आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को लेकर राहुल गांधी का मोदी सरकार पर हमला, बोले- कांग्रेस के समय बैंक बनते थे, अब बिकते हैं
राहुल गांधी ने IDBI Bank के निजीकरण पर मोदी सरकार को घेरा। 9,000 करोड़ के मुनाफे, 51 फीसदी हिस्सेदारी के वादे और कर्मचारियों के आरक्षण पर उठाए सवाल।;
राहुल गांधी ने सरकार से पूछे ये सवाल
राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों को भेजे अपने संदेश में पिछले साल मार्च में हुई मुलाकात का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि बैंक कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संसद भवन में उनसे मुलाकात कर पूछा था कि जिस बैंक को कर्मचारियों ने मेहनत से मुनाफे में पहुंचाया, उसे सरकार क्यों बेच रही है?
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने सरकार से सवाल किया था कि फायदे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का निजीकरण क्यों किया जा रहा है और इससे कर्मचारियों तथा जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा कैसे होगी? उनके मुताबिक, सरकार की ओर से इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
एक्स पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने लिखा, "कांग्रेस के समय में IDBI बना-देश का उद्योग खड़ा करने के लिए। मोदी के समय में पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ। कांग्रेस के टाइम पे बैंक बनते थे, मोदी के टाइम में बिकते हैं।" उन्होंने आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़े रहने की बात भी कही।
9,000 करोड़ के मुनाफे के बाद निजीकरण पर सवाल
आईडीबीआई बैंक के वित्तीय प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि करीब सात साल पहले तक बैंक घाटे में था। लेकिन कर्मचारियों की मेहनत और प्रयासों से बैंक ने शानदार वापसी की और पिछले साल 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया।
उनका सवाल है कि जब बैंक आर्थिक रूप से मजबूत हो चुका है और मुनाफा कमा रहा है, तो सरकार इसे निजी हाथों में क्यों सौंपना चाहती है?
51 फीसदी हिस्सेदारी के वादे की दिलाई याद
राहुल गांधी ने वर्ष 2003 में संसद में दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया। उस समय सरकार ने कहा था कि आईडीबीआई बैंक में उसकी हिस्सेदारी हमेशा कम से कम 51 प्रतिशत बनी रहेगी। राहुल गांधी के मुताबिक, संसद में दिया गया आश्वासन जनता के प्रति सरकार की जिम्मेदारी होता है।
मौजूदा स्थिति में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बैंक में संयुक्त हिस्सेदारी करीब 95 प्रतिशत है। प्रस्तावित बिक्री के बाद यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह जाएगी। इससे बैंक का नियंत्रण निजी क्षेत्र के हाथों में जाने का रास्ता साफ होगा।
निजीकरण से आरक्षण और कर्मचारियों के अधिकारों पर चिंता
राहुल गांधी ने बैंक के निजीकरण को सामाजिक न्याय से भी जोड़ते हुए कहा कि इससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को मिलने वाले आरक्षण पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कर्मचारियों की सेवा शर्तों और भविष्य की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई।
उन्होंने बैंक कर्मचारियों से एकजुट रहने और अपने अधिकारों के लिए मजबूती से आवाज उठाने की अपील की। अब आईडीबीआई बैंक की बिक्री को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ने के आसार हैं।