ललित सुरजन की कलम से- पंचायती राज में बाधक अभिजात सोच
पंचायती राज के प्रति हमारी सरकारें गंभीर नहीं हैं। 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिए राज्य सरकारों को पंचायतों के कामकाज में हस्तक्षेप करने की बड़ी छूट दे दी गई है
'पंचायती राज के प्रति हमारी सरकारें गंभीर नहीं हैं। 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिए राज्य सरकारों को पंचायतों के कामकाज में हस्तक्षेप करने की बड़ी छूट दे दी गई है।
इसके चलते पंचायती राज व्यवस्था राज्य सरकारों की दया पर निर्भर हो गई है। इसलिए कभी मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार दो बच्चों से ज्यादा होने पर चुनाव लडऩे पर प्रतिबंध लगा देती है तो कभी राजस्थान की भाजपा सरकार ऐसा निर्णय ले लेती है।
सांसद और विधायक भी पंचों-सरपंचों को किसी गिनती में नहीं रखते। यह एक बड़ी विसंगति है। हम मानते हैं कि अगर पंचगण शिक्षित हों तो वह बेहतर है, लेकिन जब हम देखते हैं कि हमारे द्वारा चुनकर भेजे गए लोग शिक्षित होने के बावजूद किस तरह का आचरण कर रहे हैं तब यह एकमात्र शर्त संदिग्ध हो जाती है।'
(देशबन्धु सम्पादकीय 29 दिसंबर 2014)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/12/blog-post_28.html