बोस्टन : अमेरिका की एक संघीय अदालत ने शुक्रवार को ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू की गई एक विवादित आव्रजन नीति को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि यह नीति कानूनी सीमाओं से परे जाकर बनाई गई थी और इसके कारण लाखों प्रवासियों के अधिकार प्रभावित हो सकते थे। इस फैसले से भारत सहित 39 देशों के नागरिकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जो पिछले कुछ समय से इस नीति के प्रभाव का सामना कर रहे थे।
2025 में लागू की गई थी नई नीति
ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2025 में आव्रजन नियमों में बदलाव करते हुए कई देशों के नागरिकों के लिए अमेरिका में रहने और विभिन्न प्रकार की आव्रजन सेवाएं प्राप्त करने की प्रक्रिया को कठिन बना दिया था। इस नीति के तहत अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के 39 देशों के नागरिकों के शरण, कार्य परमिट, ग्रीन कार्ड और नागरिकता से जुड़े मामलों पर अंतिम निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो गई थी। इन प्रतिबंधों के कारण हजारों लोग लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति में रहने को मजबूर थे। भारत के नागरिक भी इस सूची में शामिल देशों में थे, जिससे कई आवेदनों पर असर पड़ा था।
न्यायाधीश ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
इस मामले की सुनवाई कर रहे जिला मुख्य न्यायाधीश जॉन मैककोनेल जूनियर ने ट्रंप प्रशासन की नीति की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार ने नई आव्रजन नीतियों को लागू करने के दौरान ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल करने की कोशिश की, जो उसके पास नहीं थे। अपने फैसले में न्यायाधीश ने लिखा कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त कानूनी आधार और उचित स्पष्टीकरण के कई फैसले लिए। साथ ही, प्रवासियों के हितों की अनदेखी करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर इन कदमों को सही ठहराने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि इस तरह की नीतियां अमेरिका में पहले से रह रहे लोगों को कानूनी जटिलताओं में डाल सकती हैं और उनके भविष्य को अनिश्चित बना सकती हैं।
नागरिकता और आव्रजन सेवा विभाग पर भी टिप्पणी
अदालत ने अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा विभाग (यूएससीआईएस) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। न्यायाधीश मैककोनेल ने कहा कि विभाग ने पहले से स्थापित कानूनों और नियमों की अनदेखी की तथा बिना पर्याप्त अधिकार के नई प्रक्रियाएं लागू करने की कोशिश की। अदालत के अनुसार, प्रशासन को आव्रजन संबंधी निर्णय लेते समय मौजूदा कानूनी प्रावधानों और प्रभावित लोगों के अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
मानवाधिकार संगठनों ने फैसले का किया स्वागत
इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाने वाले संगठन ‘डेमोक्रेसी फॉरवर्ड’ ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। संगठन की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्काई पेरीमैन ने कहा कि इस तरह की नीतियां परिवारों, कामकाजी लोगों, शरणार्थियों और समुदायों के लिए गंभीर समस्याएं पैदा करती हैं। उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों के कारण बड़ी संख्या में लोग लंबे समय तक असमंजस और भय के माहौल में जीने को मजबूर हुए। कई लोग काम नहीं कर पा रहे थे, सुरक्षा संबंधी लाभों का उपयोग नहीं कर पा रहे थे और अपने जीवन की योजनाओं को आगे नहीं बढ़ा पा रहे थे।
भारत समेत कई देशों के नागरिकों को मिल सकती है राहत
अदालत के इस फैसले से भारत सहित उन 39 देशों के नागरिकों को राहत मिलने की संभावना है, जिनके आव्रजन और नागरिकता संबंधी मामलों पर प्रभाव पड़ा था। अब उम्मीद की जा रही है कि शरण, ग्रीन कार्ड, कार्य परमिट और नागरिकता से जुड़े लंबित मामलों की प्रक्रिया सामान्य रूप से आगे बढ़ सकेगी।