जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर ने धर्मनिरपेक्षता, भाषा और पहचान पर खुलकर कही बात

“प्वाइंट्स ऑफ व्यू” सत्र में जावेद अख्तर ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता किसी किताब या कोर्स से नहीं आती, बल्कि यह समाज में रहकर, विविधताओं के बीच जीने से पैदा होती है। उन्होंने कहा, “धर्मनिरपेक्षता आपके आसपास के माहौल में मिलती है। इसे सिखाने की कोशिश करना ही गलत है।”

Update: 2026-01-16 06:14 GMT
जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) के पहले दिन गीतकार, पटकथा लेखक और चिंतक जावेद अख्तर ने धर्मनिरपेक्षता, भाषा और सांस्कृतिक पहचान को लेकर बेबाक और विचारोत्तेजक टिप्पणियां कीं। “प्वाइंट्स ऑफ व्यू” सत्र में लेखिका वरीशा फरासत के साथ संवाद के दौरान जावेद अख्तर ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे किसी “क्रैश कोर्स” के जरिए सिखाया जा सके। यह जीवन के अनुभव और आसपास के माहौल से स्वतः विकसित होती है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर कोई धर्मनिरपेक्षता सिखाने का दावा करता है, तो वह नकली होगा। 

पांच दिवसीय जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की गुरुवार से शुरुआत हुई, जिसमें देश-विदेश से आए करीब 500 वक्ता 266 सत्रों में भाग ले रहे हैं। उद्घाटन दिवस पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और दिया कुमारी तथा कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट भी मौजूद रहे। साहित्य, राजनीति, समाज और कला से जुड़े मुद्दों पर पहले दिन ही गहन चर्चाएं देखने को मिलीं।

धर्मनिरपेक्षता कोई पाठ्यक्रम नहीं: जावेद अख्तर
“प्वाइंट्स ऑफ व्यू” सत्र में जावेद अख्तर ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता किसी किताब या कोर्स से नहीं आती, बल्कि यह समाज में रहकर, विविधताओं के बीच जीने से पैदा होती है। उन्होंने कहा, “धर्मनिरपेक्षता आपके आसपास के माहौल में मिलती है। इसे सिखाने की कोशिश करना ही गलत है।” भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने संस्कृत, तमिल और उर्दू को लेकर चलने वाली बहसों पर भी टिप्पणी की। जावेद अख्तर ने कहा कि “संस्कृत पहले आई या उर्दू” जैसा सवाल ही गलत है। संस्कृत हजारों साल पुरानी भाषा है, जबकि उर्दू तुलनात्मक रूप से नई है। उन्होंने तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषाओं में से एक बताते हुए कहा कि उर्दू उस “रेस” में है ही नहीं।

उर्दू, पाकिस्तान और पहचान का सवाल
एक अन्य सत्र “इंडिया इन उर्दू: उर्दू इन इंडिया” में जावेद अख्तर ने उर्दू भाषा और उसके राजनीतिक इतिहास पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि उर्दू भाषा के नाम पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ और इसी प्रक्रिया में भारत का विभाजन भी हुआ। उनका कहना था कि भारत में जो लोग उर्दू को ही अपनी एकमात्र पहचान मानते हैं, वे अनजाने में तनाव को बनाए रखते हैं। जावेद अख्तर ने जोर देकर कहा कि भाषा कभी धर्म की नहीं होती। “भाषा किसी धर्म या समाज की नहीं, बल्कि किसी क्षेत्र की होती है,”। उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक पुराने फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने कभी उर्दू शब्दों के इस्तेमाल को कम करने की बात कही थी, लेकिन उनके अनुसार इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

बांग्लादेश का उदाहरण और मातृभाषा का महत्व
बांग्लादेश के इतिहास का हवाला देते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि वहां के लोगों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए संघर्ष किया। मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद उन्होंने उर्दू को अपनाना जरूरी नहीं समझा। इससे यह स्पष्ट होता है कि भाषा आस्था से नहीं, बल्कि पहचान से जुड़ी होती है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी और उर्दू का व्याकरण मूल रूप से एक ही है और दोनों भाषाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। जावेद अख्तर ने अंग्रेजी भाषा के महत्व को भी रेखांकित करते हुए कहा कि आज के वैश्विक दौर में अंग्रेजी आना जरूरी है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोगों को अपने बच्चों को धर्म सिखाने के बजाय अपनी मातृभाषा सिखानी चाहिए।

जीनत अमान की आत्मकथा की इच्छा
फेस्टिवल के एक अन्य सत्र में दिग्गज अभिनेत्री जीनत अमान भी शामिल हुईं। पत्रकार संजय राय के एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वह अपनी आत्मकथा लिखना चाहेंगी। उन्होंने संकेत दिया कि उनके जीवन और करियर में कई ऐसे अनुभव रहे हैं, जिन्हें वह शब्दों में ढालना चाहती हैं। उनके इस बयान पर दर्शकों की खास प्रतिक्रिया देखने को मिली।

संगीत और साहित्य से सजी शुरुआत
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत गुरुवार सुबह शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति के साथ हुई। ऐश्वर्या विधा रघुनाथन ने अपनी प्रस्तुति से माहौल को संगीतमय बना दिया। इसके अलावा, एक सत्र में लेखिका बानू मुश्ताक ने अपनी साहित्यिक यात्रा और लेखन के अनुभवों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि किस तरह सामाजिक यथार्थ और व्यक्तिगत अनुभव उनके लेखन को आकार देते हैं।

विचारों का संगम बना जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल
पहले दिन के सत्रों ने ही यह स्पष्ट कर दिया कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भाषा, संस्कृति, राजनीति और समाज से जुड़े जटिल सवालों पर संवाद का एक बड़ा मंच है। जावेद अख्तर जैसे वक्ताओं की स्पष्ट और निर्भीक टिप्पणियों ने फेस्टिवल की शुरुआत को खास बना दिया है। आने वाले दिनों में भी जेएलएफ में ऐसे ही सत्रों की उम्मीद है, जहां विभिन्न विचारधाराओं और दृष्टिकोणों के बीच संवाद देखने को मिलेगा।

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