आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों को भारी मुआवजे की चेतावनी

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, हर उस मामले में जहां कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों की मौत या चोट होती है, राज्य सरकार पर भारी मुआवजा लगाया जाएगा, क्योंकि सरकार ने कुछ नहीं किया।

Update: 2026-01-13 07:48 GMT
नई दिल्‍ली: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में बढ़ते आवारा कुत्तों के हमलों को लेकर मंगलवार को कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बच्चों और बुजुर्गों पर कुत्तों के हमलों के मामलों में अब प्रशासन की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि कुत्तों के काटने से किसी बच्चे या बुजुर्ग की मौत होती है या गंभीर चोट आती है, तो राज्य सरकार को भारी मुआवजा देना पड़ सकता है। यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने एक अहम सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने साफ कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण यह समस्या “हजार गुना” बढ़ चुकी है।

सरकार ने कुछ नहीं किया, इसलिए मुआवजा देगी

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “हर उस मामले में जहां कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों की मौत या चोट होती है, राज्य सरकार पर भारी मुआवजा लगाया जाएगा, क्योंकि सरकार ने कुछ नहीं किया।” उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि वे लोग और संगठन भी जवाबदेही से बच नहीं सकते जो सड़कों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं। जस्टिस नाथ ने दो टूक कहा, “अगर इतना ही शौक है तो कुत्तों को अपने घर ले जाइए। सड़क पर क्यों छोड़ा जा रहा है कि वे लोगों को डराएं और काटें?”

पशु-कल्याण ट्रस्टों की ओर से पेश हुईं मेनका गुरुस्वामी
यह टिप्पणी उस वक्त आई जब वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी अदालत में दलीलें रख रही थीं। वे दो पशु-कल्याण ट्रस्टों की ओर से पेश हुई थीं। गुरुस्वामी ने इसे एक “भावनात्मक मुद्दा” बताते हुए कहा कि इस समस्या का समाधान करुणा और कानून के दायरे में होना चाहिए। हालांकि, उनकी दलीलों पर अदालत का रुख सख्त नजर आया।

भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए दिख रही हैं

जस्टिस संदीप मेहता ने गुरुस्वामी की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा, “अभी तक तो भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए दिख रही हैं।” इस पर मेनका गुरुस्वामी ने जवाब दिया, “ऐसा नहीं है, मैं इंसानों की भी उतनी ही चिंता करती हूं।” उन्होंने संसद में इस विषय पर हुई बहसों का हवाला देते हुए कहा कि आवारा कुत्तों को मारना समाधान नहीं हो सकता।

“संसद एलीट क्लास है”

मेनका गुरुस्वामी द्वारा संसद की बहसों का जिक्र किए जाने पर जस्टिस संदीप मेहता ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “संसद एलीट क्लास है।” इस टिप्पणी को आम नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं और जमीनी हकीकत से जोड़कर देखा जा रहा है।

“कोर्ट रूम सार्वजनिक मंच बन गया है”
सुनवाई के दौरान बहस के बढ़ते दायरे पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “मैडम गुरुस्वामी, हमें प्रशासन को जवाबदेह ठहराने दीजिए ताकि हम कोई प्रक्रिया शुरू कर सकें। हर कोई वही बात दोहरा रहा है। हमें आदेश पारित करने दीजिए।” जस्टिस संदीप मेहता ने भी सख्त लहजे में कहा, “यह कोर्ट रूम अब एक सार्वजनिक मंच बन गया है, न्यायिक कार्यवाही नहीं।” अदालत ने स्पष्ट किया कि वह भावनात्मक बहस के बजाय ठोस प्रशासनिक समाधान और जवाबदेही तय करना चाहती है।

नसबंदी बनाम हत्या: समाधान पर बहस
मेनका गुरुस्वामी ने अपनी दलीलों में कहा कि आवारा कुत्तों को मारना किसी भी तरह से समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि नसबंदी (Sterilisation) ही इस समस्या का सही और मानवीय तरीका है। उनका तर्क था कि केंद्र सरकार द्वारा दिए जा रहे फंड का सही उपयोग नहीं हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम सिर्फ जन्म नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जानवरों को बंद करने या उनका सफाया करने के खिलाफ भी हैं। गुरुस्वामी ने कहा, “संसद मानती है कि कुत्तों को मारने की नीति विफल हो चुकी है। हम करुणा की कमी नहीं कर सकते। कोई भी तर्क क्रूरता और कुत्तों के सफाए को सही नहीं ठहरा सकता।”

कोर्ट का पलटवार: बच्चों की जान का क्या?

कोर्ट ने इस दलील पर तीखी प्रतिक्रिया दी। जस्टिस विक्रम नाथ ने सवाल उठाया, “जब कुत्ते 9 साल के बच्चे पर हमला करते हैं, तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? क्या उस संगठन को जो उन्हें खाना खिला रहा है? क्या हम इस समस्या से आंखें मूंद लें?” कोर्ट ने साफ कहा कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले तथाकथित डॉग लवर्स अगर सच में जिम्मेदार हैं, तो उन्हें कुत्तों को अपने घर ले जाना चाहिए, न कि सार्वजनिक सड़कों पर छोड़ना चाहिए।

लाइलाज बीमारी और सार्वजनिक सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान एक और गंभीर पहलू की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने कहा कि कुत्तों में एक खास तरह का वायरस होता है, जिसका कोई इलाज नहीं है। अदालत ने रणथंभौर नेशनल पार्क का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कुत्तों को काटने वाले बाघ एक लाइलाज बीमारी से संक्रमित पाए गए थे। यह टिप्पणी इस ओर इशारा करती है कि आवारा कुत्तों की समस्या सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी खतरा बन सकती है।

आंखें मूंदना समाधान नहीं

पीठ ने कहा कि सरकारों और समाज दोनों को यह समझना होगा कि इस समस्या से आंखें मूंद लेने से हालात और बिगड़ेंगे। कोर्ट ने दोहराया कि जिन लोगों या संगठनों का दावा है कि वे कुत्तों को खाना खिलाकर सेवा कर रहे हैं, उनकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

राज्यों पर सीधी जिम्मेदारी
कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों के हमलों के मामलों में सबसे बड़ी जिम्मेदारी राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों की है। नगर निगम, नगर पालिकाएं और पंचायतें यदि समय रहते नसबंदी, टीकाकरण और नियंत्रण के उपाय नहीं करतीं, तो इसके परिणामों की जिम्मेदारी उन्हें उठानी होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में बच्चों या बुजुर्गों की मौत या गंभीर चोट के मामलों में सीधे राज्य सरकार के खिलाफ मुआवजे का आदेश दिया जाएगा।

संतुलन की जरूरत: करुणा बनाम सुरक्षा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का रुख यह साफ करता नजर आया कि अदालत पशु-कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन चाहती है। कोर्ट ने यह नहीं कहा कि कुत्तों के साथ क्रूरता की जाए, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि आम नागरिकों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों की जान की कीमत पर किसी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद अब गेंद राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन के पाले में है। अदालत के संकेत साफ हैं—अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो न सिर्फ कानूनी कार्रवाई होगी, बल्कि भारी आर्थिक जिम्मेदारी भी तय की जाएगी। यह मामला आने वाले दिनों में आवारा कुत्तों की नीति, नसबंदी कार्यक्रमों और पशु-कल्याण बनाम सार्वजनिक सुरक्षा की बहस को नई दिशा दे सकता है।

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