क्या साहित्य जगत ने भारतेंन्दु हरिश्चंद्र को भुला दिया है?
प्रतिष्ठित साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र हरिश्चंद्रके वृहद साहित्यिक योगदान के कारण सन 1868 से 1900 तक के साहित्यिक काल को 'भारतेंन्दु युग' के नाम से जाना जाता है
- राजेन्द्र सिंह गहलोत
प्रतिष्ठित साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र हरिश्चंद्रके वृहद साहित्यिक योगदान के कारण सन 1868 से 1900 तक के साहित्यिक काल को 'भारतेंन्दु युग' के नाम से जाना जाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को हुआ था। मात्र 34 वर्ष 4 माह की अल्पायु में उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में जितना विपुल साहित्य सृजन किया उतना शायद ही वर्तमान के किसी साहित्यकार ने किया होगा । उनने 5 वर्ष की बाल्यावस्था में ही यह दोहा लिखा
'लै व्यौढा ढाड़े भये श्री अनिरुद्ध सुजान। बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान।'
तथा अपने पिता बाबू गोपालचंद्र (उपनाम कविवर गिऱिधरदास) से सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने सन1867 में 16 वर्ष की आयु में 'कविवचन सुधा', सन 1873 में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' (8 अंक के बाद उसका नाम 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' हो गया था ) तथा सन् 1874 में स्त्रियों की शिक्षा के लिये 'बाला बोधनी' नामक पत्रों का प्रकाशन किया। 20 वर्ष की उम्र में वे 'आनरेरी मजिस्ट्रेट' नियुक्त किए गए तथा 6 वर्षो तक 'लां म्युनिसिपल कमिश्नर' रहे। बाबू हरिश्चन्द्र की विद्वता एवं समाज सेवा से प्रभावित होकर 20 सितंबर सन 1880 ई. में 'सार सुधा निधि' पत्र ने उन्हें 'भारतेन्दु' की पदवी देने का प्रस्ताव रखा तथा काशी के अन्य विद्वानों की सहमति से उन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि दी गई तथा उसके बाद से वे अपने नाम के आगे 'भारतेन्दु' लिखने लगे।
भारतेन्दु ने जिस समय साहित्य सृजन किया उस समय भारत में फारसी एवं अंग्रेजी भाषा का बोलबाला था। उस समय हिन्दी भाषा को प्रतिष्ठित स्थान पर स्थापित करने के लिये राजा लक्ष्मण सिंह एवं शिवप्रसाद सितारे हिन्द प्रयासरत थे । लेकिन राजा लक्ष्मण सिंह जहां शुद्ध संस्कृतष्ठ हिन्दी भाषा के समर्थक थे वहीं शिव प्रसाद सितारे हिन्द 'आमफहम और खास पसंद' के फार्मूले पर बोलचाल की हिन्दी भाषा में उर्दू, अंग्रेजी सभी के मिश्रण को उचित ठहराते थे। वैसी स्थिति में भारतेन्दु ने मध्य मार्ग अपनाते हुये हिन्दी भाषा में खड़ी बोली को स्थापित किया तथा उन्हें आधुनिक हिन्दी का जनक माना गया । वे निज भाषा की उन्नति के पक्षधर थे। उन्होंने लिखा था
'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।'
भारतेन्दु ने साहित्य सृजन करते हुए 21 काव्य, 52 छोटे प्रबंध एवं मुक्तक रचनाएं तथा ढेरों स्फुट कविताएं लिखीं जिनमें ग़ज़ल, सवैया, कवित्त, समस्यापूर्ति, मुकरी आदि हैं। जबकि गद्य में उन्होंने 24 नाटक, 50 निबंध, 20 धार्मिक रचनाएं ( जिसमें हिन्दी कुरान शरीफ़ भी शामिल है), एक आत्मकथा 'कुछ आपबीती कुछ जगबीती' शीर्षक से, 9 हास्य व्यंग्य (प्रहसनात्मक) रचनाएं, 7 यात्रा वृतांत (मध्यदेशीय यात्री के नाम से) तथा 4 विविध रचनाएं लिखी थी। उन्होंने संस्कृत, प्राकृत, बांग्ला के कई नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया तथा शेक्सपियर के नाटक 'मर्चेन्ट आफ वेनिस' का 'दुर्लभ बंधु' के नाम से हिन्दी में अनुवाद किया। वे अच्छे पत्र लेखक भी थे। उन्होंने राधाशरण, कविराज श्यामलदास, प्रेमधन, काशीराज ईश्वरी प्रसाद सिंह, ईश्वरचन्द् विद्यासागर, बंकिम बाबू आदि को पत्र लिखे थे। जबकि मेवाड़ यात्रा से लौटते वक्त अपने जीवन के अंतिम समय में जो पत्र अपने अनुज गोकुल चन्द्र को लिखा था वह उनकी वसीयत भी हो सकता है।
उस पत्र का कुछ अंश इस प्रकार था 'विदेश से लौट कर हम न आवें तो इस बात का - जो हम यहां लिख रहे हैं, ध्यान रखना। ध्यान क्या अपने पर फ़र्ज समझना। किन्तु हम जल्द ही जीते जागते फिरेंगे। कोई चिंता नहीं है। सिर्फ संयोग के वश हो कर लिखा है। यदि ऐसा हो तो दो चार बातों का अवश्य ध्यान रखना। यह तुम जानते हो कि तुम्हारी भाभी की हमको कुछ चिंता नहीं क्योंकि तुम्हारे ऐसा देवर जिनका वर्तमान है उसको और क्या चाहिए। दो बातों की हमको चिंता है। प्रथम कर्जे, दूसरी मल्लिका की रक्षा। थोड़ी सी डिगरी जो बच गई है उसको चुका देना और जीवन भर दीन हीन मल्लिका की - जिसे हमने धर्मपूर्वक अपनाया है रक्षा करना। ........ जो ग्रंथ हमारे या बाबू जी के बे छपे रह जाएं वे छपें। ........। इस पर हंसना मत, दुखी मत होना, क्योंकि अभी तो अणु मात्र भी मरने की संभावना नहीं है। शारीरिक कुशल है, तनिक भी चिंता न करना।
- हरिश्चन्द्र
मल्लिका उनकी प्रेमिका थी जिसका असली नाम 'आली जान' था उसकी शुद्धि करा कर भारतेन्दु ने उसका नाम 'मल्लिका' रखा था। मेवाड़ यात्रा से लौटने के बाद से ही वे लगातार बीमार रहे। 2 जनवरी 1885 को बीमारी काफी बढ़ गई थी। उस बीमारी के हाल में जब लोगों ने उनके सेवकों से उनका हाल पूछा तो उन्होंने सेवकों से कहा - 'जा कर कह दो हमारे जीवन के नाटक का प्रोग्राम नित्य नया छप रहा है। पहले दिन ज्वर का, दूसरे दिन दर्द, का तीसरे दिन खांसी का सीन हो चुका है। देखो लास्ट नाइट कब होती है।' धीरे धीरे उनकी हालत बिगड़ने लगी और 6 जनवरी सन 1885 को रात्रि 1 बजे उनका स्वर्गवास हो गया।
पंडित रामशंकर व्यास ने उनकी जीवनी लिखते हुए लिखा था 'वह प्राय: कहा करते थे कि अभी तक मेरे पास पूर्ववत बहुत धन होता तो मैं चार काम करता (1) श्री ठाकुर जी को बगीचे में पधार कर धूम धाम से षट ऋतु का मनोरथ करता (2) विलायत, फरासीस और अमेरिका जाता (3) अपने उद्योग से एक शुद्ध हिन्दी की यूनिवर्सिटी स्थापना करता ( हाय रे हतभागिनी हिन्दी, अब तेरा इतना ध्यान किसको रहेगा ) (4) एक शिल्प कला का पश्चिमोत्तर देश में कॉलेज करता। (भारतेन्दु समग्र, पृष्ठ 1112, हिन्दी प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, पिशाचमोचन वाराणसी 221010)
क्या भारतेन्दु जी की तीसरी और चौथी अभिलाषा वर्तमान तक भी पूरी हो सकी? खेद है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी जैसे इतने महान साहित्यकार को वर्तमान साहित्य जगत ने भुला दिया है। यह आलेख मैं अगस्त माह के अंतिम सप्ताह में लिख रहा हूं, जबकि अगले माह सितम्बर की 9 तारीख को भारतेन्दु जी की 172 वीं जयंती है। लेकिन वर्तमान की किसी भी साहित्यिक पत्रिका का भारतेन्दु पर केन्द्रित विशेषांक के प्रकाशित होने की कोई भी सूचना सुनाई नहीं पड़ रही है, और न ही देश की किसी भी साहित्यिक संस्था द्वारा 'भारतेन्दु की 172 वी जयंती' पर कोई भी महती आयोजन करने की कोई घोषणा ही की गई है।
इतना ही नहीं, भारतेन्दु की जन्म एवं कर्म स्थली वाराणसी में वहां का आम आदमी भारतेन्दु जी तथा उनके भारतेन्दु भवन के बारे में कुछ जानता ही नहीं, यह अभी पिछले माह ही वाराणसी यात्रा के दौरान मुझे महसूस हुआ। भारतेन्दु जी एवं उनके भवन के बारे में पूछने पर आटो ड्राईवर एवं अन्य आम व्यक्तियों ने अनभिज्ञता जाहिर की। बनारस के महान साहित्यकार आचार्य केशव प्रसाद मिश्र के भतीजे पं. श्याम नारायण मिश्र मेरे मित्र हैं, उन्हें फ़ोन लगाया तो पता चला कि वे इस समय दिल्ली में हैं। फिर भी उन्होंने बताया कि भारतेन्दु भवन चौखंभा में ठठेरी बाजार की एक गली में स्थित है ।
जिस होटल में मैं रुका था उसके मैनेजर से जब ठठेरी बाजार के बारे में पूछा तो उसने प्रत्युत्तर में पूछा कि 'क्या आप सोने चांदी के व्यापारी हैं ?' तो मैं हतप्रभ रह गया। किसी तरह उसे समझाया कि हम साहित्य के सोना-चांदी नहीं, बल्कि अनमोल हीरा बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के भवन के दर्शन के अभिलाषी हैं, क्या उसे इस बाबत कुछ ज्ञात है ? उसने कहा ठठेरी बाजार सोने चांदी का बाज़ार है, यह तो पता है लेकिन वहां भारतेन्दु भवन कहां है - मालूम नहीं। भारतेन्दु भवन की तलाश में जब मै निकला तो किसी ने मैदागिनी (शायद सही नाम मन्दाकिनी रहा होगा) के भारतेन्दु विद्यालय भेजा तो किसी ने हरिश्चंद्र पार्क। आख़िर काफ़ी भटकने के बाद मैं ठठेरी बाजार की गली के अंतिम छोर पर स्थित भारतेन्दु भवन तक पहुँच ही गया।
दरअसल 3-4 वर्ष पूर्व मेरा एक आलेख 'स्थापित किये जाने चाहिये साहित्य के तीर्थ स्थल' देशबन्धु की सहयोगी पत्रिका 'अक्षर पर्व' एवं कुछ अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था, जिसमें मैंने यह मुद्दा उठाया था कि ऐसे प्रतिष्ठित साहित्यकार जो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन जो अपने युग का साहित्य सृजन के क्षेत्र में प्रतिनिधित्व करते हैं उनके जन्मस्थल एवं कर्मस्थल पर उनके स्मारक बनाए जाने चाहिये, उनके निवास के भवनों को संरक्षित किया जाना चाहिए तथा पर्यटन विभाग द्वारा 'लिटरेरी टूरिस्ट गाइड बुक' प्रकाशित की जानी चाहिए जिसमे देश एवं प्रदेश के इस तरह के सभी साहित्यकारों के स्मारकों का विस्तृत विवरण दर्जे हो।
चित्रा मुद्गल जैसी प्रतिष्ठित साहित्यकार ने उस आलेख के लिए मुझे फोन कर बधाई दी थी। लेकिन वाराणसी से डां. गिरीशचंद्र चौधरी - जो कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के वंशज हैं, ने पत्र लिख कर शिकायत की कि मैंने अपने उस आलेख में 'भारतेन्दु भवन' का कोई जिक्र नहीं किया। दरअसल उस समय तक मैंने भारतेन्दु भवन नहीं देखा था। मैंने पत्र लिख कर उनसे वादा किया कि अब जब कभी वाराणसी जाना हुआ तो 'भारतेन्दु भवन' के दर्शन करने अवश्य जाऊंगा। उसी वादे को निभाते हुए मैं इस बार जब वाराणसी गया तो 'भारतेन्दु भवन' तक जा पहुंचा था। लेकिन उसकी दयनीय दशा देखकर हतप्रभ रह गया।
'भारतेन्दु भवन' के प्रवेश द्वार की दीवार से सट कर एक तरफ़ चाय-पान का स्टॉल लगा हुआ था तो दूसरी तरफ कपड़े प्रेस करने वाले की बड़ी टेबल दीवार से सट कर लगी हुई थी। दोनों ही दुकानों के तिरपाल बेझिझक भारतेन्दु भवन की दीवारों में कील ठोक कर लगाये गये थे। चाय-पान के स्टॉल से ढंकी दीवार के एक कोने से किसी तरह झांकती हुई भारतेन्दु भवन की पट्टिका तथा भारतेन्दु जी का चित्र नज़र आ रहे थे। भवन की ऊपरी मंजिल सामने से धूल धूसरित तथा टीन के छप्पर से ढंकी दिखाई दे रही थी। उस पर कोई एक टूटा हुआ बोर्ड लगा हुआ था जिसका 'प्रसाद एण्ड संस' वाला हिस्सा दिखाई पड़ रहा था अगला हिस्सा टूट कर अलग हो गया था।
भवन के पहले कमरे में 'भारतेन्दु जी' की पालकी उपेक्षित हालत में रखी हुई थी। सीढ़ी चढ़ कर ऊपर जाने पर देखा कि ऊपर के कमरों में ताला लगा हुआ है। भवन में डा. गिरीश चन्द्र चौधरी से तो मुलाकात हो न सकी लेकिन आसपास के दुकानदारों ने भी किसी ख़ास मौके (मसलन भारतेन्दु जयंती, पुंण्यतिथि आदि) पर कोई विशाल आयोजन किये जाने की कोई जानकारी नहीं दी। भवन की बगल की गली से निकल कर एक विदेशी युवक युवती का जोड़ा भारतेन्दु जी और उनके भवन से पूर्णत: अनभिज्ञता के भाव लिये हुये निकल कर जा रहा था। संभवत: वह गली गंगा के किसी घाट तक जाती थी।
समृद्धशाली सेठ अमीचंद की पांचवीं पीढ़ी में जन्मे बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जिस भवन में जन्म हुआ था, जिस भवन में प्रतिष्ठित साहित्यकार, रसिक, रईस भारतेन्दु जी की साहित्यिक एवं राग रंग की महफिलें जमा करती थी, आज वह भारतेन्दु जी का भवन उपेक्षित एवं जीर्ण-शीर्ण हालत में है। देश एवं उत्तर प्रदेश में कई संस्थाएं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाम से संचालित है। उनकी प्रेमिका 'मल्लिका' को केन्द्र में रख कर, वर्तमान की एक महिला कहानीकार ने, बनारस में ही एक आयोजन में उपन्यास लिखने की घोषणा की थी। लेकिन न ही किसी संस्था ने और न ही वर्तमान के किसी साहित्यकार लेखक ने कभी भी यह आवाज़ बुलंद की कि बनारस मे ठठेरी बाज़ार की उस गली - जिसके अंतिम छोर पर 'भारतेन्दु भवन' स्थित है, का नाम 'भारतेन्दु पथ' रखा जाए।
भारतेन्दु भवन को साहित्यिक विरासत घोषित कर उसे संरक्षित एवं सुरक्षित किया जाए और उसके सामने भारतेन्दु जी की प्रतिमा स्थापित की जाए। भवन के विभिन्न कक्षों में भारतेन्दु के जीवन काल से संबंधित सामग्रियों को सुरक्षित ढंग से रख कर प्रदर्शित किया जाए तथा देख देख के लिए एक व्यक्ति नियुक्त किया जाए। ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश की सरकार साहित्यिक विरासतों को गौरवशाली ढंग से संरक्षित रखना नहीं जानती। इस मामले में उसने दिल खोल कर खर्च किया है। इसका प्रमाण है कबीर प्राकट्य स्थल पर लगभग एक एकड़ भूमि पर बना हुआ 'कबीर स्मारक' तथा सुरक्षित ढंग से प्रदर्शित लहरतारा तालाब - जिसके किनारे शिशु कबीर मिले थे। साहित्यकारों की मांग के बाद लमही में भी 'प्रेमचंद स्मारक' संतोषजनक ढंग से स्थापित हो सका साथ ही 'प्रेमचंद शोध संस्थान' स्थापित हुआ। फिर 'भारतेन्दु भवन' की ही उपेक्षा क्यों ? क्या वर्तमान साहित्य एवं साहित्यकारों ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एवं उनके साहित्यिक योगदान को भुला दिया है ?