करूर भगदड़ मामले में डीएमके को सुप्रीम कोर्ट से फटकार, याचिका पर सुनवाई से अदालत ने किया इनकार

करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें सत्तारूढ़ तमिलनाडु वेत्री कड़गम (टीवीके) के नेताओं पर सार्वजनिक बयानबाजी करने से रोक लगाने की मांग की गई थी।;

Update: 2026-07-07 07:42 GMT

नई दिल्ली। करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें सत्तारूढ़ तमिलनाडु वेत्री कड़गम (टीवीके) के नेताओं पर सार्वजनिक बयानबाजी करने से रोक लगाने की मांग की गई थी।

डीएमके ने अपनी याचिका में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और मंत्री आधाव अर्जुना सहित टीवीके के शीर्ष नेताओं को ऐसे सार्वजनिक बयान देने से रोकने का निर्देश देने की गुहार लगाई थी, जिससे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआईI) की मौजूदा जांच के गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका जताई गई थी।

न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और आलोक आराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ संकेत दिए कि वह इस याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने कहा, "इस याचिका पर यहां जोर न देना ही बेहतर होगा। हम इसे खारिज करने के पक्ष में हैं।"

इसके बाद डीएमके की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। उन्होंने कहा कि पार्टी कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लेना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अन्य कानूनी विकल्प अपनाने के लिए स्वतंत्र है और इसी आधार पर याचिका को वापस लिया हुआ मानते हुए खारिज किया जाता है।

यह याचिका डीएमके के संगठन सचिव आरएस भारती ने दायर की थी। उन्होंने करूर भगदड़ मामले में चल रही सुनवाई में पक्षकार बनने की अनुमति भी मांगी थी। याचिका में मांग की गई थी कि अदालत की निगरानी में चल रही सीबीआई जांच पूरी होने तक टीवीके नेताओं को मामले पर सार्वजनिक बयान देने से रोका जाए। साथ ही, तमिलनाडु के मंत्री आधव अर्जुना के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का भी अनुरोध किया गया था।

डीएमके का आरोप था कि मामले के आरोपी भी रहे आधव अर्जुना के सार्वजनिक बयान और पीड़ित परिवारों को सरकारी लाभ देने की प्रस्तावित प्रक्रिया जांच को प्रभावित कर सकती है। याचिका में 2 जुलाई को आधव अर्जुना द्वारा दिए गए एक भाषण का भी जिक्र किया गया, जिसमें कथित तौर पर उन्होंने कहा था कि 'एक हिसाब बराबर करना है' और करूर हादसे के लिए पिछली डीएमके सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। डीएमके का कहना था कि ऐसे बयान अदालत की निगरानी में चल रही सीबीआई जांच की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकते हैं।

याचिका में यह भी कहा गया था कि मुख्यमंत्री विजय करूर जाकर मृतकों के परिजनों को सरकारी सहायता, अनुकंपा नियुक्तियां और अन्य लाभ देने वाले हैं। डीएमके ने स्पष्ट किया कि उसे पीड़ित परिवारों को राहत देने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ये परिवार इस मामले के महत्वपूर्ण गवाह भी हैं। ऐसे में मामले से जुड़े लोगों का उनसे सीधा संपर्क जांच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है।

27 सितंबर 2025 को करूर में टीवीके की एक राजनीतिक रैली के दौरान मची भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 142 लोग घायल हुए थे। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच तमिलनाडु पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दी थी।


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