शरीर पर सात चोटों ने बढ़ाई ट्विशा शर्मा मौत मामले की गंभीरता, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर बोले एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह
मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) प्रशांत सिंह ने गुरुवार को कहा कि हाईकोर्ट ने ट्विशा शर्मा की मौत के मामले की सुनवाई करते हुए कई अहम पहलुओं पर गौर किया, जिनमें पीड़िता के शरीर पर मृत्यु-पूर्व चोटों के सात निशान मौजूद हैं;
जबलपुर। मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) प्रशांत सिंह ने गुरुवार को कहा कि हाईकोर्ट ने ट्विशा शर्मा की मौत के मामले की सुनवाई करते हुए कई अहम पहलुओं पर गौर किया, जिनमें पीड़िता के शरीर पर मृत्यु-पूर्व चोटों के सात निशान मौजूद हैं
आईएएनएस से बात करते हुए प्रशांत सिंह ने कहा कि एक याचिका दायर की गई थी जिसमें आरोपी सास गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने की मांग की गई थी।
एडवोकेट जनरल ने कहा, "कल इस मामले में विस्तार से सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने जिन मुख्य बिंदुओं पर विचार किया, उनमें से एक यह था कि ट्विशा शर्मा के शरीर पर सात चोटें पाई गई थीं, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाती हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि जांच टीम ने गिरिबाला सिंह को कई नोटिस जारी किए थे, लेकिन आरोप है कि उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
सिंह ने आईएएनएस को बताया, "अग्रिम जमानत देते समय अदालत ने साफ तौर पर कहा था कि वह जांच में सहयोग करेंगी। हालांकि, जांच टीम को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।"
एडवोकेट जनरल ने यह भी बताया कि एफआईआर में आरोपी के खिलाफ क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं।
उन्होंने कहा, "एफआईआर में साफ तौर पर लिखा है कि ट्विशा शर्मा के साथ क्रूरता की गई थी। उनकी अप्राकृतिक मृत्यु छह महीने के भीतर हो गई, जिससे यह कथित तौर पर दहेज मृत्यु का मामला बन जाता है। एफआईआर में दहेज की मांग से जुड़े आरोप भी शामिल हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि जांच के दौरान दर्ज किए गए गवाहों के बयान भी शिकायत में लगाए गए आरोपों का समर्थन करते हैं।
मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) प्रशांत सिंह ने कहा, "अगर वाट्सअप चैट की जांच की जाए, तो उनसे ट्विशा शर्मा द्वारा झेली गई दहेज से जुड़ी क्रूरता के और भी सबूत सामने आ सकते हैं।"
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व जिला न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को उनकी बहू ट्विशा शर्मा की दहेज मृत्यु के मामले में दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है।
बुधवार को दिए गए इस आदेश में, निचली अदालत द्वारा 15 मई के आदेश के जरिए दी गई राहत को रद्द कर दिया गया। अदालत ने यह पाया कि जमानत देते समय केस डायरी और गवाहों के बयानों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया गया था।
जस्टिस देवनारायण मिश्रा ने भोपाल की एक सत्र अदालत द्वारा पहले दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया। उन्होंने पाया कि निचली अदालत केस डायरी, गवाहों की गवाही और वाट्सअप बातचीत जैसे महत्वपूर्ण सबूतों की पर्याप्त जांच करने में विफल रही थी।
हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा करने के बाद पाया कि इस आदेश में गंभीर कमियां थीं। पीठ ने पाया कि निचली अदालत ने केस डायरी में मौजूद गवाहों की महत्वपूर्ण गवाही और दस्तावेजी सबूतों को नजरअंदाज कर दिया था, जो सिंह की कथित संलिप्तता की ओर इशारा कर रहे थे।