नई दिल्ली : लोकसभा की कार्यवाही में इन दिनों सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ही नहीं, बल्कि युवाओं की डिजिटल भाषा भी सुनाई दे रही है। इंस्टाग्राम, मीम्स और सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने वाले Gen Z स्लैंग अब संसद की बहस का हिस्सा बन चुके हैं। हालिया मानसून सत्र में कई सांसदों ने अपने भाषणों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जो अब तक मुख्य रूप से इंटरनेट संस्कृति का हिस्सा माने जाते थे। ‘FOMO’, ‘MIA’, ‘Delulu’, ‘Clocked It’, ‘वास्तेगुना-हुइंया’ और ‘कुच्चु-पुच्चु’ जैसे शब्दों ने यह संकेत दिया है कि राजनीतिक संवाद का तरीका बदल रहा है और नेता अब युवाओं की भाषा में उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
किस सांसद ने कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया?
मानसून सत्र के दौरान एंटी-पेपर लीक विधेयक पर चर्चा में विभिन्न दलों के सांसदों ने अलग-अलग स्लैंग का प्रयोग किया। शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने अपने भाषण में MIA (Missing in Action) और FOMO (Fear of Missing Out) जैसे शब्दों का उपयोग किया। MIA का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो लंबे समय से सार्वजनिक रूप से दिखाई न दे, जबकि FOMO का मतलब किसी अवसर या घटना से पीछे छूट जाने का डर होता है। वहीं भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए Delulu शब्द का इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया पर यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है जिन्हें वास्तविकता से दूर या कल्पनाओं की दुनिया में जीने वाला माना जाता है।
‘Clocked It’ और इंटरनेट एक्सप्रेशन भी पहुंचे सदन तक
भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने अपने भाषण में Clocked It कहा। इंटरनेट की भाषा में इसका अर्थ होता है कि किसी व्यक्ति ने किसी छिपी हुई बात या स्थिति को तुरंत पहचान लिया। उधर, कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने ‘वास्तेगुना-हुइंया’ और ‘कुच्चु-पुच्चु’ जैसे वायरल इंटरनेट एक्सप्रेशन का उल्लेख किया। ये ऐसे लोकप्रिय डिजिटल मुहावरे हैं जिनका कोई निश्चित शब्दार्थ नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया पर हास्य और व्यंग्य के संदर्भ में व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं।
सोशल मीडिया ने बदली राजनीतिक भाषा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में Gen Z स्लैंग की एंट्री के पीछे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है। बीते कुछ वर्षों में इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो और मीम संस्कृति ने युवाओं की बोलचाल की भाषा को काफी प्रभावित किया है। विशेष रूप से हालिया छात्र आंदोलनों के दौरान पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर युवाओं ने अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए इन्हीं इंटरनेट स्लैंग, मीम्स और वायरल नारों का इस्तेमाल किया। जब यही मुद्दे संसद तक पहुंचे, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने युवाओं से संवाद स्थापित करने के लिए उसी भाषा को अपनाने की कोशिश की।
युवा मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि नेताओं द्वारा Gen Z की भाषा अपनाने के पीछे राजनीतिक रणनीति भी है। देश में 14 से 29 वर्ष आयु वर्ग के करोड़ों युवा मतदाता हैं और हर चुनाव में उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में राजनीतिक दल केवल पारंपरिक भाषण शैली तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय युवाओं से जुड़ने और अपनी बात उनके अंदाज में रखने का प्रयास कर रहे हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया की शब्दावली अब चुनावी भाषणों और संसदीय बहसों तक पहुंच गई है।
पहले भी संसद में आए हैं लोकप्रिय ट्रेंड
यह पहला अवसर नहीं है जब लोकप्रिय संस्कृति का असर संसद में दिखाई दिया हो। इससे पहले भी फिल्मों, खेल और सोशल मीडिया से जुड़े कई चर्चित संवाद और नारे राजनीतिक भाषणों का हिस्सा बन चुके हैं। ‘How's the Josh?’, ‘जय हो’ और ‘खेला होबे’ जैसे लोकप्रिय वाक्यांश संसद और चुनावी सभाओं में अलग-अलग समय पर सुनाई दिए हैं। अब Gen Z स्लैंग का उपयोग इसी बदलते राजनीतिक संचार का नया चरण माना जा रहा है।
भाषा से आगे, मुद्दों पर भी नजर
हालांकि, कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल युवाओं की भाषा बोलना पर्याप्त नहीं है। यदि राजनीतिक दल वास्तव में युवा मतदाताओं का विश्वास हासिल करना चाहते हैं, तो उन्हें रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, तकनीक और अवसरों जैसे मुद्दों पर भी ठोस पहल करनी होगी। Gen Z की भाषा का संसद तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र में बदलते संवाद का संकेत जरूर है, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि आज का युवा केवल अपनी भाषा सुनना नहीं चाहता, बल्कि अपने सवालों और समस्याओं का समाधान भी चाहता है। यही आने वाले समय की राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती और कसौटी होगी।