दिग्विजय सिंह को विधायक बेटे जयवर्धन सिंह की चिंता, राघौगढ़ में करवा रहे 151 कुंडीय श्रीराम महायज्ञ
राघौगढ़ के ग्राम भैंसाना में 18 से 28 मई तक 151 कुंडीय श्रीराम महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। आयोजन को आध्यात्मिक शांति, विश्व कल्याण और पर्यावरण शुद्धि से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस और खासतौर पर जयवर्धन सिंह की छवि मजबूत करने की कवायद माना जा रहा है।;
भोपालः Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। लंबे समय तक अपने बयानों को लेकर विवादों में रहे दिग्विजय सिंह अब राघौगढ़ में बड़े धार्मिक आयोजन के जरिए नई राजनीतिक रणनीति पर काम करते दिखाई दे रहे हैं। राघौगढ़ के ग्राम भैंसाना में 18 से 28 मई तक 151 कुंडीय श्रीराम महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। आयोजन को आध्यात्मिक शांति, विश्व कल्याण और पर्यावरण शुद्धि से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस और खासतौर पर जयवर्धन सिंह की छवि मजबूत करने की कवायद माना जा रहा है।
जयवर्धन सिंह के राजनीतिक भविष्य पर फोकस
दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर काफी घट गया था, जिसने कांग्रेस खेमे की चिंता बढ़ा दी। वर्ष 2013 में जयवर्धन सिंह ने लगभग 58 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। 2018 में यह अंतर घटकर करीब 46 हजार रह गया। वहीं 2023 विधानसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर केवल 4,505 वोट तक सिमट गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी बदलते चुनावी समीकरण को देखते हुए अब धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए जनाधार मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा के आरोपों का असर
राघौगढ़ क्षेत्र में भाजपा लंबे समय से दिग्विजय सिंह की छवि को लेकर आक्रामक रही है। भाजपा ने उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने के आरोप लगाए और इसे चुनावी मुद्दा बनाया। स्थानीय स्तर पर भाजपा ने यह प्रचार भी तेज किया कि राघौगढ़ राजपरिवार हिंदू मतदाताओं की अपेक्षा अल्पसंख्यक राजनीति को प्राथमिकता देता है। माना जा रहा है कि इसका असर ग्रामीण और शहरी हिंदू मतदाताओं पर पड़ा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगी। इसी पृष्ठभूमि में अब कांग्रेस और राघौगढ़ परिवार अपनी राजनीतिक रणनीति बदलते नजर आ रहे हैं।
धार्मिक आयोजनों में बढ़ी सक्रियता
हाल के महीनों में जयवर्धन सिंह और दिग्विजय सिंह दोनों की धार्मिक आयोजनों में सक्रियता बढ़ी है। जयवर्धन सिंह बागेश्वर धाम की हिंदू एकता यात्रा में भी शामिल हुए थे, जिसे राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा गया। अब 151 कुंडीय श्रीराम महायज्ञ के आयोजन को भी उसी क्रम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस आयोजन में प्रसिद्ध अभिनेता आशुतोष राणा और कवि एवं राम कथा वाचक कुमार विश्वास को भी आमंत्रित किया गया है। इन चर्चित हस्तियों की मौजूदगी से आयोजन को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान मिलने की संभावना है।
खुद को “घोर सनातनी” बता चुके हैं दिग्विजय
दिग्विजय सिंह हाल के दिनों में सार्वजनिक मंचों पर अपनी धार्मिक आस्था का खुलकर उल्लेख कर रहे हैं। इंदौर में भाजपा विधायक उषा ठाकुर के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने खुद को “घोर सनातनी” बताया था। उन्होंने अपनी नर्मदा परिक्रमा, नियमित एकादशी व्रत और धार्मिक यात्राओं का भी जिक्र किया। दिग्विजय सिंह अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन भी कर चुके हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भी स्पष्ट दिखाई देती है।
पुराने बयानों को लेकर घिरते रहे हैं दिग्विजय
दिग्विजय सिंह पहले भी कई विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। उन्होंने अतीत में “भगवा आतंकवाद” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, जिस पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। इसके अलावा उन्होंने कई बार अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर बयान दिए, जिन्हें भाजपा ने मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़कर पेश किया। दिसंबर 2025 में उन्होंने कहा था कि भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई की प्रतिक्रिया बांग्लादेश में भी देखने को मिलती है। उनके ऐसे बयानों को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बने रहे।
बदली रणनीति या नई राजनीतिक जरूरत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदलते राजनीतिक माहौल में कांग्रेस के कई नेता अब अपनी धार्मिक पहचान को खुलकर सामने ला रहे हैं। मध्य प्रदेश में भाजपा की मजबूत हिंदुत्व राजनीति के बीच कांग्रेस भी नए तरीके से संतुलन बनाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। राघौगढ़ में हो रहा महायज्ञ सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर बनाई गई एक व्यापक राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।