नेपाल के गृहमंत्री सूदन गुरुंग ने पद से दिया इस्तीफा, 26 दिन में छोड़ा पद, जानें क्या है वजह

गुरुंग ने अपने इस्तीफे में स्पष्ट किया कि वे चाहते हैं कि उनके खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और उनके पद पर बने रहने से किसी तरह का हितों का टकराव न दिखे। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है, इसलिए उन्होंने नैतिक आधार पर पद छोड़ने का निर्णय लिया है।;

Update: 2026-04-22 10:14 GMT
काठमांडू। नेपाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। देश के गृहमंत्री सूदन गुरुंग ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। खास बात यह है कि उन्होंने पद संभालने के महज 26 दिन के भीतर ही यह निर्णय लिया। उनके इस्तीफे के पीछे शेयर निवेश से जुड़े विवाद और वित्तीय पारदर्शिता पर उठे सवाल मुख्य कारण बताए जा रहे हैं।
गुरुंग ने अपने इस्तीफे में स्पष्ट किया कि वे चाहते हैं कि उनके खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और उनके पद पर बने रहने से किसी तरह का हितों का टकराव न दिखे। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है, इसलिए उन्होंने नैतिक आधार पर पद छोड़ने का निर्णय लिया है।

इस्तीफे में क्या कहा गुरुंग ने?

सूदन गुरुंग ने अपने बयान में कहा कि हाल के दिनों में उनके शेयर निवेश और अन्य मुद्दों को लेकर जो सवाल उठे हैं, उन्हें उन्होंने गंभीरता से लिया है। उन्होंने लिखा, “मेरे लिए पद से बड़ा नैतिकता का सवाल है और जनविश्वास से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती।” उन्होंने यह भी कहा कि देश में चल रहे जन आंदोलनों, खासकर युवाओं (Gen Z) द्वारा उठाई जा रही पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया। गुरुंग ने कहा कि अगर सरकार पर किसी तरह का सवाल उठता है, तो उसका जवाब नैतिकता के जरिए ही दिया जाना चाहिए।

क्या हैं मुख्य आरोप?

सूदन गुरुंग पर कई गंभीर आरोप लगे थे, जिनमें सबसे प्रमुख उनकी संपत्ति से जुड़ी जानकारी छिपाने का मामला है। आरोप है कि उन्होंने अपनी आधिकारिक संपत्ति घोषणा में कुछ कंपनियों में किए गए निवेश का उल्लेख नहीं किया। इसके अलावा उन पर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने एक ऐसे कारोबारी से आर्थिक लेनदेन किया, जो मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में जांच के घेरे में है। इन आरोपों के सामने आने के बाद विपक्ष और जनता के बीच उनकी कड़ी आलोचना हो रही थी।

दीपक भट्टा से संबंधों पर विवाद

गुरुंग का नाम विवादित कारोबारी दीपक भट्टा के साथ जुड़ने के बाद मामला और गंभीर हो गया। दीपक भट्टा को 1 अप्रैल को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरुंग ने ‘लिबर्टी माइक्रो लाइफ इंश्योरेंस’ और ‘स्टार माइक्रो इंश्योरेंस’ नाम की कंपनियों में निवेश किया था। बताया जाता है कि इन कंपनियों का संबंध दीपक भट्टा और जगदंबा ग्रुप से है। आरोप है कि गुरुंग ने इन कंपनियों में 25-25 हजार शेयर खरीदे थे, लेकिन इस निवेश की जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं दी गई। इससे उनके वित्तीय लेनदेन की पारदर्शिता पर सवाल उठे।

बैंक खाते में 60 लाख जमा होने का भी दावा

एक अन्य आरोप यह भी सामने आया कि गुरुंग के बैंक खाते में कुछ व्यक्तियों द्वारा लगभग 60 लाख रुपये जमा किए गए थे, जिनका इस्तेमाल शेयर खरीदने में किया गया। इससे उनके धन के स्रोत पर भी सवाल खड़े हुए। विपक्ष का कहना था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का दावा करने वाली सरकार का हिस्सा होते हुए भी गुरुंग खुद वित्तीय अनियमितताओं में शामिल पाए गए।

आरोपों पर गुरुंग का बचाव

हालांकि सूदन गुरुंग ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि उनका निवेश पारदर्शी है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने संबंधित कंपनियों में लगभग 50 लाख रुपये के शेयर खरीदे थे। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति छिपाना चाहता है, तो वह इतने बड़े निवेश की खुलेआम जानकारी नहीं देता। गुरुंग के मुताबिक, यह केवल संपत्ति को सही तरीके से वर्गीकृत न कर पाने की गलती हो सकती है, न कि जानबूझकर कुछ छिपाने की कोशिश।

सरकार के लिए दूसरा झटका

बालेन शाह के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के लिए यह दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले भी सरकार के एक मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था। 9 अप्रैल को श्रम, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा मंत्री दीपक कुमार शाह को पद से हटा दिया गया था। उन पर अपनी पत्नी को एक सरकारी पद पर बनाए रखने और पद के दुरुपयोग का आरोप लगा था। इस तरह लगातार हो रहे विवादों और इस्तीफों ने सरकार की छवि और स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनीतिक और जनसामान्य प्रतिक्रिया

गुरुंग के इस्तीफे को कुछ लोग नैतिक जिम्मेदारी का उदाहरण मान रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है। जनता के बीच भी इस मामले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में युवाओं के बीच बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और पारदर्शिता की मांग अब नेताओं पर सीधे दबाव बना रही है।
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