डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित, सुप्रीम कोर्ट को गृह मंत्रालय की जानकारी, जानें सबकुछ

डिजिटल अरेस्ट एक गंभीर साइबर अपराध है, जिसमें ठग खुद को नकली पुलिस अधिकारी, सरकारी एजेंसियों के अफसर, वकील या यहां तक कि जज बताकर लोगों को ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए डराते हैं।

Update: 2026-01-16 05:38 GMT
नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट जैसे तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों पर लगाम लगाने की दिशा में केंद्र सरकार ने अहम कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि डिजिटल अरेस्ट मामलों की व्यापक जांच और उनसे निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालय समिति का गठन किया गया है। यह समिति न केवल ऐसे मामलों की प्रकृति और पैटर्न का अध्ययन करेगी, बल्कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने आ रही व्यावहारिक चुनौतियों और मौजूदा कानूनी ढांचे की खामियों की भी पहचान करेगी।

डिजिटल अरेस्ट एक गंभीर साइबर अपराध है, जिसमें ठग खुद को नकली पुलिस अधिकारी, सरकारी एजेंसियों के अफसर, वकील या यहां तक कि जज बताकर लोगों को ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए डराते हैं। पीड़ितों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे किसी गंभीर अपराध में फंस चुके हैं और तत्काल कार्रवाई नहीं करने पर उनकी गिरफ्तारी हो सकती है। डर और मानसिक दबाव में आकर लोग लाखों-करोड़ों रुपये ठगों के खातों में ट्रांसफर कर देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद तेज हुई कार्रवाई
डिजिटल अरेस्ट मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष दिसंबर में सख्त रुख अपनाया था। हरियाणा के एक बुजुर्ग दंपति की शिकायत पर स्वत: संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को ऐसे मामलों की एकीकृत और राष्ट्रव्यापी जांच करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि साइबर अपराधों की प्रकृति सीमा-पार होती जा रही है, ऐसे में बिखरी हुई जांच के बजाय एक समन्वित राष्ट्रीय दृष्टिकोण जरूरी है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय सहित विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों से डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों से निपटने के लिए उनके सुझाव और विचार भी मांगे थे। गुरुवार को गृह मंत्रालय ने अदालत को बताया कि इन निर्देशों के अनुपालन में उच्च स्तरीय समिति का गठन कर दिया गया है।

विशेष सचिव की अध्यक्षता में बनी अंतर-मंत्रालय समिति
गृह मंत्रालय के अनुसार, इस समिति की अध्यक्षता विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) करेंगे। समिति का मुख्य उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट और इससे जुड़े फर्जी गिरफ्तारी मामलों की समग्र समीक्षा करना है। इसमें यह भी देखा जाएगा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को जांच के दौरान किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समिति को अमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) द्वारा दी गई सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर विचार करने, मौजूदा कानूनों, नियमों और सर्कुलरों की समीक्षा करने तथा उनके कार्यान्वयन में मौजूद कमियों की पहचान करने का दायित्व सौंपा गया है। इसके आधार पर समिति सुधारात्मक उपाय सुझाएगी, ताकि भविष्य में इस तरह के अपराधों को रोका जा सके और पीड़ितों को समय पर राहत मिल सके।

कई मंत्रालय और एजेंसियां शामिल
इस उच्च स्तरीय समिति में केंद्र सरकार के कई अहम मंत्रालयों और एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल किए गए हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्तीय सेवाओं का विभाग, कानून और न्याय मंत्रालय, उपभोक्ता मामले मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के प्रतिनिधि शामिल हैं। इसके अलावा जांच एजेंसियों और पुलिस तंत्र से जुड़े संस्थानों जैसे सीबीआइ, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए), दिल्ली पुलिस और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (आइ4सी) के अधिकारी भी समिति का हिस्सा हैं। आइ4सी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को समिति का सदस्य-सचिव बनाया गया है। समिति हर दो सप्ताह में बैठक कर प्रगति की समीक्षा करेगी।

29 दिसंबर को हुई थी पहली बैठक
गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि समिति की पहली बैठक 29 दिसंबर को आयोजित की गई थी। इस बैठक में विभिन्न एजेंसियों ने डिजिटल अरेस्ट मामलों से जुड़े अहम सुझाव रखे। सीबीआइ ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों की जांच के लिए एक निश्चित मौद्रिक सीमा तय की जा सकती है, ताकि बड़े और संगठित अपराधों पर विशेष फोकस किया जा सके। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया और प्रवर्तन तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। मंत्रालय का मानना है कि तकनीक की तेज रफ्तार के साथ कानून और उसके क्रियान्वयन में भी समान रूप से मजबूती जरूरी है।

सिम कार्ड और बैंकिंग प्रक्रियाओं पर भी नजर
दूरसंचार विभाग ने समिति को अवगत कराया कि नए दूरसंचार अधिनियम के तहत मसौदा नियमों के अधिसूचित होने के बाद सिम कार्ड जारी करने में लापरवाही, एक व्यक्ति को कई सिम जारी किए जाने और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे मुद्दों से सख्ती से निपटा जाएगा। माना जा रहा है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों में फर्जी या गलत तरीके से जारी सिम कार्ड की अहम भूमिका होती है। आइ4सी ने बताया कि पीड़ितों के धन को तुरंत फ्रीज करने, बाद में सत्यापन के बाद डी-फ्रीजिंग और राशि की वसूली के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) तैयार करने पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन के पुनर्गठन पर भी चर्चा हुई है, ताकि शिकायतों का तेजी से निपटारा हो सके।

पीड़ितों को मुआवजे पर सहमति
समिति ने अमिकस क्यूरी के सुझावों पर विचार करते हुए पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने के मुद्दे पर भी चर्चा की। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि यदि नुकसान लापरवाही, सेवा में कमी या बैंकों अथवा दूरसंचार सेवा प्रदाताओं की ओर से धोखाधड़ी के कारण हुआ हो, तो पीड़ितों को उचित राहत दी जा सकती है।

20 जनवरी को हो सकती है अगली सुनवाई
गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि समिति की कार्यवाही लगातार जारी रहेगी और उसके निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 20 जनवरी को संभावित है, जहां समिति की प्रगति और आगे की रणनीति पर चर्चा हो सकती है। डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों की बढ़ती घटनाओं के बीच इस उच्च स्तरीय समिति का गठन एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे न केवल जांच प्रक्रिया मजबूत होगी, बल्कि आम लोगों को साइबर ठगी से बचाने के लिए ठोस नीतिगत उपाय भी सामने आ सकेंगे।

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