यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया रोक, कहा- नए नियमों का हो सकता है दुरुपयोग
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों की भाषा और मंशा पर सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “हमें यह तय करना होगा कि क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर उल्टी दिशा में जा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जिन वर्गों को वास्तव में सुरक्षा की जरूरत है, उनके लिए व्यवस्था होना जरूरी है, लेकिन नियम ऐसे नहीं होने चाहिए जो अस्पष्ट हों और जिनका गलत इस्तेमाल किया जा सके।
नई दिल्ली। उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए यूजीसी विनियम, 2026 पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। इन नियमों को सामान्य वर्गों के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि नए नियम अस्पष्ट हैं और उनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक यूजीसी के 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब इस संवेदनशील मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों की भाषा और मंशा पर सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “हमें यह तय करना होगा कि क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर उल्टी दिशा में जा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जिन वर्गों को वास्तव में सुरक्षा की जरूरत है, उनके लिए व्यवस्था होना जरूरी है, लेकिन नियम ऐसे नहीं होने चाहिए जो अस्पष्ट हों और जिनका गलत इस्तेमाल किया जा सके। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस मुद्दे पर एक विशेष विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है, ताकि नियमों की भाषा को और स्पष्ट किया जा सके।
केंद्र और यूजीसी से मांगा गया जवाब
पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी से पूछा कि इन नियमों को लागू करने से पहले क्या सभी पहलुओं पर पर्याप्त विचार किया गया था। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या इन नियमों के प्रभाव का आकलन किया गया है और क्या इससे सामाजिक संतुलन पर कोई विपरीत असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बनाए जाने वाले नियम स्पष्ट, संतुलित और संविधानसम्मत होने चाहिए, ताकि किसी भी वर्ग में असंतोष न फैले।
याचिकाकर्ताओं की दलील
यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि ये नियम सामान्य वर्गों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं,
संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और यूजीसी एक्ट, 1956 की मूल भावना के भी विपरीत हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समानता के नाम पर बनाए गए ये नियम वास्तव में नई असमानताओं को जन्म दे सकते हैं और उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकते हैं।
वकील विष्णु शंकर जैन का बयान
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ताओं में शामिल एक पक्ष के वकील एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने कहा, “आज सुप्रीम कोर्ट ने हमारी रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि अगले आदेश तक 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। यह हमारे लिए बड़ी राहत है। अब मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।” उन्होंने कहा कि यह फैसला उन लाखों छात्रों और शिक्षकों के लिए अहम है, जो इन नए नियमों को लेकर असमंजस और चिंता में थे।
देशभर में फैला था विरोध
यूजीसी रेगुलेशन 2026 को 23 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था। इसके तुरंत बाद देश के विभिन्न हिस्सों में इसका विरोध शुरू हो गया। छात्र संगठनों, शिक्षक संघों और सामाजिक संगठनों ने इन नियमों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान विरोधी बताते हुए आवाज उठाई। कई जगहों पर प्रदर्शन हुए और सरकार से नियमों को वापस लेने या संशोधित करने की मांग की गई।
किसने दायर की हैं याचिकाएं
यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। इनमें प्रमुख रूप से मृत्युंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल दीवान शामिल हैं। इन सभी याचिकाकर्ताओं का साझा तर्क है कि समानता के नाम पर बनाए गए ये नियम वास्तविक समानता को कमजोर करते हैं और समाज में नए विभाजन पैदा कर सकते हैं।
2012 के नियमों की वापसी
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल उच्च शिक्षा संस्थानों में यूजीसी रेगुलेशन 2012 ही लागू रहेंगे। इसका मतलब है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को किसी भी नए बदलाव को लागू करने से पहले अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार करना होगा। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे फिलहाल व्यवस्था में स्थिरता बनी रहेगी और छात्रों व संस्थानों को अचानक बदलावों का सामना नहीं करना पड़ेगा। अब सबकी नजरें 19 मार्च की सुनवाई पर टिकी हैं। उस दिन सुप्रीम कोर्ट केंद्र और यूजीसी के जवाबों पर विचार करेगा और तय करेगा कि नए नियमों में संशोधन की जरूरत है या नहीं, या उन्हें पूरी तरह रद्द किया जाना चाहिए।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश साफ संकेत देता है कि समानता के नाम पर बनाए गए किसी भी कानून या नियम को संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना ही होगा, वरना न्यायपालिका हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगी।