नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा को फेसबुक पोस्ट से जुड़े एक आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उनकी उस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने जांच अधिकारी के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले जनप्रतिनिधियों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सांसद है और राजनीति में सक्रिय है, तो केवल अंडे फेंके जाने की आशंका के आधार पर वर्चुअल पेशी की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या है मामला?
यह विवाद जून में सोशल मीडिया पर साझा किए गए दो वीडियो और उनसे जुड़ी कथित टिप्पणियों से संबंधित है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक नेता की शिकायत के आधार पर महुआ मोइत्रा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। मामले के दौरान यह भी आरोप सामने आया था कि कृष्णानगर में एक अदालत परिसर के बाहर कुछ भाजपा समर्थक इकट्ठा हुए थे और उन्होंने महुआ मोइत्रा के विरोध में प्रदर्शन किया था। इसी घटनाक्रम के आधार पर सांसद ने अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका पर अंतरिम राहत देते हुए उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया था। साथ ही अदालत ने उन्हें 14 अगस्त तक जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा था।
वर्चुअल पेशी की मांग पर अदालत का रुख
सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल को जांच अधिकारी के सामने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि पिछली बार पुलिस स्टेशन जाने के दौरान उनके मुवक्किल को विरोध का सामना करना पड़ा था और उन पर अंडे फेंके गए थे। उनका कहना था कि दोबारा शारीरिक रूप से उपस्थित होने पर सुरक्षा संबंधी खतरा हो सकता है। इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि केवल सांसद होने या विरोध की आशंका के आधार पर वर्चुअल पेशी की अनुमति कैसे दी जा सकती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत जांच में सहयोग करना आवश्यक है और हाई कोर्ट पहले ही इस संबंध में निर्देश दे चुका है।
हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने की सलाह
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश में स्पष्ट रूप से जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने का निर्देश दिया गया है। यदि याचिकाकर्ता उस आदेश का पालन नहीं करती हैं, तो उन्हें उसके कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच के दौरान कोई वास्तविक शिकायत या सुरक्षा संबंधी समस्या उत्पन्न होती है, तो उसके लिए कानून के अनुरूप उचित मंच उपलब्ध है।
याचिका वापस लेने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब महुआ मोइत्रा को कलकत्ता हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप निर्धारित तिथि पर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा, जब तक कि उन्हें किसी सक्षम अदालत से आगे कोई राहत न मिल जाए।