'धार्मिक वजह से वंदे मातरम न गाना अपराध नहीं': सुप्रीम कोर्ट बोला- आपराधिक कार्रवाई नहीं हो

अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत नहीं गाता है, तो केवल इस आधार पर उसे आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की भी जांच करने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम नहीं गाने को कानून के तहत दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं।;

Update: 2026-09-22 09:01 GMT

नई दिल्ली: वंदे मातरम के गायन से जुड़े कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत नहीं गाता है, तो केवल इस आधार पर उसे आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की भी जांच करने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम नहीं गाने को कानून के तहत दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह तय करने से इनकार कर दिया कि राष्ट्रगीत के कितने अंतरे आधिकारिक रूप से गाए जाने चाहिए। यानी दो अंतरों या छह अंतरों को लेकर फिलहाल कोई न्यायिक निर्णय नहीं दिया गया है।

टीएम कृष्णा ने दी है कानूनी चुनौती

यह मामला प्रसिद्ध गायक टीएम कृष्णा की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में वंदे मातरम से संबंधित कुछ कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि वंदे मातरम के अंतिम चार अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति भक्ति का उल्लेख मिलता है। याचिका में तर्क है कि इन अंशों का गायन अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता और देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों के सामने सवाल खड़ा करता है। अब सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि धार्मिक मान्यताओं के कारण किसी व्यक्ति द्वारा राष्ट्रगीत नहीं गाने की स्थिति में उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।

बिजो एमैनुअल मामले का दिया गया हवाला

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के बिजो एमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तय किए गए सिद्धांतों का उल्लेख किया। अदालत ने संकेत दिया कि मौजूदा मामले में कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय उस फैसले में स्थापित सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाएगा। बिजो एमैनुअल मामले में तीन छात्रों ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि, वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत ने उस समय माना था कि केवल राष्ट्रगान नहीं गाने के आधार पर उन छात्रों को दंडित नहीं किया जा सकता, जबकि वे उसके सम्मान में खड़े रहते थे। इसी फैसले के सिद्धांत मौजूदा विवाद में भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

वंदे मातरम से जुड़े कानून में क्या प्रावधान?

दिए गए विवरण के अनुसार, 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण देने से जुड़े प्रावधानों को कानून के दायरे में शामिल किया। इसके तहत राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकना, उसमें बाधा डालना या सार्वजनिक रूप से उसका अपमान करना दंडनीय बनाया गया है। ऐसे कृत्य के लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान बताया गया है। हालांकि, मौजूदा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का एक अहम सवाल यह है कि क्या केवल राष्ट्रगीत न गाने को भी इसी तरह दंडनीय माना जा सकता है, खासकर तब जब इसके पीछे धार्मिक कारण बताए जाएं।

राज्यसभा और लोकसभा से पारित हुआ था संशोधन

वंदे मातरम को संबंधित कानून के दायरे में लाने वाला संशोधन 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पारित होने की जानकारी दी गई है। इसके बाद 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ यह कानून प्रभावी हुआ। इस कानून को लेकर बहस का केंद्र अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक आस्था और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संतुलन का सवाल बन गया है।

छह अंतरों के गायन पर भी चर्चा

वंदे मातरम के कितने अंतरों का आधिकारिक रूप से गायन होना चाहिए, यह मुद्दा भी हाल के दिनों में चर्चा में रहा है। दिए गए विवरण के मुताबिक, इस साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले की प्राचीर से पहली बार वंदे मातरम के सभी छह अंतरों का गायन किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई में दो और छह अंतरों के विवाद पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया। अब मामले में केंद्र सरकार के जवाब और आगे होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि धार्मिक आधार पर राष्ट्रगीत न गाने के संबंध में आपराधिक प्रावधानों की संवैधानिक स्थिति क्या होगी।

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