ट्विशा शर्मा मौत मामला: सास गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द; हिरासत में पूछताछ का रास्ता साफ

जस्टिस देवनारायण मिश्र की एकल पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कानून की नजर में सब बराबर हैं, चाहे कोई कितने ही रसूखदार पद पर क्यों न रहा हो। इस फैसले के बाद अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और पुलिस के लिए आरोपी सास को हिरासत में लेकर पूछताछ करने का रास्ता साफ हो गया है।;

Update: 2026-05-28 05:49 GMT

जबलपुर: Twisha Sharma Death Case: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बहुचर्चित ट्विशा शर्मा मौत मामले में एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले की मुख्य आरोपी और पूर्व न्यायिक अधिकारी (रिटायर्ड जज) गिरिबाला सिंह (Giribala Singh) को निचली अदालत से मिली अग्रिम जमानत को पूरी तरह खारिज कर दिया है। बता दें कि भोपाल की एक निचली अदालत ने एफआईआर (FIR) दर्ज होने के महज कुछ ही घंटों के भीतर आरोपी सास को यह राहत दे दी थी, जिस पर हाईकोर्ट ने बेहद तीखी और गंभीर टिप्पणियां की हैं।

जस्टिस देवनारायण मिश्र की एकल पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कानून की नजर में सब बराबर हैं, चाहे कोई कितने ही रसूखदार पद पर क्यों न रहा हो। इस फैसले के बाद अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और पुलिस के लिए आरोपी सास को हिरासत में लेकर पूछताछ (Custodial Interrogation) करने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

शरीर पर मिले चोट के 6 गंभीर निशान

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और विस्फोटक मोड़ मृतका ट्विशा शर्मा की पोस्टमार्टम और एम्स (AIIMS) भोपाल की क्वेरी रिपोर्ट से आया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से उल्लेख किया है कि ट्विशा के शरीर पर मौत से पहले के 6 गंभीर चोटों के निशान पाए गए हैं।

डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार:


चोटों का स्थान: चार चोटें बाएं हाथ पर, एक चोट रिंग फिंगर पर और एक गंभीर निशान सिर पर मिला है।

बचाव पक्ष का दावा खारिज: आरोपी पक्ष के वकीलों ने दलील दी थी कि ये चोटें तब लगी होंगी जब ट्विशा के शव को फंदे से नीचे उतारा गया या उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था।

एम्स की स्पेशल रिपोर्ट: एम्स के डॉक्टरों की टीम ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए साफ किया कि ये चोटें फंदे से उतारने या परिवहन के दौरान की नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर मौत से ठीक पहले हुई मारपीट या किसी वस्तु के प्रहार की ओर इशारा करती हैं। इसके अलावा फेफड़ों और आंखों की स्थिति ने भी अंदेशा और गहरा कर दिया है।

सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह और सीबीआई (CBI) ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि अग्रिम जमानत का दुरुपयोग करते हुए रिटायर्ड जज जांच एजेंसी के साथ 'आंख-मिचौली' का खेल खेल रही थीं। उन्हें बयान दर्ज कराने के लिए 5 बार नोटिस जारी किए गए, लेकिन उन्होंने नोटिस लेने तक से इनकार कर दिया। आखिरकार पुलिस को मजबूरन व्हाट्सऐप पर नोटिस तामील कराना पड़ा।

वहीं, ट्विशा के पिता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट में दलील दी कि आरोपी कोई आम महिला नहीं हैं। वे एक पूर्व न्यायिक अधिकारी हैं और उनके पास साइबर फॉरेंसिक, डिजिटल सिग्नेचर और क्राइम सीन मैनेजमेंट की विशेष ट्रेनिंग है। ऐसे में कस्टडी के बिना उनसे सच उगलवाना नामुमकिन है और वे रसूख के बल पर सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी कर सकती हैं।

बचाव पक्ष की 4 मुख्य दलीलें

बचाव पक्ष ने खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए अदालत के सामने कई तर्क रखे, लेकिन हाईकोर्ट की कड़ाई के आगे वे सभी दावे खोखले साबित हुए:

1. व्हाट्सऐप चैट्स का सच

दलील: बचाव पक्ष ने दावा किया कि ट्विशा के व्हाट्सऐप चैट्स में प्रताड़ना के आरोप सिर्फ पति समर्थ सिंह पर हैं और ट्विशा ने अपनी सास को एक 'अच्छी इंसान' बताया था।

कोर्ट का रुख: जस्टिस देवनारायण मिश्रा ने कहा कि चैट्स और गवाहों के बयानों को देखने से यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि आरोप सिर्फ पति पर हैं। निचली अदालत ने इन तथ्यों को गहराई से नहीं देखा।

2. बैंक ट्रांजैक्शन की हकीकत

दलील: दावा किया गया कि सास अपनी बहू का ख्याल रखती थीं और उन्होंने यूपीआई (UPI) के जरिए ट्विशा के खाते में 7 लाख रुपये से ज्यादा ट्रांसफर किए थे, इसलिए दहेज का आरोप गलत है।

कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने जब बैंक रिकॉर्ड खंगाला तो पाया कि शादी 9 दिसंबर 2025 को हुई थी और पैसों का लेनदेन अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच हुआ। मौत (12 मई) के आसपास कोई लेनदेन नहीं था। कोर्ट ने कहा कि केवल इस पुराने लेनदेन से दहेज की मांग को खारिज नहीं किया जा सकता।

3. जबरन गर्भपात (Abortion) का विवाद

दलील: बचाव पक्ष ने कहा कि शादी के दो महीने के भीतर ट्विशा ने अपनी मर्जी से गर्भपात कराया था, उस पर कोई दबाव नहीं था।

कोर्ट का रुख: अदालत ने कहा कि व्हाट्सऐप चैट्स और मृतका के मायके वालों के बयानों से साफ है कि गर्भधारण और उसे समाप्त करने को लेकर दोनों पक्षों में गहरा विवाद था और मृतका पर जबरन दबाव बनाया जा रहा था।

4. उम्र और रसूख का हवाला

दलील: कहा गया कि गिरिबाला सिंह 63 वर्ष की बुजुर्ग महिला हैं, भोपाल की स्थायी निवासी हैं और रिटायर्ड जज हैं, इसलिए उनके भागने का कोई खतरा नहीं है।

कोर्ट का रुख: कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि केवल उम्र, सामाजिक स्टेटस या पूर्व रसूख के आधार पर इतने संगीन और संवेदनशील मामले में अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।

निचली अदालत का फैसला रद्द

हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि मौत की परिस्थितियां अत्यंत संदिग्ध हैं और भोपाल के 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा बीती 15 मई को जल्दबाजी में दिया गया अग्रिम जमानत का फैसला कानूनी कसौटी पर पूरी तरह फेल साबित होता है। इस आदेश को रद्द करते हुए मामले की जांच भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संगीन धाराओं और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत कड़ाई से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दिल्ली एम्स के डॉक्टरों की एक विशेष टीम द्वारा ट्विशा के शव का दूसरा पोस्टमार्टम (सेकंड ऑटोप्सी) भी कराया गया है, जिसकी विस्तृत रिपोर्ट का इंतजार है। सीबीआई ने कोर्ट को सूचित किया है कि ट्विशा के पति समर्थ सिंह को पहले ही कस्टडी में लिया जा चुका है क्योंकि शुरुआती जांच और पोस्टमार्टम के समय कई अनधिकृत लोग मौजूद थे। अब इस आदेश के बाद पूर्व जज गिरिबाला सिंह की गिरफ्तारी भी तय मानी जा रही है।

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