जगदीप धनखड़ ने ED के दबाव में दिया था उप राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा, संजय राउत ने अपनी किताब में किया दावा
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने जेल में बंद रहने के दौरान के अनुभवों पर एक किताब लिखी है। अग्रेजी में लिखी गई इस किताब में एक चैप्टर पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफा देने को लेकर भी है। जगदीप धनखड़ ने जुलाई 2025 में उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था।
मुंबई। शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने जेल में रहते हुए एक किताब लिखी। इस किताब का शीर्षक है 'अनलाइकली पैराडाइज' । इस किताब में उन्होंने आरोप लगाया है कि पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 2025 में ईडी के दबाव में इस्तीफा दिया था। यह दबाव मोदी सरकार के खिलाफ उनके स्वतंत्र राजनीतिक कदमों के जवाब में था। मराठी में लिखी यह किताब 2025 में प्रकाशित हुई थी। इसका अंग्रेजी संस्करण, जिसमें और भी घटनाओं का जिक्र है, सोमवार को जारी होने वाला है।
किताब के अनुसार, अफवाहें फैली थीं कि जगदीप धनखड़ और उनकी पत्नी ने जयपुर स्थित अपना घर बेच दिया था और उससे मिली रकम का कुछ हिस्सा विदेश भेज दिया था। किताब में दावा किया गया है कि ईडी ने कथित तौर पर अन्य जांच एजेंसियों के साथ मिलकर उनके खिलाफ आरोप तय करने के लिए एक फाइल तैयार की थी।
संजय राउत ने किताब में किया क्या दावा?
किताब में दावा किया गया है कि जब मोदी सरकार के खिलाफ जगदीप धनखड़ के स्वतंत्र राजनीतिक कदमों की चर्चा शुरू हुई, तो ईडी ने उन्हें फाइल सौंपी और उन पर इस्तीफा देने का दबाव डाला। शुरू में उनके इनकार करने पर जांच और तेज हो गई, जिससे वे स्पष्ट रूप से असहज हो गए। संजय राउत का यह भी आरोप है कि पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के घर पर छापा मारा गया और उनके परिवार को ईडी का समन भेजा गया क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के कथित चुनावी उल्लंघनों के खिलाफ असहमति जताई थी।
पूर्व चुनाव आयुक्त के इस्तीफे के पीछे के घटनाक्रम का खुलासा
शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने अपनी किताब में आरोप लगाया, 'भारत की चुनाव संहिता के आठ उल्लंघनों की शिकायतों के आधार पर, (पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक) लवासा ने चुनाव आयोग में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए कार्रवाई शुरू की। चुप रहने की सलाह के बावजूद, उन्होंने दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया। स्वाभाविक रूप से, लवासा और उनके परिवार को उनकी असहमति के लिए गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।' किताब में कहा गया है कि उनके आवास पर ईडी के छापे ने 2020 में उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया और उसके बाद भी वे एजेंसी की निगरानी में रहे।
'शरद पवार की वजह से जेल जाने से बचे नरेंद्र मोदी'
किताब में यह भी दावा किया गया है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान, ऐसी अफवाहें थीं कि तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को गुजरात में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के सिलसिले में जेल भेजा जा सकता है। हालांकि, तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और एनसीपी एसपी प्रमुख शरद पवार भी इस फैसले से सहमत नहीं थे। पुस्तक में दावा किया गया है कि कैबिनेट की बैठक में शरद पवार ने कहा था, 'राजनीतिक मतभेदों के बावजूद लोकतांत्रिक रूप से चुने गए मुख्यमंत्री को जेल भेजना अनुचित है।' किताब में आगे कहा गया है कि यह विचार कई लोगों को पसंद आया, जिसके चलते मोदी को जेल जाने से बचा लिया गया। क्या मोदी को राजनीति में इन उपकारों और नैतिकता की याद है?
'अमित शाह को शरद पवार ने ही जेल से निकाला'
पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि शरत पवार और शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे दोनों ने अमित शाहको जमानत दिलाने में मदद की थी, जब सीबीआई ने जमानत का विरोध किया था और उन पर कई मामलों में आरोप लगे थे। सीबीआई यूनिट में महाराष्ट्र कैडर के एक अधिकारी अमित शाह को जमानत देने के सख्त खिलाफ थे। मोदी ने पवार से हस्तक्षेप मांगा और शरद पवार ने अपनी आदत के अनुसार उनकी मदद की और शाह जमानत पर रिहा हो गए। हम सब जानते हैं कि बाद में शाह ने पवार और महाराष्ट्र के साथ कैसा बर्ताव किया," किताब में दावा किया गया है।