PRAHAAR: गृह मंत्रालय ने पहली बार जारी की राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी नीति, देश के लिए खतरों का जिक्र

नीति में पारंपरिक आतंकवाद के साथ-साथ साइबर हमलों, ड्रोन हमलों, सीमापार आतंकवाद, संगठित अपराध-आतंक गठजोड़ और रासायनिक-जीवाणु जैसे जटिल सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय ढांचे की रूपरेखा दी गई है। सरकार ने इसे देश की सुरक्षा संरचना को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

Update: 2026-02-24 08:08 GMT
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सोमवार को देश की पहली व्यापक आतंकवाद-रोधी राष्ट्रीय नीति ‘प्रहार’ जारी की। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी इस दस्तावेज में आतंकवाद के प्रति ‘कतई बर्दाश्त नहीं’ की नीति को आधार बनाते हुए एक बहुस्तरीय और खुफिया जानकारी आधारित रणनीति का खाका प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य आतंकवादी संगठनों, उनके वित्तपोषकों, समर्थकों और लॉजिस्टिक नेटवर्क को धन, हथियार, तकनीकी संसाधन और सुरक्षित ठिकानों तक पहुंच से वंचित करना है।

नीति में पारंपरिक आतंकवाद के साथ-साथ साइबर हमलों, ड्रोन हमलों, सीमापार आतंकवाद, संगठित अपराध-आतंक गठजोड़ और रासायनिक-जीवाणु जैसे जटिल सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय ढांचे की रूपरेखा दी गई है। सरकार ने इसे देश की सुरक्षा संरचना को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

सात स्तंभों पर आधारित ‘प्रहार’ की रूपरेखा

‘प्रहार’ नीति सात प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जिनके माध्यम से आतंकवाद के विरुद्ध समग्र रणनीति अपनाने का लक्ष्य रखा गया है। ये स्तंभ हैं:

-रोकथाम (Prevention) – खुफिया सूचनाओं के आधार पर आतंकी गतिविधियों को पहले ही विफल करना।

- प्रतिक्रिया (Response) – हमले की स्थिति में त्वरित और समन्वित कार्रवाई।

- आंतरिक क्षमताओं का एकीकरण (Integration of Capabilities) – केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच तालमेल मजबूत करना।

- मानवाधिकार व कानून के शासन पर आधारित प्रक्रियाएं (Human Rights & Rule of Law) – आतंकवाद-रोधी कार्रवाई को संवैधानिक दायरे में रखना।

- कट्टरता को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियों का निवारण – उग्रवाद और कट्टरता की जड़ों पर प्रहार।

- अंतरराष्ट्रीय सहयोग का संरेखण – वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ प्रयासों में सक्रिय भागीदारी।

- समग्र समाज का दृष्टिकोण: रिकवरी और रेजिलिएंस – प्रभावित समुदायों को पुनर्स्थापित कर सामाजिक मजबूती बढ़ाना।

सरकार का कहना है कि इन सात स्तंभों के माध्यम से आतंकवाद के विरुद्ध एक सक्रिय, समन्वित और दीर्घकालिक रणनीति लागू की जाएगी।

‘पड़ोस में अस्थिरता’ और सीमापार आतंकवाद का संदर्भ

नीति दस्तावेज में किसी देश का नाम लिए बिना कहा गया है कि भारत के पड़ोस में अस्थिरता का इतिहास रहा है, जिसके कारण अराजक क्षेत्र विकसित हुए हैं। कुछ देशों द्वारा आतंकवाद को राज्य नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की भी अप्रत्यक्ष टिप्पणी की गई है। दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि भारत आतंकवाद को किसी विशेष धर्म, जातीयता, राष्ट्रीयता या सभ्यता से नहीं जोड़ता। भारत ने हमेशा आतंकवाद और किसी भी घोषित या अघोषित उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके उपयोग की स्पष्ट और निर्विवाद निंदा की है। यही सिद्धांत देश की ‘शून्य सहिष्णुता’ नीति का आधार है।

नीति में कहा गया है कि भारत लंबे समय से सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद का सामना करता रहा है। जेहादी संगठनों और उनके सहयोगी नेटवर्क द्वारा भारत में हमलों की योजना बनाने, समन्वय करने और उन्हें अंजाम देने के प्रयासों का उल्लेख किया गया है। अलकायदा और इस्लामिक स्टेट (आइसिस) जैसे वैश्विक आतंकी समूहों द्वारा स्लीपर सेल्स के माध्यम से हिंसा भड़काने की कोशिशों को भी रेखांकित किया गया है।

ड्रोन, साइबर और डार्क वेब: नई चुनौतियां

‘प्रहार’ नीति में आधुनिक तकनीक के बढ़ते दुरुपयोग पर विशेष चिंता व्यक्त की गई है। दस्तावेज के अनुसार, विदेशी धरती से संचालित आतंकी नेटवर्क पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ड्रोन के जरिये हथियार और नशीले पदार्थ पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। नीति में कहा गया है कि आतंकी संगठन प्रचार, भर्ती, संचार और वित्तपोषण के लिए इंटरनेट मीडिया मंचों और इंस्टेंट मैसेजिंग एप्लिकेशन का उपयोग कर रहे हैं। कूट संदेश (एन्क्रिप्शन), डार्क वेब और क्रिप्टो वॉलेट जैसी तकनीकों ने उनके लिए छिपकर काम करना आसान बना दिया है।

रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, परमाणु, विस्फोटक और डिजिटल (सीबीआरएनईडी) सामग्री तक पहुंच और उसके संभावित उपयोग को रोकना आतंकवाद-रोधी एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बताया गया है। साथ ही, ड्रोन और रोबोट तकनीक के दुरुपयोग तथा साइबर हमलों को भी गंभीर खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है।

खुफिया तंत्र और समन्वय को प्राथमिकता

नीति में आतंकवादी घटनाओं को रोकने के लिए खुफिया जानकारी जुटाने और उसका वास्तविक समय पर प्रसार सुनिश्चित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। खुफिया ब्यूरो (आईबी) के तहत संचालित बहु-एजेंसी केंद्र (एमएसी) और संयुक्त खुफिया कार्य बल (जेटीएफआई) को आतंकवाद-रोधी सूचना साझाकरण का केंद्रीय मंच बताया गया है। दस्तावेज में कहा गया है कि केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस बलों के बीच मजबूत साझेदारी स्थापित की गई है, जिससे सूचनाओं का त्वरित आदान-प्रदान और संभावित हमलों को विफल करना संभव हो सके।

ओवरग्राउंड वर्कर्स और फंडिंग नेटवर्क पर शिकंजा

‘प्रहार’ में ओवरग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) मॉड्यूल पर नियमित कार्रवाई का उल्लेख किया गया है। ये मॉड्यूल आतंकवादियों को लॉजिस्टिक, सामग्री और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं। हाल के समय में गैरकानूनी हथियार सिंडिकेट और आतंकी समूहों के बीच साठगांठ के संकेत भी मिले हैं। सरकार ने भारतीय कानूनों के तहत आतंकी फंडिंग नेटवर्क को निष्क्रिय करने पर विशेष जोर दिया है। अवैध धन के स्रोतों की पहचान, बैंकिंग चैनलों की निगरानी और संदिग्ध लेनदेन पर त्वरित कार्रवाई को नीति का अहम हिस्सा बनाया गया है।

कट्टरता के खिलाफ सामाजिक पहल

नीति केवल सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि कट्टरता को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियों को दूर करने पर भी जोर देती है। सरकार प्रभावित समुदायों को जागरूक करने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों, वकीलों, गैरसरकारी संगठनों तथा धार्मिक व सामुदायिक नेताओं की टीम गठित करेगी। इस पहल का उद्देश्य उन व्यक्तियों और समुदायों को पुनर्वासित करना है, जो कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रभाव में आ गए हैं या जिनके प्रभावित होने की आशंका है।

‘सक्रिय और खुफिया आधारित’ दृष्टिकोण

नीति दस्तावेज में भारत के आतंकवाद-रोधी दृष्टिकोण को ‘सक्रिय’ और ‘खुफिया जानकारी पर आधारित’ बताया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि देश को वायु, भूमि और जल तीनों क्षेत्रों में खतरों का सामना करना पड़ता है, इसलिए सुरक्षा तंत्र को बहुआयामी बनाना आवश्यक है। सरकार का दावा है कि ‘प्रहार’ के माध्यम से आतंकवाद के विरुद्ध एक समन्वित, तकनीकी रूप से सशक्त और कानूनी रूप से सुदृढ़ ढांचा तैयार किया गया है, जो वर्तमान और उभरती चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होगा।

व्यापक और दीर्घकालिक रणनीति

देश की पहली आतंकवाद-रोधी नीति ‘प्रहार’ को सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर बताया है। इसमें जहां एक ओर कड़े सुरक्षा उपायों और तकनीकी निगरानी पर बल दिया गया है, वहीं दूसरी ओर मानवाधिकार, कानून के शासन और सामाजिक पुनर्वास के पहलुओं को भी शामिल किया गया है। आतंकवाद के बदलते स्वरूप चाहे वह ड्रोन के जरिये हो, साइबर हमलों के रूप में या वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई यह नीति आने वाले समय में भारत की सुरक्षा रणनीति की दिशा तय करेगी।
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