एनएसए अजीत डोभाल का बड़ा खुलासा, फोन और इंटरनेट का नहीं करते इस्तेमाल
‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के दौरान एक सवाल के जवाब में एनएसए डोभाल ने मुस्कराते हुए कहा, “मुझे नहीं पता कि आपको कैसे पता चला कि मैं फोन का इस्तेमाल नहीं करता।”
नई दिल्ली। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने सार्वजनिक मंच से पहली बार अपने संचार के तरीकों को लेकर एक अहम खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि वह आमतौर पर फोन और इंटरनेट का उपयोग नहीं करते और इसके बजाय ऐसे वैकल्पिक संचार माध्यमों पर निर्भर रहते हैं, जिनकी जानकारी आम लोगों को नहीं होती। यह बात डोभाल ने ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ कार्यक्रम के दौरान युवाओं से संवाद करते हुए कही।
युवाओं के सवाल पर डोभाल का जवाब
‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के दौरान एक सवाल के जवाब में एनएसए डोभाल ने मुस्कराते हुए कहा, “मुझे नहीं पता कि आपको कैसे पता चला कि मैं फोन का इस्तेमाल नहीं करता।” इसके बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बात सही है कि वह इंटरनेट का उपयोग नहीं करते। फोन का इस्तेमाल भी बेहद सीमित है। डोभाल ने कहा कि फोन का उपयोग वह केवल पारिवारिक या बेहद निजी बातों के लिए करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद की जरूरत पड़ती है, इसलिए कभी-कभार फोन का सहारा लेना ही पड़ता है। उन्होंने कहा, “थोड़ा बहुत तो करना पड़ता ही है। मुझे बाहर के देशों से भी बात करनी होती है, तो वह तो होता ही है। काम चल जाता है।”
गुप्त संचार माध्यमों का संकेत
एनएसए ने अपने बयान में यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कार्यों के लिए पारंपरिक साधनों के अलावा अन्य सुरक्षित और गुप्त संचार माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा, “और भी कई साधन होते हैं, संचार के। वही साधन नहीं हैं जो लोगों को पता हैं। कई ऐसे साधन भी जुटाने पड़ते हैं, जो लोगों को न मालूम हों।” डोभाल के इस बयान को देश की सुरक्षा रणनीति और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली से जोड़कर देखा जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, शीर्ष स्तर पर संवेदनशील सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए अत्यंत सुरक्षित और सीमित संचार माध्यमों का उपयोग किया जाना सामान्य प्रक्रिया है।
विकसित भारत यंग लीडर्स डायलाग में मुख्य अतिथि
एनएसए अजीत डोभाल ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलाग’ के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम में देशभर से करीब तीन हजार युवा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को राष्ट्र निर्माण, नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम विषयों से जोड़ना था। डोभाल ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथ में है और उन्हें देश की सुरक्षा, एकता और विकास के प्रति सजग रहना होगा। उन्होंने युवाओं से जिम्मेदार नागरिक बनने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की अपील भी की।
सूफी विद्वानों ने की एनएसए से मुलाकात
इसी दिन एनएसए अजीत डोभाल से सूफी विद्वानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी मुलाकात की। आइएएनएस के अनुसार, यह मुलाकात भाईचारे और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई। सूफी विद्वानों ने डोभाल के साथ अपनी योजनाएं साझा कीं और कट्टरपंथ के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लिया।
‘मेरा मुल्क मेरी पहचान’ मिशन की सराहना
ऑल इंडिया सूफी सज्जादानाशिन काउंसिल (एआईएसएससी) के अध्यक्ष हजरत सैयद नासिरुद्दीन चिश्ती ने बताया कि एनएसए डोभाल ने उनके ‘मेरा मुल्क मेरी पहचान’ मिशन की सराहना की। चिश्ती के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य देश में विभिन्न धर्मों और विश्वासों के बावजूद साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान का संदेश फैलाना है। चिश्ती ने कहा, “हमारा देश वैश्विक पहचान का केंद्र है। जब हम दुनिया में कहीं भी जाते हैं, तो हमें हिंदू या मुस्लिम नहीं, बल्कि भारतीय कहा जाता है।” उन्होंने कहा कि सूफी विचारधारा प्रेम, करुणा और भाईचारे पर आधारित है और यही सोच कट्टरपंथ के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार है।
सूफी संस्कृति से कट्टरपंथ का मुकाबला
सूफी विद्वानों ने एनएसए के समक्ष यह भी स्पष्ट किया कि उनका मिशन सूफी विचारों को लोकप्रिय बनाकर समाज में सौहार्द बढ़ाना और कट्टरपंथी ताकतों का शांतिपूर्ण तरीके से मुकाबला करना है। हजरत नासिरुद्दीन चिश्ती ने कहा, “ख्वाजा गरीब नवाज का शाश्वत संदेश करुणा का है, सभी के लिए प्रेम और किसी के लिए नफरत नहीं।” उन्होंने बताया कि इसी संदेश को आगे बढ़ाकर युवाओं और समाज के हर वर्ग को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक एकता पर फोकस
एनएसए अजीत डोभाल के बयान और सूफी विद्वानों से उनकी मुलाकात को राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक एकता के दो महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर जहां डोभाल ने देश की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े संवेदनशील पहलुओं की झलक दी, वहीं दूसरी ओर सूफी विद्वानों के साथ संवाद के जरिए सांस्कृतिक एकता और भाईचारे का संदेश भी सामने आया।