दहेज उत्पीड़न पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बोला- शादी के बाद दुल्हन और उसके परिवार का अपमान क्यों?

दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि शादी के बाद दुल्हन और उसके परिवार का अपमान बंद होना चाहिए और समाज को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा।;

Update: 2026-05-29 11:16 GMT

नई दिल्ली। दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समाज में व्याप्त दहेज प्रथा और उससे जुड़ी मानसिकता पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि शादी के बाद दुल्हन और उसके परिवार का अपमान करना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। न्यायालय ने सवाल उठाया कि यदि कुछ लोग दुल्हन और उसके परिवार का सम्मान नहीं कर सकते, तो वे विवाह ही क्यों करते हैं।

मामले की सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ कर रही थी। यह मामला छत्तीसगढ़ की एक महिला की मृत्यु से जुड़ा है, जिसने शादी के तीन वर्ष के भीतर अपने ससुराल में फांसी लगाकर जान दे दी थी। आरोप है कि महिला को लगातार दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था।

कोर्ट ने उठाए समाज से जुड़े सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि दहेज की मांग और उससे जुड़ा उत्पीड़न केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि दुल्हन और उसके परिवार का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अदालत ने टिप्पणी की कि कई मामलों में विवाह के बाद लड़की के परिवार पर लगातार आर्थिक दबाव बनाया जाता है। उनसे बार-बार मांगें की जाती हैं और उन्हें अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

 रिकॉर्ड में दर्ज आरोपों का किया जिक्र

पीठ ने मामले से जुड़े दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरोपों के अनुसार महिला के परिवार को अपमानजनक शब्द कहे गए। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि ऐसे मामलों में लड़की के परिजन अपनी बेटी को बचाने और वैवाहिक संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि दहेज के नाम पर परिवारों को आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान करने की प्रवृत्ति समाज के लिए गंभीर चुनौती है।

महिलाओं की गरिमा की रक्षा जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह सम्मान, समानता और विश्वास पर आधारित संबंध होना चाहिए। दहेज की मांग या किसी भी प्रकार का मानसिक उत्पीड़न न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि महिलाओं की गरिमा के भी खिलाफ है।

अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देशभर में दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन के माध्यम से स्पष्ट संकेत दिया कि दहेज प्रथा और उससे जुड़ी अपमानजनक मानसिकता के खिलाफ समाज को सामूहिक रूप से खड़ा होना होगा।

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