केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दी सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर जानकारी, रिहाई को लेकर कही यह बात

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने दावा किया कि वांगचुक हिंसक प्रदर्शनों में मुख्य उकसाने वाले थे। उन्होंने नेपाल में हुए हिंसक आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की स्थिति भारत में भी उत्पन्न हो सकती है।

Update: 2026-02-12 06:19 GMT
नई दिल्ली। लद्दाख से जुड़े जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वांगचुक पूरी तरह स्वस्थ हैं और उनकी नियमित चिकित्सकीय निगरानी की जा रही है। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन आधारों पर हिरासत का आदेश पारित किया गया था, वे अब भी कायम हैं और स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें रिहा करना संभव नहीं है। यह सुनवाई न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष हुई। वांगचुक की पत्नी गीता अंजमो ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर उनकी हिरासत को अवैध घोषित करने की मांग की है।

‘24 बार हुई मेडिकल जांच’

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि हिरासत के बाद से वांगचुक की 24 बार चिकित्सा जांच कराई जा चुकी है। मेहता ने कहा, “हमने उनकी स्वास्थ्य की जांच 24 बार की है। वह स्वस्थ, तंदुरुस्त और खुशहाल हैं। उन्हें कुछ पाचन संबंधी समस्या थी, जिसका इलाज चल रहा है। कुछ भी चिंताजनक नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने इस मामले पर गंभीरता से विचार किया है, लेकिन स्वास्थ्य के आधार पर रिहाई का कोई औचित्य नहीं बनता। मेहता ने अदालत से कहा, “जिस आधार पर हिरासत आदेश पारित किया गया था, वह बरकरार है। हम इस तरह के अपवाद नहीं बना सकते।”

सरकार का आरोप: ‘हिंसक प्रदर्शनों में भूमिका’

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने दावा किया कि वांगचुक हिंसक प्रदर्शनों में मुख्य उकसाने वाले थे। उन्होंने नेपाल में हुए हिंसक आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की स्थिति भारत में भी उत्पन्न हो सकती है। नटराज ने कहा, “वह कहते हैं कि लद्दाख में सशस्त्र बलों की तैनाती दुर्भाग्यपूर्ण है। वह यह भी कहते हैं कि युवाओं का मानना है कि शांतिपूर्ण तरीके प्रभावी नहीं रहे।” सरकार का तर्क था कि इस तरह के बयान युवाओं को भड़का सकते हैं और कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

अदालत की टिप्पणी: ‘आप ज्यादा सोच रहे हैं’

सरकार के तर्कों पर प्रतिक्रिया देते हुए पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा युवाओं की चिंताओं का उल्लेख करना अपने आप में हिंसा का समर्थन नहीं माना जा सकता। पीठ ने टिप्पणी की, “वह कह रहे हैं कि युवा ऐसा कह रहे हैं। वह कह रहे हैं कि यह कुछ चिंताजनक है। यदि कोई यह व्यक्त करता है कि हिंसक तरीका सही नहीं है तो आप इस बारे में बहुत ज्यादा सोच रहे हैं।” अदालत की यह टिप्पणी इस बात का संकेत देती है कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर सतर्क है।

क्या है एनएसए?

सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया है। यह कानून केंद्र और राज्य सरकारों को किसी व्यक्ति को इस आधार पर निरुद्ध करने का अधिकार देता है कि वह “भारत की रक्षा, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक” गतिविधियों में संलग्न हो सकता है। एनएसए के तहत अधिकतम हिरासत अवधि 12 महीने तक हो सकती है, हालांकि सरकार इसे पहले भी रद्द कर सकती है। हिरासत आदेश की समीक्षा एक सलाहकार बोर्ड द्वारा की जाती है।

याचिकाकर्ता का पक्ष

वांगचुक की पत्नी गीता अंजमो ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर दावा किया है कि हिरासत मनमानी और अवैध है। याचिका में कहा गया है कि वांगचुक शांतिपूर्ण आंदोलनों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों को उठाते रहे हैं और उनके खिलाफ एनएसए का उपयोग असंगत है। हालांकि, इस चरण पर अदालत ने केंद्र से विस्तृत जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई की तारीख निर्धारित की जा सकती है।

लद्दाख से जुड़ी मांगें

सोनम वांगचुक लद्दाख से जुड़े सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे हैं। वे क्षेत्र में संवैधानिक सुरक्षा और पारिस्थितिक संरक्षण की मांग को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। सरकार का कहना है कि उनके कुछ बयान और गतिविधियां कानून-व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकती थीं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि वे लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत अपनी बात रख रहे थे।

स्वास्थ्य बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा

सुनवाई के दौरान मुख्य प्रश्न यह रहा कि क्या स्वास्थ्य के आधार पर हिरासत को शिथिल किया जा सकता है। केंद्र ने स्पष्ट किया कि वांगचुक की सेहत को लेकर कोई गंभीर खतरा नहीं है और नियमित चिकित्सा निगरानी जारी है। सरकार का रुख है कि जब तक हिरासत के मूल आधार कायम हैं, तब तक रिहाई का सवाल नहीं उठता। अदालत ने भी फिलहाल इस पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है और मामले की विस्तृत सुनवाई जारी है।

दलीलों पर विचार

सुप्रीम कोर्ट आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार कर सकता है। यदि अदालत को लगे कि हिरासत में प्रक्रियात्मक त्रुटि है या पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह हस्तक्षेप कर सकती है। फिलहाल, केंद्र का रुख स्पष्ट है कि वांगचुक की सेहत स्थिर है और एनएसए के तहत हिरासत उचित है।

क्‍या होगा सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम?

सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन के प्रश्न को फिर से केंद्र में ला दिया है। जहां एक ओर केंद्र सरकार हिरासत को आवश्यक बता रही है, वहीं याचिकाकर्ता इसे अवैध और असंगत करार दे रहे हैं। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं, जो इस संवेदनशील मामले में दिशा तय करेगा।

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