कुमार की फिल्म जोसेफ्स सन को पूर्वोत्तर भारत की दो अन्य फिल्मों के साथ 'मार्शे डू फिल्म' (कान फिल्म महोत्सव 2026) में चुना गया था. दुनिया के विभिन्न देशों में उसकी स्क्रीनिंग हुई है. इसने बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में दो अवार्ड जीते थे.

इसी तरह सिक्किम की फिल्म निर्माता त्रिवेणी राई की पहली नेपाली फीचर फिल्म ‘शेप आफ मोमो' की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में स्क्रीनिंग हुई थी. यह बिष्णु नामक एक युवा महिला की कहानी है जो दिल्ली से अपने गांव लौटने के बाद वहां जारी पितृसत्तात्मक परंपराओं का सामना करती है.

सत्यजित रे फिल्म संस्थान (एसआरएफटीआई) से पढ़ाई करने वाली त्रिवेणी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पहचान और भेदभाव के मुद्दे अहम हैं. यहां हर किसी को किसी न किसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है. लेकिन विदेशी फिल्मोत्सवों में लोग मुझे भारतीय फिल्म निर्माता के तौर पर जानते हैं. वहां मेरी पहचान मेरे राज्य से नहीं होती. पहचान का मुद्दा भारत तक ही सीमित है.

कार्बी भाषा में बनी खंजन किशोर नाथ की फिल्म ‘कांग्बो आलोती' (खोया हुआ रास्ता) उस इलाके के सामयिक मुद्दों को उठाती है. 31वें कोलकाता अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में उसे ‘स्पेशल ज्यूरी अवार्ड' मिला था. उसके अलावा दुनिया भर के विभिन्न महोत्सवों में उसकी स्क्रीनिंग हो चुकी है.

क्या है अंघ की कहानी

नागालंड की फिल्म ‘अंघ' की कहानी 1960 के दशक के नागालैंड के ग्रामीण और जंगली इलाकों पर आधारित है. इसकी कहानी कोन्याक कबीले के प्रमुख अंघबा नामक एक बुजुर्ग और उसके पुत्र के ईर्द-गिर्द घूमती है. उस समय नागालैंड में सभ्यता और सांस्कृति के बदलाव के दौर से गुजर रहा था. सदियों पुरानी जनजातीय परंपराएं खत्म हो रही थीं और लोग तेजी से ईसाई धर्म अपना रहे थे. पिता पुरानी परंपराओं और मान्यताओं का पक्षधर है तो पुत्र मिशनरी के प्रभाव में बदलाव का. फिल्म में पिता-पुत्र के रिश्तों के बीच वैचारिक टकराव और बदलाव का बेहद खूबसूरत चित्रण किया गया है.

इसके निर्माता रियो ने राजधानी कोहिमा में पत्रकारों से कहा, "यह मेरे और इससे जुड़े तमाम लोगों के लिए एक बहुत ही खास पल है. किसी डेब्यू फिल्म को इतना सम्मान मिलना दुर्लभ है. लेकिन मैंने यह फिल्म दिल से बनाई है.”

क्या कहते हैं आलोचक?

आलोचकों का कहना है कि इलाके के दिग्गज फिल्म निर्माताओं ने अपनी दमदार कहानियों के जरिए दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई और अगली पीढ़ी के लिए रास्ता तैयार किया. अब दूसरी पीढ़ी के फिल्म निर्माता ऐसी स्थानीय कहानियों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जो हर वर्ग को पसंद आ सके.

मणिपुर के फिल्म आलोचक मेघचंद्र के. डीडब्ल्यू से कहते हैं, "नई पीढ़ी के निर्माता अब हिंसा और उग्रवाद को मुख्य विषय बनाने वाली घिसी-पिटी सोच से उबरते हुए क्षेत्रीय कहानियों और यथार्थ पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. उनकी फिल्में भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों के दर्शकों के दिलों को छू रही हैं.”

कोलकाता में एक फिल्म आलोचक बरुण चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पूर्वोत्तर के सिनेमा को इस क्षेत्र की वास्तविकताओं पर आधारित कहानियों के जरिए लगातार वैश्विक दर्शक पाने में कामयाबी मिली है.”

निर्माता और फिल्म एसोसिएशन आफ नागालैंड की अध्यक्ष किविनी शोहे डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पूर्वोत्तर भारत का सिनेमा वैश्विक स्तर पर अहम उपलब्धियां हासिल कर रहा है. इस क्षेत्र के निर्माताओं की नई पीढ़ी दुनिया का नजरिया बदल रही है. वो इन आठ राज्यों को महज एक जैसे या अनूठे इलाके के तौर पर देखने के बजाय इनको गहरे और बेहतरीन ढंग से बनने वाले स्वतंत्र सिनेमा के केंद्र के तौर पर पहचान दिला रही है.”

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