बढ़ते जलवायु संकट के बीच ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित करने की मांग

बढ़ते जलवायु संकट के बीच ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित करने की मांग;

Update: 2026-10-31 06:39 GMT

दुनिया भर में गर्मी से होने वाली मौतें, सूखा और खाद्य असुरक्षा तेजी से बढ़ रही हैं. 30 से ज्यादा देशों के लगभग 150 शोधकर्ताओं ने मांग की है कि जलवायु परिवर्तन को तुरंत “वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल” घोषित किया जाए.

लैंसेट की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से इंसान की सेहत पर कितना बुरा असर पड़ रहा है. पृथ्वी का तापमान बढ़ने से स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को होने वाला नुकसान पिछले एक दशक में काफी बढ़ गया है. एक दशक पहले दुनिया भर के देशों ने पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने उस समय जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए इस ऐतिहासिक समझौते की सराहना की थी और इसे "सदी का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समझौता” बताया था.

इसके बावजूद, सिर्फ 2023 में ही जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी से 5 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और ये तपिश 2016 के बाद से लगभग 30 लाख लोगों की जान जा चुकी है. पिछले दशक की तुलना में, भीषण सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में 700 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है. इससे भोजन और पानी की आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है. बीमारियों का जोखिम भी बढ़ गया है. ‘लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज' की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल गर्मी के कारण दुनिया की संभावित आय में करीब 1.07 ट्रिलियन डॉलर (करीब 962 अरब यूरो) का नुकसान हुआ है.

एलन डैंगोर, दुनिया की सबसे बड़ी चैरिटी में से एक ‘वेलकम ट्रस्ट' में जलवायु और स्वास्थ्य निदेशक हैं. उन्होंने कहा, "अब यह सब और नहीं चल सकता. हमें अपनी दिशा बदलनी होगी. जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने प्रयासों में लोगों के स्वास्थ्य और भलाई को सबसे ऊपर रखना होगा. हमें अपनी सफलता का पैमाना केवल कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों या तापमान की डिग्री से नहीं, बल्कि बचाई गई जिंदगियों और बेहतर हुए स्वास्थ्य से तय करना चाहिए.” इसी चैरिटी ने लैंसेट की रिपोर्ट तैयार करने के लिए धन मुहैया कराया है.

पहले की तुलना में तेजी से बढ़ी हैं जलवायु से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां

लैंसेट के अध्ययन में दिखाया गया है कि पेरिस समझौता होने से पहले वाले दशक की तुलना में, इस दशक में स्वास्थ्य से जुड़े खतरे कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं. भीषण गर्मी इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. 2016 से 2023 के बीच गर्मी से होने वाली मौतों में से 68 फीसदी के लिए जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार था. जबकि, पिछले दशक में यह आंकड़ा 55 फीसदी था. इसी अवधि के दौरान, जलवायु के कारण बढ़ी गर्मी से होने वाली मौतों में सालाना वृद्धि दोगुनी से भी ज्यादा हो गई.

सिडनी विश्वविद्यालय के ‘हीट एंड हेल्थ रिसर्च सेंटर' के ओली जे ने कहा कि गर्मी से होने वाली मौतें तो "तैरते हिमखंड के सिर्फ ऊपरी हिस्से” जैसी हैं. उन्होंने बताया, "लेकिन यह हिमखंड पिघलने के बजाय हर साल और बड़ा होता जा रहा है.” इसके अलावा, लू लगना, नींद पूरी न होना और पुरानी बीमारियों का गंभीर होना भी गर्मी के गंभीर दुष्प्रभाव हैं.

सिर्फ सेहत पर ही असर नहीं हो रहा है, बल्कि आर्थिक नुकसान भी हो रहा है. बहुत ज्यादा गर्मी में काम करने से लोगों को थकावट, बीमार होने या चोट लगने का खतरा रहता है. इसका नतीजा यह हो सकता है कि वे अपनी कमाई और आजीविका भी खो दें.

2025 में गर्मी के कारण काम के संभावित 573 अरब घंटे बर्बाद हो गए. इसका सबसे बुरा असर खेतिहर मजदूरों पर पड़ा. अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा. यहां जीडीपी में 5 फीसदी तक की गिरावट आई. जबकि, अधिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह नुकसान 0.5 फीसदी रहा.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से जुड़ीं और ‘लैंसेट काउंटडाउन' की कार्यकारी निदेशक मरीना रोमानेलो ने एक प्रेस ब्रीफिंग में पत्रकारों को बताया, "आर्थिक मार सबसे ज्यादा कमजोर क्षेत्रों और समुदायों पर पड़ रही है.”

पानी से जुड़ी चरम स्थितियां भी गंभीर होती जा रही हैं. उपग्रहों से मिले आंकड़ों के मुताबिक, 2003 से दुनिया की 43 फीसदी जमीन लगातार सूख रही है. जबकि, 37 फीसदी जमीन पहले से ज्यादा नम हो रही है. इस तरह दुनिया की 80 फीसदी से ज्यादा जमीन पर सूखे या अत्यधिक नमी जैसी परिस्थितियां बढ़ रही हैं. इससे फसलों, खाद्य आपूर्ति और साफ-सफाई की व्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है.

सूखे की वजह से लोगों के पास पीने के लिए सुरक्षित व साफ पानी की कमी हो सकती है. साथ ही, संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. वहीं, बाढ़ से डूबने, चोट लगने और पानी के दूषित होने का जोखिम होता है. 1981 से 2010 के औसत की तुलना में, 2024 में लू और सूखे के कारण करीब 12.8 करोड़ और लोग खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंच गए.

रोमानेलो ने कहा, "यह स्थिति धीरे-धीरे खराब नहीं हो रही है, बल्कि इसमें अचानक बड़ा बदलाव आया है.”

वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने से क्या बदलेगा?

लोगों की जान बचाने और उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए विशेषज्ञ विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक नए तंत्र की मांग कर रहे हैं. इससे देशों को जानकारी साझा करने, मिलकर कार्रवाई करने, खतरों पर नजर रखने और धन उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी. इस व्यवस्था को संयुक्त राष्ट्र और उसके सदस्य देश मिलकर बनाएंगे.

इससे मिलती-जुलती मौजूदा व्यवस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन का ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न' (पीएचईआईसी) तंत्र है. इसका इस्तेमाल कोविड-19 महामारी और एमपॉक्स के प्रकोप के दौरान किया गया था. लेकिन यह व्यवस्था कम समय तक रहने वाली आपात स्थितियों से निपटने के लिए बनाई गई थी. इसलिए यह जलवायु परिवर्तन जैसे जटिल खतरे से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इसके लिए दुनिया भर में कई क्षेत्रों को मिलकर लंबे समय तक काम करना होगा.

रोमानेलो ने कहा कि दुनिया को एक व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत है, "ताकि हमें बार-बार आने वाली आपात स्थितियों के पीछे न भागना पड़े.” उन्होंने आगे कहा, "हमें एक ऐसा ठोस और दीर्घकालिक (लंबे समय तक चलने वाला) कदम उठाना होगा, जो देशों की सहनशक्ति और क्षमता को बढ़ाए, ताकि वे भविष्य में आने वाली आपात स्थितियों से खुद को बचा सकें.”

प्रगति हो रही है, लेकिन बहुत धीमी

रोमानेलो ने पत्रकारों से कहा, "हमारे पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं” कि इस तरह के कदम उठाने से सेहत पर अच्छा असर पड़ता है. उन्होंने कहा, "मौसम पर आधारित शुरुआती चेतावनी प्रणालियों की मदद से चरम मौसम की घटनाओं से होने वाले नुकसान में कमी आई है.”

अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ने से, जीवाश्म ईंधन की वजह से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण मरने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई है. साल 2016 के बाद से 140 देशों में किए गए आकलन से यह पता चला है कि इनमें से आधे देशों में प्रदूषण से होने वाली मौतें घटी हैं. इससे हर साल अनुमानित तौर पर 3,23,000 जानें बचाई जा रही हैं.

अब 56 देशों के पास हीटवेव और बीमारियों के फैलने जैसे जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की राष्ट्रीय योजनाएं हैं. 2015 में ऐसे देशों की संख्या केवल 14 थी.

हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक, इस दिशा में प्रगति अभी भी बहुत धीमी है. जीवाश्म ईंधन आज भी दुनिया की 80 फीसदी से ज्यादा ऊर्जा की जरूरतें पूरी करते हैं. जबकि, इन्हें जलाने से निकलने वाला धुआं धरती को गर्म और प्रदूषित करता है.

2024 में ऊर्जा से जुड़े उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए. दुनिया की 100 सबसे बड़ी तेल और गैस कंपनियां 2040 तक इतना तेल और गैस निकालने की राह पर हैं, जो तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य के हिसाब से 150 फीसदी अधिक है. एक साल पहले, यह आंकड़ा 138 फीसदी था.

पुरानी तकनीक में निवेश

सरकारें आज भी जीवाश्म ईंधन को बढ़ावा देने के लिए पैसे दे रही हैं. साल 2016 के बाद से यह सरकारी मदद (सब्सिडी) दोगुनी होकर 6.2 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गई है. हालात ऐसे हैं कि 2024 में 10 देशों ने अपनी पूरी स्वास्थ्य प्रणालियों पर होने वाले खर्च की तुलना में, ऐसी सब्सिडी पर कहीं अधिक पैसा खर्च किया.

रोमानेलो ने बताया कि जैसे-जैसे जीवाश्म ईंधन महंगे हो रहे हैं और अक्षय ऊर्जा सस्ती हो रही है, प्रदूषण फैलाने वाली ये तकनीकें अब लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही हैं.

रोमानेलो ने जीवाश्म ईंधन में नए निवेश की तुलना "नेटफ्लिक्स के दौर में ब्लॉकबस्टर में पैसा लगाने” से की. उनका मतलब था कि यह पुरानी तकनीक पर दांव लगाने जैसा है. ब्लॉकबस्टर कभी किराये पर वीडियो उपलब्ध कराने वाली बेहद लोकप्रिय कंपनी थी, लेकिन वह ऑनलाइन स्ट्रीमिंग के दौर के हिसाब से खुद को नहीं बदल पाई और नाकाम हो गई. इसी तरह, जीवाश्म ईंधन में निवेश करना एक पुरानी तकनीक पर दांव लगाने जैसा है.

इस बीच, जलवायु परिवर्तन के हिसाब से स्वास्थ्य प्रणालियों को ढालने के लिए बहुत कम पैसा उपलब्ध है. विकासशील देशों का अनुमान है कि उन्हें इसके लिए हर साल करीब 3.3 अरब डॉलर की जरूरत है. हालांकि, लैंसेट के लेखकों का कहना है कि यह अनुमान वास्तविक जरूरत से कम हो सकता है. 2024 में इस राशि का केवल करीब एक-तिहाई हिस्सा देने का वादा किया गया था. अमेरिका और फिर जर्मनी की ओर से विदेशी सहायता में कटौती किए जाने से पैसों की कमी और बढ़ रही है. जर्मनी ने विदेशी सहायता में दूसरी सबसे बड़ी कटौती की है.

न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री और लैंसेट काउंटडाउन बोर्ड की प्रेसीडेंट हेलेन क्लार्क ने कहा, "यह रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी देती है कि जलवायु परिवर्तन एक स्वास्थ्य आपातकाल है. हमारे पास सबूतों की कमी नहीं है, बल्कि उन पर कार्रवाई करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है.”

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