Birthday Speacial :अजीत डोभाल ने पाकिस्तान की नाक के नीचे जासूस बनकर किया था काम, जानें उनके बारे में

अजीत डोभाल के करियर का सबसे रहस्यमय और चर्चित अध्याय वह है, जब उन्होंने पाकिस्तान में सात साल तक एक गुप्त एजेंट के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने सक्रिय आतंकवादी संगठनों और उनके नेटवर्क पर गहरी खुफिया जानकारी जुटाई।

Update: 2026-01-19 22:56 GMT
नई दिल्ली। देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत कुमार डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में हुआ था। देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा रणनीति को नई दिशा देने वाले डोभाल आज भारतीय सुरक्षा तंत्र के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक चेहरों में गिने जाते हैं। खुफिया अभियानों से लेकर कूटनीतिक रणनीति और सैन्य कार्रवाई तक, डोभाल का करियर भारत की सुरक्षा नीति के कई निर्णायक मोड़ों का साक्षी रहा है।

आईपीएस से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक

अजीत डोभाल ने 1968 में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में प्रवेश किया। केरल कैडर के अधिकारी के रूप में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन जल्द ही उनकी पहचान एक ऐसे अधिकारी के रूप में बनने लगी जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी असाधारण रणनीतिक सूझबूझ दिखाने में सक्षम थे। उनकी शुरुआती पोस्टिंग्स में ही उग्रवाद, आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में उनकी गहरी रुचि और समझ सामने आने लगी थी। यही कारण रहा कि बाद में उन्हें देश के सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण अभियानों में शामिल किया गया।

मिजोरम और पंजाब में उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक भूमिका

डोभाल ने मिजोरम और बाद में पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। मिजोरम में जब अलगाववादी हिंसा चरम पर थी, तब उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों को समझते हुए खुफिया नेटवर्क मजबूत करने और संवाद के जरिए समाधान तलाशने की रणनीति अपनाई। पंजाब में आतंकवाद के दौर में डोभाल की भूमिका और भी अहम रही। खालिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहे पंजाब में उन्होंने जमीनी स्तर पर काम करते हुए आतंकवादी संगठनों की कमर तोड़ने में योगदान दिया। इस दौरान उन्होंने केवल बल प्रयोग पर नहीं, बल्कि खुफिया सूचनाओं, मनोवैज्ञानिक रणनीति और नेटवर्क तोड़ने पर भी जोर दिया।

पाकिस्तान में सात साल गुप्त एजेंट के रूप में

अजीत डोभाल के करियर का सबसे रहस्यमय और चर्चित अध्याय वह है, जब उन्होंने पाकिस्तान में सात साल तक एक गुप्त एजेंट के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने सक्रिय आतंकवादी संगठनों और उनके नेटवर्क पर गहरी खुफिया जानकारी जुटाई। बताया जाता है कि इस अवधि में डोभाल ने अपनी पहचान पूरी तरह छिपाकर पाकिस्तान के भीतर रहकर काम किया और भारत विरोधी गतिविधियों की अहम जानकारियां हासिल कीं। यह अनुभव बाद में भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति को आकार देने में बेहद उपयोगी साबित हुआ।

कंधार विमान अपहरण: संकट में रणनीतिक नेतृत्व

1999 में काठमांडू से दिल्ली जा रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी-814 के अपहरण ने पूरे देश को हिला दिया था। विमान को अफगानिस्तान के कंधार ले जाया गया, जहां यात्रियों की जान पर संकट मंडरा रहा था। इस अत्यंत संवेदनशील संकट के दौरान अजीत डोभाल ने अपहृत यात्रियों की रिहाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संकट प्रबंधन, बातचीत और रणनीतिक संतुलन के जरिए हालात को संभालने में अहम योगदान दिया। यह घटना भले ही राजनीतिक रूप से विवादास्पद रही हो, लेकिन डोभाल की पेशेवर क्षमता और संकट में निर्णय लेने की योग्यता को व्यापक रूप से सराहा गया।

विमान अपहरण विरोधी अभियानों के विशेषज्ञ

आईसी-814 ही नहीं, अजीत डोभाल ने अपने करियर में कई विमान अपहरणों को सफलतापूर्वक विफल करने में भूमिका निभाई। विमानन सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी उपायों को लेकर उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें इस क्षेत्र में एक भरोसेमंद नाम बना दिया।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में नई रणनीति

2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद अजीत डोभाल को भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। इस पद पर उन्होंने पारंपरिक “रक्षात्मक” नीति से हटकर आक्रामक सुरक्षा सिद्धांत को बढ़ावा दिया। डोभाल का मानना रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ केवल प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं, बल्कि स्रोत पर प्रहार जरूरी है। यही सोच बाद के वर्षों में भारत की सुरक्षा कार्रवाइयों में स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई हमला

2016 में उरी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में की गई सर्जिकल स्ट्राइक डोभाल की रणनीतिक सोच का प्रत्यक्ष उदाहरण थी। इस कार्रवाई ने यह संदेश दिया कि भारत अब सीमा पार आतंकवाद को बिना जवाब नहीं छोड़ेगा। इसके बाद 2019 में पुलवामा हमले के जवाब में बालाकोट हवाई हमला किया गया। पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों पर भारतीय वायुसेना की इस कार्रवाई को भी डोभाल की देखरेख में अंजाम दिया गया। यह पहली बार था जब भारत ने खुले तौर पर सीमा पार हवाई हमला कर आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश दिया।

‘डोभाल सिद्धांत’ और सुरक्षा नीति

अजीत डोभाल की रणनीति को अक्सर ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ के नाम से जाना जाता है। इसका मूल विचार है— अगर दुश्मन आपकी जमीन पर अस्थिरता फैलाता है, तो आप उसकी जमीन पर लागत बढ़ाइए।” इस सिद्धांत ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सोच को एक नया आयाम दिया है, जिसमें कूटनीति, खुफिया तंत्र और सैन्य शक्ति—तीनों का संतुलित उपयोग शामिल है।

एक शांत, लेकिन निर्णायक व्यक्तित्व

सार्वजनिक मंचों पर कम बोलने वाले अजीत डोभाल को पर्दे के पीछे निर्णायक फैसले लेने वाला रणनीतिकार माना जाता है। उनका करियर यह दिखाता है कि कैसे एक खुफिया अधिकारी अनुभव, साहस और दूरदृष्टि के दम पर देश की सुरक्षा नीति को नई दिशा दे सकता है। आज, अपने जन्मदिन के अवसर पर, अजीत डोभाल न केवल एक अधिकारी के रूप में, बल्कि आधुनिक भारत की सुरक्षा रणनीति के प्रमुख शिल्पकार के रूप में याद किए जाते हैं।


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