वॉशिंगटन। टेस्ला और स्पेसएक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलन मस्क ने भारत में लगातार घट रही जन्म दर को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि देश की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) अब उस स्तर से नीचे पहुंच चुकी है, जिसे जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है। मस्क के अनुसार, यह बदलाव भविष्य में भारत की जनसंख्या संरचना और आर्थिक व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
एक्स पर साझा की टिप्पणी
एलन मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि भारत की जन्म दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के शिक्षित वर्ग में जन्म दर कई वर्ष पहले ही इस स्तर से नीचे पहुंच चुकी थी। रिप्लेसमेंट लेवल वह स्थिति होती है, जब प्रत्येक पीढ़ी स्वयं को जनसंख्या के स्तर पर बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में बच्चों को जन्म देती है। सामान्य तौर पर इसे 2.1 के आसपास माना जाता है। यदि प्रजनन दर लंबे समय तक इससे नीचे बनी रहती है, तो भविष्य में जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी पड़ सकती है या आबादी में कमी भी आ सकती है।
India’s birth rate has fallen below replacement.
— Elon Musk (@elonmusk) June 6, 2026
Among those most educated, India’s birth rate fell below replacement many years ago. https://t.co/RsWf0PK6wx
फर्टिलिटी रेट 1.9 तक पहुंचने का दावा
मस्क ने जिस आंकड़े का उल्लेख किया, उसके अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.9 तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। इस विषय पर प्रकाशित विभिन्न अध्ययनों और विश्लेषणों में भी यह संकेत दिया गया है कि देश में परिवार का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का बढ़ता स्तर, शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, रोजगार की प्राथमिकताएं और बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत जैसे कारण जन्म दर में कमी के पीछे प्रमुख कारक हैं।
महानगरों में गिरावट और अधिक स्पष्ट
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, बड़े शहरों में जन्म दर में गिरावट राष्ट्रीय औसत से भी अधिक तेज है। राजधानी दिल्ली जैसे महानगरों में फर्टिलिटी रेट काफी नीचे पहुंचने की बात कही जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा, करियर पर बढ़ता ध्यान और छोटे परिवार की अवधारणा ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक लेख में संकेत दिया था कि आने वाले वर्षों में भारत की जनसंख्या वृद्धि की गति में उल्लेखनीय कमी देखने को मिल सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी दर्ज हुआ बदलाव
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन 2025 रिपोर्ट में भी भारत की कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे होकर 1.9 रहने का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत इस समय दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है और इसकी कुल आबादी 1.46 अरब से अधिक हो चुकी है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आबादी में वृद्धि की गति पहले की तुलना में धीमी हो रही है और आने वाले दशकों में जनसंख्या की आयु संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार पर पड़ सकता है असर
जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि घटती जन्म दर का प्रभाव केवल आबादी की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर देश की आर्थिक संरचना, श्रम बाजार, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और बुजुर्ग आबादी के अनुपात पर भी पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक जन्म दर कम बनी रहती है, तो भविष्य में कामकाजी आयु वर्ग की आबादी का अनुपात घट सकता है, जिससे आर्थिक विकास और उत्पादकता पर असर पड़ने की आशंका रहेगी। दूसरी ओर, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा की जरूरतें बढ़ सकती हैं।
स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार, लेकिन चुनौतियां बरकरार
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिससे जीवन स्तर बेहतर हुआ है। हालांकि, महिलाओं के स्वास्थ्य, लैंगिक असमानता, बाल विवाह और सामाजिक असमानताओं जैसी चुनौतियां अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। एलन मस्क की टिप्पणी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि भारत एक नए जनसांख्यिकीय बदलाव के दौर में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में भविष्य की नीतियों में जनसंख्या संरचना, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।