शादी से पहले सावधानी जरूरी, झूठे विवाह के वादे के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिस पर आरोप है कि उसने विवाह का झूठा वादा करके महिला के साथ संबंध बनाए। महिला का आरोप है कि वर्ष 2022 में एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से दोनों की मुलाकात हुई।

Update: 2026-02-17 05:59 GMT
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को शादी के झूठे वादे के आधार पर संबंध बनाने के एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि शादी से पहले लड़का और लड़की एक-दूसरे को पूरी तरह नहीं जानते, इसलिए ऐसे मामलों में सावधानी बरतना आवश्यक है। शादी से पहले किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि संबंध आपसी सहमति से बने हों, तो हर मामले को आपराधिक मुकदमे के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

क्या है मामला

मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिस पर आरोप है कि उसने विवाह का झूठा वादा करके महिला के साथ संबंध बनाए। महिला का आरोप है कि वर्ष 2022 में एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से दोनों की मुलाकात हुई। इसके बाद आरोपी ने कथित तौर पर शादी का भरोसा दिलाकर दिल्ली और बाद में दुबई में कई बार शारीरिक संबंध बनाए। जब विवाह नहीं हुआ तो महिला ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कराया। आरोपी की ओर से जमानत याचिका दायर की गई, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।

‘सावधानी बरतनी चाहिए’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि शादी से पहले लड़का और लड़की एक-दूसरे को पूरी तरह नहीं जानते। ऐसे में शारीरिक संबंध बनाने के निर्णय में सावधानी जरूरी है। उन्होंने कहा, “हम भले ही पुराने ख्यालों के हों, लेकिन शादी से पहले बहुत सावधान रहना चाहिए।” पीठ ने महिला से यह भी सवाल किया कि वह दुबई क्यों गई, जहां दोनों के बीच संबंध बने। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला आपसी सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है।

‘यदि सख्त थीं, तो शादी से पहले ऐसा नहीं करना चाहिए था’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि महिला अपने सिद्धांतों को लेकर सख्त थीं, तो उन्हें शादी से पहले ऐसे संबंध नहीं बनाने चाहिए थे। अदालत ने यह भी कहा कि रिश्तों में उतार-चढ़ाव हो सकते हैं, लेकिन हर असफल संबंध को आपराधिक मुकदमे में बदल देना उचित नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने हों, तो केवल बाद में विवाह न होने के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

मध्यस्थता का सुझाव

अदालत ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजने का सुझाव दिया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने आरोपी के वकील से कहा कि यदि संभव हो तो महिला को उचित मुआवजा देकर विवाद का समाधान किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं लगता जिसमें सहमति से बने संबंध के आधार पर कठोर आपराधिक सजा दी जानी चाहिए। हालांकि, अंतिम निर्णय तथ्यों और आगे की सुनवाई पर निर्भर करेगा।

कानूनी परिप्रेक्ष्य

भारतीय कानून में विवाह का झूठा वादा करके संबंध बनाने के मामलों को परिस्थितियों के आधार पर देखा जाता है। यदि यह साबित हो कि शुरू से ही आरोपी की नीयत धोखा देने की थी और उसने विवाह का वादा केवल संबंध बनाने के उद्देश्य से किया, तो यह दंडनीय अपराध हो सकता है। हालांकि, यदि संबंध परस्पर सहमति से बने हों और बाद में किसी कारणवश विवाह न हो पाए, तो अदालतें हर मामले में इसे आपराधिक धोखाधड़ी नहीं मानतीं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि सहमति और धोखे के बीच अंतर को सावधानी से परखा जाना चाहिए।

समाज और कानून के बीच संतुलन

अदालत की टिप्पणी ने एक बार फिर इस संवेदनशील विषय पर बहस को जन्म दिया है। एक ओर महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर सहमति से बने वयस्क संबंधों को लेकर कानून के दुरुपयोग की आशंकाओं को भी ध्यान में रखना होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों और अदालतों को तथ्यों की गहराई से जांच करनी चाहिए ताकि किसी निर्दोष को अनावश्यक रूप से मुकदमे का सामना न करना पड़े, और वास्तविक पीड़ित को न्याय मिल सके।

अंतिम आदेश सुरक्षित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अंतिम आदेश सुरक्षित नहीं रखा है, बल्कि मध्यस्थता की संभावना पर जोर दिया है। जमानत याचिका पर आगे की सुनवाई में अदालत उपलब्ध तथ्यों और पक्षों की दलीलों के आधार पर निर्णय लेगी।

महत्वपूर्ण दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी विवाह के झूठे वादे और सहमति से बने संबंधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण पेश करती है। अदालत ने सावधानी, परिपक्वता और कानूनी संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया है। अब यह देखना होगा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया से क्या समाधान निकलता है और जमानत याचिका पर अदालत अंतिम रूप से क्या फैसला देती है।

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