ललित सुरजन की कलम से- हिंदी : विसंगतियां व विडंबनाएं
'हिन्दी भाषी प्रदेशों में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी की जो स्थिति देखते हैं, निराशा से मन वहीं घिर जाता है
'हिन्दी भाषी प्रदेशों में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी की जो स्थिति देखते हैं, निराशा से मन वहीं घिर जाता है। प्राथमिक शिक्षा पर 'असर' नामक जो वार्षिक रिपोर्ट आती है उसमें सरकारी स्कूलों की बात होती है, गणित की कमजोरी का उल्लेख होता है; लेकिन जिस भाषा में सारा जीवन व्यवहार होना है, उसकी तरफ कोई तवज्जो नहीं दी जाती। एक ओर जहां पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की योजनाएं चल रही हैं वहीं मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के प्रति बेरुखी पर क्यों नहीं चिंता होना चाहिए
उच्च शिक्षा में तो हाल बेहाल हैं। अधिकतर विद्यार्थी हिन्दी में एम.ए. इसलिए करते हैं कि उन्हें यह विषय स्नातकोत्तर उपाधि पाने का सबसे सरल उपाय लगता है। विषय में उनकी रुचि अक्सर नहीं होती और उपाधिधारी अनेक व्यक्ति हिन्दी में खुद को भलीभांति अभिव्यक्त नहीं कर पाते। एम.ए. ही क्यों, हिन्दी साहित्य में पीएचडी करने वालों की भी रुचि न तो भाषा में होती, न तो साहित्य में।
उनके लिए वह नौकरी पा जाने का एक जरिया मात्र है। जब शिक्षा प्राप्ति के दौरान यह स्थिति है तो आगे चलकर क्या होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। किन्तु हम विद्यार्थियों को ही क्यों दोष दें? हिन्दी का पूरा तंत्र जिनके जिम्मे है वे लोग क्या कर रहे हैं? इसमें हिन्दी अखबार, टीवी चैनल, सरकारी उपक्रमों के राजभाषा विभाग, हिन्दी सेवा के नाम पर चल रही संस्थाएं, विश्व हिन्दी सम्मेलन इत्यादि सब शामिल हैं।'
(देशबन्धु में 13 सितम्बर 2018 को प्रकाशित)
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