नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच हाल के महीनों में चली आ रही ट्रेड डील को लेकर असमंजस की स्थिति अब काफी हद तक साफ होती दिख रही है। इसी बदले हुए परिदृश्य में शुक्रवार को भारत ने अमेरिका की अगुआई वाले रणनीतिक गठबंधन ‘पैक्स सिलिका’ में औपचारिक रूप से शामिल होने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। यह कदम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और दुर्लभ खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की सुरक्षित, मजबूत और विश्वसनीय वैश्विक सप्लाई चेन बनाने की दिशा में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी केवल तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्व भी है, खासकर उस समय जब दुनिया दुर्लभ खनिजों और उन्नत तकनीकी आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर चीन पर निर्भर है।
एआई इंपैक्ट समिट-2026 में हस्ताक्षर
नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित एआई इंपैक्ट समिट-2026 के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। भारत की ओर से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। समारोह में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर और आर्थिक मामलों के अमेरिकी अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जैकब हेलबर्ग भी उपस्थित थे। जैकब हेलबर्ग ने इस अवसर को 21वीं सदी की आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था को परिभाषित करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि पैक्स सिलिका इस विश्वास की घोषणा है कि भविष्य उन्हीं देशों का होगा जो निर्माण क्षमता विकसित करते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर सहयोग को आगे बढ़ाते हैं।
चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश
वर्तमान में दुर्लभ खनिजों के खनन, शोधन और आपूर्ति के क्षेत्र में दुनिया का बड़ा हिस्सा चीन पर निर्भर है। ये खनिज सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों और एआई हार्डवेयर के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। पैक्स सिलिका का गठन दिसंबर 2025 में वाशिंगटन में किया गया था। इसका उद्देश्य वैकल्पिक और विश्वसनीय सप्लाई चेन तैयार करना है ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से उत्पन्न जोखिमों को कम किया जा सके। हालांकि घोषणा-पत्र में चीन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया है, लेकिन इसे वैश्विक आपूर्ति ढांचे में विविधता लाने की रणनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। इस गठबंधन में पहले से ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, इज़रायल, जापान, कतर, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन जैसे देश शामिल हैं। भारत के शामिल होने से यह समूह और अधिक प्रभावशाली हो गया है।
भारत-अमेरिका संबंधों में नई गति
भारत का पैक्स सिलिका में शामिल होना दोनों देशों के संबंधों में नई ऊर्जा का संकेत देता है। हाल के समय में व्यापार और टैरिफ से जुड़े मुद्दों को लेकर कुछ तनाव की स्थिति बनी थी। ऐसे में यह कदम संकेत देता है कि दोनों देश दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, यह साझेदारी प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने और तकनीकी, रक्षा तथा ऊर्जा सहयोग को विस्तार देने के व्यापक प्रयासों से भी जुड़ी हो सकती है।
सेमीकंडक्टर उद्योग को बड़ा लाभ
समझौते के बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “भारत पैक्स सिलिका का हिस्सा बन गया है। इससे भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को बहुत फायदा होगा।” उन्होंने बताया कि भारत में पहले से ही दस सेमीकंडक्टर प्लांट स्थापित हो चुके हैं और कई अन्य स्थापना की प्रक्रिया में हैं। जल्द ही देश का पहला सेमीकंडक्टर प्लांट वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करेगा। वैष्णव के मुताबिक, एक पूरा ईकोसिस्टम उभर रहा है और पैक्स सिलिका इस विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि इससे भारतीय युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार और तकनीकी अवसर मिलेंगे।
पैक्स सिलिका का दायरा कितना व्यापक?
पैक्स सिलिका केवल खनिज या सेमीकंडक्टर तक सीमित नहीं है। इसके घोषणा-पत्र में कई रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया गया है, जिनमें शामिल हैं: सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन और प्लेटफॉर्म, फ्रंटियर फाउंडेशन मॉडल्स (उन्नत एआई मॉडल), सूचना कनेक्टिविटी और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर, कंप्यूटिंग क्षमताएं, सेमीकंडक्टर निर्माण, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, परिवहन और लॉजिस्टिक्स, मिनरल रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग, ऊर्जा क्षेत्र। घोषणा-पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सहयोग इन क्षेत्रों से आगे भी बढ़ाया जा सकता है। निवेश सुरक्षा, बुनियादी ढांचा विकास और प्रोत्साहन नीतियों में तालमेल के जरिए आर्थिक साझेदारी को गहरा करने का साझा दृष्टिकोण व्यक्त किया गया है।
भारत की रणनीतिक भूमिका
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि अमेरिका विश्वसनीय एआई तकनीक को भारत जैसे साझेदार देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है। उनके अनुसार, भारत इस अभियान में एक अलग तरह की ताकत है। उन्होंने कहा, “शांति इस उम्मीद से नहीं आती कि विरोधी निष्पक्ष रहेगा। शांति ताकत से आती है और भारत इसे समझता है। भारत मजबूत सीमाओं और संप्रभुता के महत्व को समझता है। पैक्स सिलिका इस संप्रभुता को बढ़ावा देती है, क्योंकि जब हम जुड़ते हैं तो हमारी सामूहिक ताकत बढ़ती है।” गोर के इस बयान को रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन और तकनीकी सहयोग के महत्व को रेखांकित करता है।
सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स में विविधता
भारत के शामिल होने से गठबंधन को दो प्रमुख क्षेत्रों में मजबूती मिलने की उम्मीद है-सेमीकंडक्टर निर्माण और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में विविधता। भारत पहले ही सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाएं लागू कर चुका है। यदि पैक्स सिलिका के तहत तकनीकी सहयोग, निवेश और ज्ञान-साझाकरण बढ़ता है, तो भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है। इससे देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा क्षेत्र और उभरते एआई स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी।
भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव
पैक्स सिलिका में भारत की एंट्री को केवल आर्थिक कदम के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। एआई, सेमीकंडक्टर और खनिज आपूर्ति भविष्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जा रहे हैं। ऐसे में विश्वसनीय और लोकतांत्रिक देशों के बीच तकनीकी गठजोड़ वैश्विक व्यापार और सुरक्षा ढांचे को प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह वैश्विक तकनीकी मानकों और सप्लाई चेन संरचना को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाए।
मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया को नई दिशा
अब ध्यान इस बात पर रहेगा कि पैक्स सिलिका के तहत सहयोग को व्यावहारिक रूप में कैसे लागू किया जाता है। निवेश प्रवाह, संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएं, खनिज संसाधनों की साझी रणनीति और सेमीकंडक्टर निर्माण में तकनीकी हस्तांतरण जैसे मुद्दे अहम होंगे। भारत के लिए यह पहल “मेक इन इंडिया” और “डिजिटल इंडिया” अभियानों को नई दिशा दे सकती है। वहीं अमेरिका के लिए यह विश्वसनीय साझेदारों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक तकनीकी इकोसिस्टम खड़ा करने का अवसर है। कुल मिलाकर, पैक्स सिलिका में भारत की औपचारिक एंट्री वैश्विक तकनीकी और आर्थिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है, जहां सहयोग, विविधता और रणनीतिक संतुलन भविष्य की दिशा तय करेंगे।