SIR कराना चुनाव आयोग का अधिकार, मतदाता सूची पुनरीक्षण की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनकी बुनियाद एक विश्वसनीय और सटीक वोटर लिस्ट पर टिकी होती है।;

Update: 2026-05-27 06:08 GMT

नई दिल्‍ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बिहार की वोटर लिस्ट में कराए गए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को वैध ठहराया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची का व्यापक पुनरीक्षण कराने की संवैधानिक शक्ति है और बिहार में अपनाई गई प्रक्रिया कानून के दायरे में है। यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब कई याचिकाओं के जरिए चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इतनी बड़े स्तर पर वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण कराने का अधिकार आयोग को संविधान या जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत प्राप्त नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और आयोग की कार्रवाई को उचित ठहराया।

निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है शुद्ध वोटर लिस्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनकी बुनियाद एक विश्वसनीय और सटीक वोटर लिस्ट पर टिकी होती है। अदालत ने कहा कि वोटर सूची की शुद्धता लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है और चुनाव आयोग द्वारा किया गया SIR उसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए था। कोर्ट के अनुसार, यदि मतदाता सूची में त्रुटियां, दोहराव या गलत नाम बने रहते हैं तो इससे चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया संविधान के उस मूल उद्देश्य से जुड़ी है, जिसका लक्ष्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है।

चार दशक बाद बड़े स्तर पर हुआ पुनरीक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने के पर्याप्त कारण थे। अदालत ने कहा कि अंतिम व्यापक पुनरीक्षण के बाद चार दशक से अधिक समय बीत चुका था और इस दौरान बड़े पैमाने पर लोगों के नाम वोटर लिस्ट में जुड़े और हटे। कोर्ट ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बड़े पैमाने पर पलायन और जनसंख्या में बदलाव के कारण वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों और दोहराव की आशंका स्वाभाविक थी। ऐसे में आयोग द्वारा मतदाता सूची को अद्यतन और सटीक बनाने का प्रयास उचित था। अदालत ने माना कि आयोग की कार्रवाई का उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना था, न कि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन करना।

ADR समेत कई याचिकाओं को मिली थी सुनवाई

इस मामले में चर्चित गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) सहित कई पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। इन याचिकाओं में कहा गया था कि चुनाव आयोग SIR के जरिए नागरिकता की जांच जैसी प्रक्रिया अपना रहा है, जबकि यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। इससे पहले पिछले वर्ष 12 अगस्त से इस मामले में अंतिम बहस शुरू हुई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है।

65 लाख नाम हटने पर उठा था विवाद

बिहार में SIR प्रक्रिया के बाद चुनाव आयोग ने लगभग 65 लाख लोगों की सूची जारी की थी, जिनके नाम बाद में प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। इसी मुद्दे को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि बड़ी संख्या में लोगों को या तो मृत घोषित कर दिया गया, प्रवासी मान लिया गया या किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत बताया गया। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाना मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि चुनाव आयोग ने अदालत में कहा था कि पूरी प्रक्रिया नियमों और सत्यापन के आधार पर की गई थी और इसका मकसद केवल सूची को त्रुटिरहित बनाना था।

‘पुश्तैनी संबंध’ साबित करने का नियम भी चर्चा में

SIR की अधिसूचना के तहत उन मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए थे, जिनके नाम वर्ष 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं थे। ऐसे लोगों को उस समय की मतदाता सूची में मौजूद किसी व्यक्ति से अपना ‘पुश्तैनी संबंध’ साबित करना था। इस प्रावधान को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ था। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इससे गरीब, प्रवासी और दस्तावेजों की कमी वाले लोगों को परेशानी हो सकती है। वहीं चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते। आयोग का तर्क था कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सत्यापन जरूरी था।

समयसीमा और प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

ADR की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में दलील दी थी कि इतने बड़े स्तर की प्रक्रिया को कम समय में पूरा करना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि इससे वास्तविक मतदाताओं के नाम छूटने का खतरा पैदा हो सकता है। याचिकाकर्ताओं ने SIR को “NRC जैसी प्रक्रिया” बताते हुए आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता की जांच कर रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को पर्याप्त आधार नहीं माना।

चुनाव आयोग को मिला कानूनी समर्थन

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग को बड़ा कानूनी समर्थन मिला है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है और इसके लिए वह व्यापक पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाएं अपना सकता है।

इस फैसले को भविष्य में अन्य राज्यों में होने वाले वोटर लिस्ट पुनरीक्षण अभियानों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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